सामाजिक न्याय मंच (Social Justice forum) द्वारा 5 सितंबर, 2011 को जंतर-मंतर पर विशाल रैली आयोजित की जा रही है. यह रैली सुबह 10 बजे रानी झांसी रोड स्थित अंबेडकर भवन से शुरू होकर जंतर-मंतर पहुंचेगी. लोकपाल में दलितों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी एवं उनके हितों की रक्षा के लिए यह एक प्रयास है. आप सब भी आएं. हमारी लड़ाई हमें ही लड़नी है. तो सुबह 10 बजे अंबेडकर भवन पर इंतजार रहेगा....
प्रिय साथियों, कुछ विचारनीय सवालः-
- क्या दलित, आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग इस देश के नागरिक नहीं हैं?
- बंधुआ और बाल मजदूर अधिकांश केवल दलित व आदिवासी वर्ग से ही क्यों?
- लोकपाल तैयार करने में इन वर्गों के प्रतिनिधियों को क्यों नहीं रखा गया है?
- आज भी छह लाख दलित परिवार सिर पर मैला ढोकर पेट पालते हैं. इस शर्मनाक प्रथा को चलाने वाले क्या भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आते, जबकि इसके खिलाफ कानून बना है.
- शिक्षा में भ्रष्टाचार के कारण लगभग 80 प्रतिशत दलित व 85 प्रतिशत आदिवासी अशिक्षित हैं.
- क्या 15 प्रतिशत स्वर्ण जाति के लोग हमारा प्रतिनिधित्व करते है?
- देश के प्राकृतिक संसाधनों जिसमें जमीन प्रमुख है, का दलितों और आदिवासियों में न बॉंटा जाना सबसे बडा भ्रष्टाचार है इस वजह से 80 प्रतिशत से अधिक दलित और आदिवासी परिवार भूमिहीन क्यों हैं?
- क्या इस कथित बिल के पास हो जाने के बाद भ्रष्टाचार पूर्णतया खत्म हो जाएगा, जबकि भ्रष्टाचार की जडें वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और धार्मिक व्यवस्था में बहुत गहरे में पैठीं हों जिसे हम आए दिन अपने इर्द-गिर्द महसूस करते हैं और उसके शिकार होते हैं.
- वर्तमान शिक्षा तंत्र, मीडिया, निजी क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार के बारे में चुप्पी क्यों?
- क्या भ्रष्टाचार खत्म करने के इस तमाम प्रायोजन में कहीं कोई छद्म एजेंडा है?
‘’लोकपाल या जन लोकपाल भारत के दो इंडिया बनाने का षड्यंत्र’’
इन दिनों लोकपाल और जन लोकपाल पर बहस चल रही है. जिस ढंग से जनलोकपाल पर हुए अनशन को मीडिया, कार्पोरेट जगत और कुछ संगठनों का बढ़-चढ़ कर सहयोग दिखाई दिया मानों यह सारा कार्यक्रम उन्हीं के द्वारा प्रायोजित है. इसके समानान्तर दलित संगठनों द्वारा विभिन्न आंदोलनों के माध्यम से यह प्रयास किया गया कि लोकपाल बिल में दलितों, आदिवासियों, पिछड़ा वर्ग एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे सामाजिक और आर्थिक शोषण को भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में डालकर लोकपाल का हिस्सा बनाया जाए. दलित संगठनां द्वारा चलाए गए इतने आंदोलनों के बावजूद देश की 85 प्रतिशत जनता के प्रतिनिधियों को लोकपाल बनाने वाली समिति में न रखकर कुछ व्यक्तियों द्वारा चलाए जा रहे अनशन के समक्ष ऐसा लगता है मानो देश की संसद तक ने समर्पण कर दिया हो. हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम लोकपाल विधेयक के बिल्कुल समर्थन में हैं किन्तु उस लोकपाल बनाने वाली समिति में हमारी जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी सुनिश्चित की जाए जिससे हमारे अधिकारों की अनदेखी न हो.
सामाजिक न्याय मंच के माध्यम से हम पुरजोर मांग करते हैं कि:
- प्रस्तावित लोकपाल बिल में भ्रष्टाचार की व्यापक परिभाषा- जैसे दलितों के साथ जातिय, सामाजिक, धार्मिक व शैक्षिक आधार पर भेदभाव को भी शामिल किया जाए.
- बाबासाहेब द्वारा बनाए गए संविधान की मूल भावना के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न की जाए.
- मीडिया, कॉरपोरेट जगत, सरकारी अनुदान पर चल रहे स्वयं सेवी संगठनों (एन.जी.ओ.) भारत सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा अनुसचित जाति उपकार्य योजना एवं अनुसूचित जनजाति कार्ययोजना के अंतर्गत दलितों और आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में बजट न दिए जाने को भी इस बिल में भ्रष्टाचार माना जाए.
- सिर पर मैला ढ़ोने की प्रथा को चलाने वाले लोगों को सामाजिक भ्रष्टाचार मानते हुए इस बिल में शामिल किया जाए.
- न्यायपालिका, भूमि वितरण, पंचायतों, नगर पालिकाओं, नगर निगमों एवं अन्य स्वायत्तशासी संस्थाओं को भी प्रस्ताववित लोकपाल बिल के अंतर्गत लाया जाए.
Sunday, September 4, 2011
Friday, September 2, 2011
और...बाबा साहब की किताब ने बदल दी जिंदगी
वो तेरह रुपए की किताब बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर की थी. इस किताब ने मुझे एक नई राह दी. मुझे यकीन दिलाया कि जिंदगी में कुछ भी करना नामुमकिन नहीं है. मुझे भरोसा हो गया कि मैं भले ही निम्नवर्ग में पैदा हुआ हूं, मैं डाक्टर बन सकता हूं. वह किताब मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. और आखिरकार एक ऐसा वक्त आया जब मैने अपने सपनों को पा लिया.’ ये शब्द डा. एस.एम श्यामलाल का है. यह उस साहसी इंसान के शब्द हैं, जिसने यह दिखाया कि अपने सपने कैसे पूरे करते हैं.
हरियाणा के सोहना के खेड़ा खलीलपुर गांव में एक किसान पिता के घर जन्में श्यामलाल ने डाक्टर बनने का सपना संजोया था. और अपनी मेहनत, लगन और आत्मविश्वास के बूते वो ना सिर्फ मशहूर डाक्टर हैं बल्कि हरियाणा के गुड़गांव में सौ बेड वाला Multi Specialty Hospital के मालिक हैं. करोड़पतियों की लिस्ट में उनके नाम की एक धाक है. लेकिन जाहिर है, यह इतना आसान नहीं रहा. जिंदगी के पन्ने को पलटते हुए डॉ श्यामलाल कहते है कि हरियाणा में दलित किसान परिवार में जन्म लेना और सात भाई-बहनों का पालन-पोषण ही मां-बाप के लिए मुश्किल साबित हो रहा था. पिता की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने की वजह से मुझे सरकारी स्कूल में दाखिला लेना पड़ा. जातिवादी समाज में दलित बच्चों के लिए पढ़ना पहले इतना आसान नहीं था. स्कूल की एक घटना का जिक्र कर बताते हैं कि कैसे सवर्ण मानसिकता वाले शिक्षक पूछते थे कि इतना पढ़कर क्या करोगे? ऐसे मुश्किल हालातों का उन्होंने डटकर सामना किया और गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ाई जारी रखी. आखिर एक दिन उनका सपना पूरा हुआ और उनके नाम के आगे डॉक्टर लग गया.
संघर्ष के दिन भी रोज नई परेशानी खड़ी कर रहे थे. कहते हैं ‘मेडिकल की डिग्री लेने के बाद एक क्लीनिक में नौकरी तो मिल गई, ठीक-ठाक कमा भी रहा था. लेकिन काम करने के दौरान ऐसा लगा कि जानबूझ कर नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है.’ इस दरम्यान उन्होंने जब दूसरी जगह नौकरी पाने के लिए प्रमाण-पत्र, एक्सपीरियंस लेटर की मांग की तो टालमटोल का रवैया अपनाया गया. यह उनकी जिंदगी का दूसरा टर्निंग प्वाइंट था. उन्होंने नौकरी दी और खुद का क्लीनिक खोलने का फैसला किया. उस वक्त उन्होंने सोचा कि दूसरे की नौकरी से अच्छा है अपना क्लीनिक खोला जाए. उन्होंने फैसला तो कर लिया, लेकिन जेब में मात्रा 300 रुपए ही थे. वे जिस जगह क्लीनिक खोलना चाहते थे उसका किराया उनकी जमा पूंजी से भी ज्यादा था. क्लीनिक का किराया 500 रुपए था, और वो भी एडवांस में देना था. लेकिन इसकी परवाह किए बगैर उन्होंने मकान मालिक से किराए को लेकर बात की. किराया एडवांस की बजाए मरीजों के इलाज के दौरान कमाई राशि से महीने के आखिर में देने को राजी कर लिया. इस तरह से उस तीन सौ रुपए की जमा पूंजी के भरोसे क्लीनिक खुल गया.
भविष्य को लेकर थोड़ी आशंका तो थी, लेकिन खुद पर यकीन था. ये भरोसा काम आया और देखते ही देखते डॉ श्यामलाल के क्लीनिक में मरीजों की भीड़ लगने लगी. डॉ श्याम बताते है कि उन्होंने मरीजों के इलाज के दौरान सामाजिक सोच बनाए रखी. उन्होंने दवाई कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने के बजाए मरीजों की सेहत के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति का ज्यादा ख्याल रखा. इस मूलमंत्र के सहारे दिन-ब-दिन सफलता की उड़ान भरते रहे. फिर वो समय आ गया, जिसका सपना उन्होंने बचपन में देखा था. डॉ श्यामलाल का कहना है कि 1995-96 में हॉस्पिटल की नींव रखी गई, जिसे 2009-10 में 100 बेड वाले मल्टी स्पेश्यलिटी हॉस्पिटल में बदल दिया गया. उनके अस्पताल में दो दर्जन से ज्यादा प्रशिक्षित डॉक्टर, सौ से ज्यादा कर्मचारी अपनी सेवा दे रहे हैं. हॉस्पिटल की खासियत के बारे में बताते हुए डॉ श्यामलाल कहते हैं कि यहां हर जरूरतमंद और गरीब मरीजों का ख्याल रखा जाता हैं. समाज के एक तबके ने भले ही उनके साथ भेदभाव किया लेकिन उनके लिए मानव हित सबसे पहले हैं. यही वजह है कि दिल्ली से सटे गुड़गांव में गरीब लोगों के लिए इन्होंने अलग से जनरल वार्ड बना रखा है. यहां सिर्फ 500 रुपये देकर गरीब व्यक्ति अपना इलाज करा सकता है.
डा. श्यामलाल की सफलता में एक वक्त ट्विस्ट भी आया. तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी मेहनत और ईमानदारी से भले ही उन्होंने हास्पिटल को खड़ा किया, कई लोगों से उनकी सफलता हजम नहीं हुई. सफल होने के बाद भी जाति ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. वो बताते है कि कुछ सवर्ण मानसिकता के लोगों ने उनके हॉस्पिटल के विस्तार के बारे में बड़े-बड़े वायदे और दावे किए, लेकिन उन्हें जब पता कि वो जिनके यहां काम कर रहे हैं वो दलित हैं तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी. वो दुःख के साथ बताते हैं कि उनलोगों में कुछ दलित भी शामिल रहे. लेकिन इसकी परवाह किए बगैर उनका कहना है कि ये अभी तो मंजिल का पड़ाव भर है.
साभारः शिल्पकार टाइम्स
हरियाणा के सोहना के खेड़ा खलीलपुर गांव में एक किसान पिता के घर जन्में श्यामलाल ने डाक्टर बनने का सपना संजोया था. और अपनी मेहनत, लगन और आत्मविश्वास के बूते वो ना सिर्फ मशहूर डाक्टर हैं बल्कि हरियाणा के गुड़गांव में सौ बेड वाला Multi Specialty Hospital के मालिक हैं. करोड़पतियों की लिस्ट में उनके नाम की एक धाक है. लेकिन जाहिर है, यह इतना आसान नहीं रहा. जिंदगी के पन्ने को पलटते हुए डॉ श्यामलाल कहते है कि हरियाणा में दलित किसान परिवार में जन्म लेना और सात भाई-बहनों का पालन-पोषण ही मां-बाप के लिए मुश्किल साबित हो रहा था. पिता की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने की वजह से मुझे सरकारी स्कूल में दाखिला लेना पड़ा. जातिवादी समाज में दलित बच्चों के लिए पढ़ना पहले इतना आसान नहीं था. स्कूल की एक घटना का जिक्र कर बताते हैं कि कैसे सवर्ण मानसिकता वाले शिक्षक पूछते थे कि इतना पढ़कर क्या करोगे? ऐसे मुश्किल हालातों का उन्होंने डटकर सामना किया और गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ाई जारी रखी. आखिर एक दिन उनका सपना पूरा हुआ और उनके नाम के आगे डॉक्टर लग गया.
संघर्ष के दिन भी रोज नई परेशानी खड़ी कर रहे थे. कहते हैं ‘मेडिकल की डिग्री लेने के बाद एक क्लीनिक में नौकरी तो मिल गई, ठीक-ठाक कमा भी रहा था. लेकिन काम करने के दौरान ऐसा लगा कि जानबूझ कर नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है.’ इस दरम्यान उन्होंने जब दूसरी जगह नौकरी पाने के लिए प्रमाण-पत्र, एक्सपीरियंस लेटर की मांग की तो टालमटोल का रवैया अपनाया गया. यह उनकी जिंदगी का दूसरा टर्निंग प्वाइंट था. उन्होंने नौकरी दी और खुद का क्लीनिक खोलने का फैसला किया. उस वक्त उन्होंने सोचा कि दूसरे की नौकरी से अच्छा है अपना क्लीनिक खोला जाए. उन्होंने फैसला तो कर लिया, लेकिन जेब में मात्रा 300 रुपए ही थे. वे जिस जगह क्लीनिक खोलना चाहते थे उसका किराया उनकी जमा पूंजी से भी ज्यादा था. क्लीनिक का किराया 500 रुपए था, और वो भी एडवांस में देना था. लेकिन इसकी परवाह किए बगैर उन्होंने मकान मालिक से किराए को लेकर बात की. किराया एडवांस की बजाए मरीजों के इलाज के दौरान कमाई राशि से महीने के आखिर में देने को राजी कर लिया. इस तरह से उस तीन सौ रुपए की जमा पूंजी के भरोसे क्लीनिक खुल गया.
भविष्य को लेकर थोड़ी आशंका तो थी, लेकिन खुद पर यकीन था. ये भरोसा काम आया और देखते ही देखते डॉ श्यामलाल के क्लीनिक में मरीजों की भीड़ लगने लगी. डॉ श्याम बताते है कि उन्होंने मरीजों के इलाज के दौरान सामाजिक सोच बनाए रखी. उन्होंने दवाई कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने के बजाए मरीजों की सेहत के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति का ज्यादा ख्याल रखा. इस मूलमंत्र के सहारे दिन-ब-दिन सफलता की उड़ान भरते रहे. फिर वो समय आ गया, जिसका सपना उन्होंने बचपन में देखा था. डॉ श्यामलाल का कहना है कि 1995-96 में हॉस्पिटल की नींव रखी गई, जिसे 2009-10 में 100 बेड वाले मल्टी स्पेश्यलिटी हॉस्पिटल में बदल दिया गया. उनके अस्पताल में दो दर्जन से ज्यादा प्रशिक्षित डॉक्टर, सौ से ज्यादा कर्मचारी अपनी सेवा दे रहे हैं. हॉस्पिटल की खासियत के बारे में बताते हुए डॉ श्यामलाल कहते हैं कि यहां हर जरूरतमंद और गरीब मरीजों का ख्याल रखा जाता हैं. समाज के एक तबके ने भले ही उनके साथ भेदभाव किया लेकिन उनके लिए मानव हित सबसे पहले हैं. यही वजह है कि दिल्ली से सटे गुड़गांव में गरीब लोगों के लिए इन्होंने अलग से जनरल वार्ड बना रखा है. यहां सिर्फ 500 रुपये देकर गरीब व्यक्ति अपना इलाज करा सकता है.
डा. श्यामलाल की सफलता में एक वक्त ट्विस्ट भी आया. तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी मेहनत और ईमानदारी से भले ही उन्होंने हास्पिटल को खड़ा किया, कई लोगों से उनकी सफलता हजम नहीं हुई. सफल होने के बाद भी जाति ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. वो बताते है कि कुछ सवर्ण मानसिकता के लोगों ने उनके हॉस्पिटल के विस्तार के बारे में बड़े-बड़े वायदे और दावे किए, लेकिन उन्हें जब पता कि वो जिनके यहां काम कर रहे हैं वो दलित हैं तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी. वो दुःख के साथ बताते हैं कि उनलोगों में कुछ दलित भी शामिल रहे. लेकिन इसकी परवाह किए बगैर उनका कहना है कि ये अभी तो मंजिल का पड़ाव भर है.
साभारः शिल्पकार टाइम्स
मेरिट का रिजर्वेशन से कोई मतलब नहीं- प्रो. मालाकार
पिछले दिनों आई प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण’ ने देश भर में रिजर्वेशन और मेरिट को लेकर एक बहस छेड़ दी थी. ये संयोग है या सोची समझी रणनीति की मंडल कमीशन के 21 साल गुजरने के बाद फिल्म को रिलीज करने का फैसला किया गया. फिल्म की रिलिज होने से पहले से लेकर बात तक इस मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के बीच चैनलों से लेकर अखबारों तक में खूब बहस हुई. सभी पक्षों ने अपनी राय दी. लेकिन जेएनयू में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के चेयरमैन एस एन मालाकार का मानना है कि मेरिट का रिजर्वेशन से कोई मतलब नहीं है. जब मेरिट का अवसर ही नहीं मिला तो मेरिट के साथ इसकी तुलना ही क्यों की जाती है?
देश में मेरिट और डीमेरिट को लेकर न्यायालय ने साफ तौर पर कहा है कि रिजर्वेशन का मेरिट से कोई लेना-देना नहीं है. इतिहास में निचले तबके को मेरिट से वंचित रखा गया इसलिए रिजर्वेशन दिया गया. रिजर्वेशन मेरिट के सवाल पर नहीं दिया जाता है. वंचित समाज के लोगों में मेरिट नहीं था यही डिमेरिट था, जिसकी वजह से रिजर्वेशन दिया गया है. इस बारे में दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही फैसला सुना चुकी हैं. मनु स्मृति में लिखा हुआ है कि शुद्र और स्त्रियों को धन और शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है. शिक्षा हासिल करने वाले के कान में शीशा पिघला कर डाल दिया जाएगा. इसका मतलब ये हुआ कि पूर्व में सवर्ण तबके ने शोषित समाज के लोगों को धन और शिक्षा से वंचित कर दिया. ऐसी स्थिति में मेरिट का सवाल कहा से उठता है? जब आपने निचले तबके को पढ़ने ही नहीं दिया तो इस सवाल का कोई औचित्य नहीं है. इसलिए संविधान सभा में जब बहस हुई तो साफ कहा गया कि मेरिट का रिजर्वेशन से कोई मतलब नहीं है. जब मेरिट का अवसर ही नहीं मिला तो मेरिट के साथ इसकी तुलना ही क्यों की जाती है.
मेरिट क्या होता है? अगर इसे सही तरीके से परिभाषित करें तो मेरिट को लेकर हंगामा मचाने वालों को बात समझ में आ जाएगी. मेरिट उसे कहते है जो अपने श्रम के द्वारा कोई व्यक्ति नई चीज उत्पादित करता है. जो सोसाइटी के लिए भी उपयोगी हो. मेरिट का मतलब ये नहीं है कि हमने किताब को पढ़ लिया.
उदाहरण के तौर पर स्कूल से दो बच्चे को चुनते हैं. उनमें से एक बच्चा आदिवासी इलाके का है जबकि दूसरा एलिट घराने का. अब इन दोनों से दाल के अलग-अलग किस्म पहचानने को कहें तो आदिवासी बच्चा सभी दालों की पहचान बता देगा, लेकिन एलिट घराने का बच्चा दालों की पहचान नहीं बता पाएगा. इन हालातों में मेरिट क्या है, यह किसके पास है? जो प्रकृति के साथ, श्रम के साथ उत्पादन की प्रक्रिया में जीता है वो मेरिट के दायरे में है. मेरिट का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान होना ही नहीं है. मेरिट का मतलब ये है कि जो प्रकृति को जाने और जानने की इच्छा रखें. सोसाइटी को बचाए रखने के लिए जिसके पास सृजनात्मक क्षमता हो, वो मेरिट कहलाता है. हमारे ही पैदा किए अन्न पर ब्रह्मणवाद और एलिट वर्ग भोजन करते हैं और एक बार भी मेहनत करने के लिए खेत में नही जाते हैं. ये हमारी मेरिट है कि हम आपको भोजन देने में सक्षम है. मेरिट ये नहीं है कि हम आपके मुंह में श्लोक दे रहे हैं.
एलिट वर्ग, जो अंग्रेजी बोलता और उस भाषा में पढाई करता है तो उसके पास मेरिट है. और जो गांव में रहकर हिंदी में पढाई करता है उसके पास मेरिट नहीं है. ये सोच सही नहीं है. मेरिट का मतलब अंग्रेजी में पढाई करना भर ही नहीं है. दरअसल ब्रह्मणवाद और पूंजीवाद भी मेरिट के इसी लकीर को पकड़कर रखना चाहते हैं. ब्रह्मणवाद और पूंजीवाद भी यही चाहता है कि वंचित लोगों को अंग्रेजी जुबान में नौकरी देंगे, लेकिन इस जुबान में पढने भी नहीं देंगे. इसका सीधा मतलब ये है कि खास जुबा़न में खास पूंजीपति वर्ग पढे़गा और उन्हीं खास लोगों के लिए नौकरी का भी इंतजाम करेगा. आज के समय में रोजगार देने का सवाल कौन तय करता है? ये इस देश की सरकार, सरकार में बैठे लोगों का चरित्रा तय करता है. मेरिट का मतलब अंग्रेजी और किताबी ज्ञान ही होता तो रूस, जापान और चीन जैसे देशों का विकास नहीं होता. इन देशों में अंग्रेजी नहीं होने के बावजूद इनका विकास हमसे बेहतर हुआ है. ये सच्चाई छुपने वाली नहीं है.
एक खास वर्ग चाहता है कि सच के आग को राख से ढक कर रखा जाए तो ये संभव नहीं है. देश में होने वाला प्राइवेटाइजेशन, डिमेरिटाइजेशन है. प्राइवेटाइजेशन का मतलब-मेरिट को डिमेरिट में बदलना है. इस बार दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों ने दाखिले के लिए 100 प्रतिशत कट ऑफ लिस्ट जारी किया. आखिर इस कट ऑफ लिस्ट का क्या मतलब है? ये एक साजिश है ग्रामीण पृष्ठ के बच्चों को अच्छे कॉलेजों से वंचित रखने की. आज 100 फीसदी रिजल्ट निकालने के लिए ज्यादातर सीबीएसई का स्कूल पहले ही प्रश्न की जानकारी दे देता है, यहां तक की उत्तर भी ब्लैक बोर्ड पर लिख दिया जाता है, ताकि रिजल्ट 100 प्रतिशत हो. प्राइवेट स्कूल प्रतिशत बनाए रखने के लिए चोरी तक कराने से नहीं चूक रहे. वहीं गांव का कोई बच्चा दिन-रात मेहनत करता है और 60 प्रतिशत नंबर लाता है तो उसे मेरिट नहीं है. ये कैसी व्यवस्था है. दरअसल 100 प्रतिशत कट ऑफ लिस्ट वाले बच्चे की मेरिट कम नहीं है बल्कि उस स्कूल का मेरिट कम है जो शिक्षा का व्यवसायिकरण बनाए रखने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है. असल में पूंजीवाद और बाजारवाद की दुनिया में मेरिट की अपनी परिभाषा गढी जा रही है.
जो छात्रा-छात्राएं मेरिट और 100 फीसदी कट ऑफ लिस्ट के नाम पर दिल्ली के नामी-गिरामी कॉलेजों में दाखिला लेते हैं, उन छात्रा-छात्राओं की मेरिट स्नातक करते-करते हवा हो जाती है. यानि उनका प्रतिशत घटकर 60 फीसदी के आस-पास आ जाता है. आखिर 100 फीसदी वाला मेरिट कहां छूमंतर हो जाता है? ये साबित करता है कि निजीकरण कैसे अशिक्षाकरण को बढ़ावा दे रहा है. नॉलेज कमिशन को सरकार कितना भी बना लें, उससे कुछ नहीं होने वाला है. देश में ज्यादातर कोचिंग संस्थान प्रश्न पत्र लीक करने के जुगाड़ में होते है ताकि मेरिट के नाम पर कमाई की जा सके. यही वजह है कि समय-समय पर पर्चे लीक होने की जानकारी मिलती रहती है. ऐसे में गरीब के बच्चे/ओबीसी/एससी/एसटी के बच्चे महंगे कोचिंग क्लासेस में कहां से पढाई करेंगे. सामाजिक न्याय को पूंजीवाद और ब्रह्मणवाद ने काफी हानि पहुंचाया है. जागरुक लोगों को ये बात सोचना काफी जरुरी है. ऐसा नहीं है कि सरकार इन सभी बातों से अंजान है. लेकिन सरकार किसी खास वर्ग की होती है. ऐसे में मेरिट और रिजर्वेशन को लेकर जो लोग भी तर्क-वितर्क करते हें वो बेमानी है.
(शिल्पकार टाइम्स के सिनियर असिस्टेंट एडिटर पंकज कुमार द्वारा की गई बातचीत पर आधारित. साभारःशिल्पकार टाइम्स)
देश में मेरिट और डीमेरिट को लेकर न्यायालय ने साफ तौर पर कहा है कि रिजर्वेशन का मेरिट से कोई लेना-देना नहीं है. इतिहास में निचले तबके को मेरिट से वंचित रखा गया इसलिए रिजर्वेशन दिया गया. रिजर्वेशन मेरिट के सवाल पर नहीं दिया जाता है. वंचित समाज के लोगों में मेरिट नहीं था यही डिमेरिट था, जिसकी वजह से रिजर्वेशन दिया गया है. इस बारे में दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही फैसला सुना चुकी हैं. मनु स्मृति में लिखा हुआ है कि शुद्र और स्त्रियों को धन और शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है. शिक्षा हासिल करने वाले के कान में शीशा पिघला कर डाल दिया जाएगा. इसका मतलब ये हुआ कि पूर्व में सवर्ण तबके ने शोषित समाज के लोगों को धन और शिक्षा से वंचित कर दिया. ऐसी स्थिति में मेरिट का सवाल कहा से उठता है? जब आपने निचले तबके को पढ़ने ही नहीं दिया तो इस सवाल का कोई औचित्य नहीं है. इसलिए संविधान सभा में जब बहस हुई तो साफ कहा गया कि मेरिट का रिजर्वेशन से कोई मतलब नहीं है. जब मेरिट का अवसर ही नहीं मिला तो मेरिट के साथ इसकी तुलना ही क्यों की जाती है.
मेरिट क्या होता है? अगर इसे सही तरीके से परिभाषित करें तो मेरिट को लेकर हंगामा मचाने वालों को बात समझ में आ जाएगी. मेरिट उसे कहते है जो अपने श्रम के द्वारा कोई व्यक्ति नई चीज उत्पादित करता है. जो सोसाइटी के लिए भी उपयोगी हो. मेरिट का मतलब ये नहीं है कि हमने किताब को पढ़ लिया.
उदाहरण के तौर पर स्कूल से दो बच्चे को चुनते हैं. उनमें से एक बच्चा आदिवासी इलाके का है जबकि दूसरा एलिट घराने का. अब इन दोनों से दाल के अलग-अलग किस्म पहचानने को कहें तो आदिवासी बच्चा सभी दालों की पहचान बता देगा, लेकिन एलिट घराने का बच्चा दालों की पहचान नहीं बता पाएगा. इन हालातों में मेरिट क्या है, यह किसके पास है? जो प्रकृति के साथ, श्रम के साथ उत्पादन की प्रक्रिया में जीता है वो मेरिट के दायरे में है. मेरिट का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान होना ही नहीं है. मेरिट का मतलब ये है कि जो प्रकृति को जाने और जानने की इच्छा रखें. सोसाइटी को बचाए रखने के लिए जिसके पास सृजनात्मक क्षमता हो, वो मेरिट कहलाता है. हमारे ही पैदा किए अन्न पर ब्रह्मणवाद और एलिट वर्ग भोजन करते हैं और एक बार भी मेहनत करने के लिए खेत में नही जाते हैं. ये हमारी मेरिट है कि हम आपको भोजन देने में सक्षम है. मेरिट ये नहीं है कि हम आपके मुंह में श्लोक दे रहे हैं.
एलिट वर्ग, जो अंग्रेजी बोलता और उस भाषा में पढाई करता है तो उसके पास मेरिट है. और जो गांव में रहकर हिंदी में पढाई करता है उसके पास मेरिट नहीं है. ये सोच सही नहीं है. मेरिट का मतलब अंग्रेजी में पढाई करना भर ही नहीं है. दरअसल ब्रह्मणवाद और पूंजीवाद भी मेरिट के इसी लकीर को पकड़कर रखना चाहते हैं. ब्रह्मणवाद और पूंजीवाद भी यही चाहता है कि वंचित लोगों को अंग्रेजी जुबान में नौकरी देंगे, लेकिन इस जुबान में पढने भी नहीं देंगे. इसका सीधा मतलब ये है कि खास जुबा़न में खास पूंजीपति वर्ग पढे़गा और उन्हीं खास लोगों के लिए नौकरी का भी इंतजाम करेगा. आज के समय में रोजगार देने का सवाल कौन तय करता है? ये इस देश की सरकार, सरकार में बैठे लोगों का चरित्रा तय करता है. मेरिट का मतलब अंग्रेजी और किताबी ज्ञान ही होता तो रूस, जापान और चीन जैसे देशों का विकास नहीं होता. इन देशों में अंग्रेजी नहीं होने के बावजूद इनका विकास हमसे बेहतर हुआ है. ये सच्चाई छुपने वाली नहीं है.
एक खास वर्ग चाहता है कि सच के आग को राख से ढक कर रखा जाए तो ये संभव नहीं है. देश में होने वाला प्राइवेटाइजेशन, डिमेरिटाइजेशन है. प्राइवेटाइजेशन का मतलब-मेरिट को डिमेरिट में बदलना है. इस बार दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों ने दाखिले के लिए 100 प्रतिशत कट ऑफ लिस्ट जारी किया. आखिर इस कट ऑफ लिस्ट का क्या मतलब है? ये एक साजिश है ग्रामीण पृष्ठ के बच्चों को अच्छे कॉलेजों से वंचित रखने की. आज 100 फीसदी रिजल्ट निकालने के लिए ज्यादातर सीबीएसई का स्कूल पहले ही प्रश्न की जानकारी दे देता है, यहां तक की उत्तर भी ब्लैक बोर्ड पर लिख दिया जाता है, ताकि रिजल्ट 100 प्रतिशत हो. प्राइवेट स्कूल प्रतिशत बनाए रखने के लिए चोरी तक कराने से नहीं चूक रहे. वहीं गांव का कोई बच्चा दिन-रात मेहनत करता है और 60 प्रतिशत नंबर लाता है तो उसे मेरिट नहीं है. ये कैसी व्यवस्था है. दरअसल 100 प्रतिशत कट ऑफ लिस्ट वाले बच्चे की मेरिट कम नहीं है बल्कि उस स्कूल का मेरिट कम है जो शिक्षा का व्यवसायिकरण बनाए रखने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है. असल में पूंजीवाद और बाजारवाद की दुनिया में मेरिट की अपनी परिभाषा गढी जा रही है.
जो छात्रा-छात्राएं मेरिट और 100 फीसदी कट ऑफ लिस्ट के नाम पर दिल्ली के नामी-गिरामी कॉलेजों में दाखिला लेते हैं, उन छात्रा-छात्राओं की मेरिट स्नातक करते-करते हवा हो जाती है. यानि उनका प्रतिशत घटकर 60 फीसदी के आस-पास आ जाता है. आखिर 100 फीसदी वाला मेरिट कहां छूमंतर हो जाता है? ये साबित करता है कि निजीकरण कैसे अशिक्षाकरण को बढ़ावा दे रहा है. नॉलेज कमिशन को सरकार कितना भी बना लें, उससे कुछ नहीं होने वाला है. देश में ज्यादातर कोचिंग संस्थान प्रश्न पत्र लीक करने के जुगाड़ में होते है ताकि मेरिट के नाम पर कमाई की जा सके. यही वजह है कि समय-समय पर पर्चे लीक होने की जानकारी मिलती रहती है. ऐसे में गरीब के बच्चे/ओबीसी/एससी/एसटी के बच्चे महंगे कोचिंग क्लासेस में कहां से पढाई करेंगे. सामाजिक न्याय को पूंजीवाद और ब्रह्मणवाद ने काफी हानि पहुंचाया है. जागरुक लोगों को ये बात सोचना काफी जरुरी है. ऐसा नहीं है कि सरकार इन सभी बातों से अंजान है. लेकिन सरकार किसी खास वर्ग की होती है. ऐसे में मेरिट और रिजर्वेशन को लेकर जो लोग भी तर्क-वितर्क करते हें वो बेमानी है.
(शिल्पकार टाइम्स के सिनियर असिस्टेंट एडिटर पंकज कुमार द्वारा की गई बातचीत पर आधारित. साभारःशिल्पकार टाइम्स)
Labels:
dalit,
dalit mat,
merit,
Prof Malakar,
Reservation
Tuesday, August 30, 2011
एक अनावश्यक अनशन
एकसूत्रीय बिंदु पर आधारित अन्ना हजारे के अनशन ने बहुत से लोगों को अनेक कारणों से प्रभावित किया है. कुछ इसे आंदोलन कहते हैं, कुछ दूसरी आजादी की लड़ाई का नाम देते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसकी तुलना जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति से करते हैं. अन्ना के अनशन को दिल्ली और देश के दूसरे भागों में जबर्दस्त समर्थन मिला है. अनशन को असल दुनिया के साथ-साथ इंटरनेट में भी जमकर समर्थन मिला है.वेबसाइटें, फेसबुक, ट्विटर, एसएमएस आदि में अन्ना छाए रहे. इतिहास के निर्माण की ताकत वाले मीडिया ने इसे राष्ट्रव्यापी अवधारणा के रूप में पेश किया है. टीवी मीडिया देश के कोने-कोने से इस अनशन के बारे में दिन-रात सीधा प्रसारण कर रहा है. हालांकि मीडिया ने इससे असहमति और असंतोष के स्वर को बहुत कम स्थान दिया है.
सबसे पहले तो इस अनशन को आंदोलन नहीं कहा जा सकता. एक आंदोलन ऐसे लोगों के बड़े समूह का संगठित प्रयास होता है जो किसी विचारधारा और संगठन से जुड़े हों, जिनके नेतृत्व का उन पर अधिकार हो और जो एक व्यवस्था को बदलने के लिए एकजुट हुए हों. अन्ना का प्रदर्शन संगठित लोगों का प्रयास नहीं है. यह स्वत: प्रेरित लोगों का जमावड़ा है, जिन पर अन्ना हजारे का कोई नियंत्रण नहीं है. यह इस तथ्य से साबित हो जाता है कि अनशन में लोग अपनी-अपनी विचारधारा के नारे लगा रहे हैं. उदाहरण के लिए 'यूथ फार इक्वेलिटी' के कार्यकर्ता आरक्षण के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं. जब इस संबंध में अन्ना टीम के सबसे अहम सदस्य से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इन समूहों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है.
इसी प्रकार इस अनशन को जेपी आंदोलन के समान नहीं माना जा सकता. जेपी का अनशन नहीं, बल्कि एक विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन था. यह आंदोलन ऐसी सरकार के खिलाफ था, जो लोगों को गिरफ्तार कर उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन कर रही थी. इस लंबे राजनीतिक आंदोलन की आंच में तपकर अनेक नेता कुंदन बने. हालांकि इस अनशन में सरकार मात्र एक गिरफ्तारी के बाद ही धरने के लिए स्थान और अनुमति दे रही है. दूसरे, इस बात की कोई संभावना नहीं है कि अनशन में जीत हासिल करने के बाद एक राजनीतिक पार्टी का गठन किया जाएगा. यह दावा भी एक धोखा है कि इस अनशन का राष्ट्रीय चरित्र है. देश में अनेक सामाजिक और पंथिक समूह हैं, जिनका प्रतिनिधित्व इस अनशन में नहीं है. शुरू में टीम अन्ना के पांच सदस्यों में सभी पुरुष थे. इनमें एक भी महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व नहीं था. अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को योग्यता के आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस समय इन वर्गो से अनेक योग्य व्यक्ति मौजूद हैं. इसका मतलब है कि टीम हजारे की कोर कमेटी स्वनियुक्त है. न ही इनका लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचन हुआ है और न ही इन्हें लोगों ने चयनित किया है. यही नहीं, ये सिविल सोसाइटी का भी प्रतिनिधित्व नहीं करते. एक टीवी बहस में अरविंद केजरीवाल ने मुझे बताया कि वे सिविल सोसाइटी का प्रतिनिधित्व नहीं करते. बेहूदगी की हद तो तब हुई जब इसी शो में किरण बेदी ने कहा कि सिविल सोसाइटी का मतलब सभ्य समाज से है, जैसे कि राजनीतिक तबका असभ्य है. अनशन के नेताओं की समझदारी का यह स्तर है.
कोई भी यह सवाल पूछ सकता है कि जब यह एक आंदोलन नहीं है तो इतनी बड़ी संख्या में लोग इससे क्यों जुड़ रहे हैं? इसका उत्तर यह है कि भ्रष्टाचार एक चेहराविहीन शत्रु है. कोई भी एक भ्रष्ट व्यक्ति की पहचान नहीं जानता है. यहां तक कि जो लोग भ्रष्टाचार में गहरे संलिप्त रहे हैं वे आगे की पंक्तियों में बैठकर विरोध कर रहे हैं. लेकिन यदि आप इसी भीड़ को सामाजिक न्याय, दलितों के खिलाफ अत्याचार, समाज में संसाधनों के बंटवारे आदि के खिलाफ आवाज दें तो वे सभी भाग जाएंगे. इसलिए, क्योंकि तब दुश्मन का एक चेहरा या एक पहचान होगी. स्पष्ट है कि संख्या से यह अनिवार्य रूप से स्पष्ट नहीं होता कि कोई आंदोलन वैधानिक है या नहीं? क्या हम एक बड़ी भीड़ द्वारा विवादित ढांचे के ध्वंस को सही ठहरा सकते हैं? क्या ईडन गार्डन में पाकिस्तान के खिलाफ भारत का मैच देख रहे लाखों दर्शकों को देशभक्त कहा जा सकता है? फिर हम इस अनशन को सिर्फ इस आधार पर उचित कैसे कह सकते हैं कि इसमें लाखों लोग भाग ले रहे हैं?
हजारे और उनकी टीम ने भ्रष्टाचार की बड़ी संकीर्ण व्याख्या की है. वे केवल सरकारी भ्रष्टाचार को ही भ्रष्टाचार मान रहे हैं. हजारे और उनके साथी समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार का संज्ञान लेने के लिए तैयार नहीं. यह भ्रष्टाचार एक बड़ी संख्या में लोगों को संस्थानों और सरकारी नौकरियों में जाने से रोकने के साथ आरंभ हो जाता है. फिर कारपोरेट सेक्टर, मीडिया और सबसे ऊपर अंतरराष्ट्रीय और गैर-सरकारी संगठनों के भ्रष्टाचार को लोकपाल बिल में लाने की बात नहीं की जा रही है. इससे गंभीर बहस पैदा होती है. वंचित वर्ग इस पर जोर दे रहा है कि मौजूदा अनशन जानबूझकर उन संस्थानों को निशाना बना रहा है जहां थोड़ी-बहुत जातीय और धार्मिक विभिन्नता परिलक्षित होती है.
इस अनशन की विडंबना यह है कि यह अविश्वास पर आधारित है. अविश्वास संसद पर, सरकार पर और न्यायपालिका पर. हम कैसे पांच स्वयंभू नेताओं पर भरोसा कर सकते हैं, जबकि वे खुद लोकसभा के 545 और राज्यसभा के 242 निर्वाचित लोगों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं? अगर निर्वाचित प्रतिनिधि अपना काम नहीं कर पाते हैं तो हम उन्हें हर पांच वर्ष बाद बदल सकते हैं, लेकिन हम अन्ना हजारे, केजरीवाल, शांति भूषण और प्रशांत भूषण जैसे लोगों को कैसे बदल सकते हैं?
साभारः दैनिक जागरण
(लेखक डा. विवेक कुमार, जेएनयू में प्राध्यापक हैं और उभरते हुए चिंतक हैं)
सबसे पहले तो इस अनशन को आंदोलन नहीं कहा जा सकता. एक आंदोलन ऐसे लोगों के बड़े समूह का संगठित प्रयास होता है जो किसी विचारधारा और संगठन से जुड़े हों, जिनके नेतृत्व का उन पर अधिकार हो और जो एक व्यवस्था को बदलने के लिए एकजुट हुए हों. अन्ना का प्रदर्शन संगठित लोगों का प्रयास नहीं है. यह स्वत: प्रेरित लोगों का जमावड़ा है, जिन पर अन्ना हजारे का कोई नियंत्रण नहीं है. यह इस तथ्य से साबित हो जाता है कि अनशन में लोग अपनी-अपनी विचारधारा के नारे लगा रहे हैं. उदाहरण के लिए 'यूथ फार इक्वेलिटी' के कार्यकर्ता आरक्षण के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं. जब इस संबंध में अन्ना टीम के सबसे अहम सदस्य से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इन समूहों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है.
इसी प्रकार इस अनशन को जेपी आंदोलन के समान नहीं माना जा सकता. जेपी का अनशन नहीं, बल्कि एक विशुद्ध राजनीतिक आंदोलन था. यह आंदोलन ऐसी सरकार के खिलाफ था, जो लोगों को गिरफ्तार कर उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन कर रही थी. इस लंबे राजनीतिक आंदोलन की आंच में तपकर अनेक नेता कुंदन बने. हालांकि इस अनशन में सरकार मात्र एक गिरफ्तारी के बाद ही धरने के लिए स्थान और अनुमति दे रही है. दूसरे, इस बात की कोई संभावना नहीं है कि अनशन में जीत हासिल करने के बाद एक राजनीतिक पार्टी का गठन किया जाएगा. यह दावा भी एक धोखा है कि इस अनशन का राष्ट्रीय चरित्र है. देश में अनेक सामाजिक और पंथिक समूह हैं, जिनका प्रतिनिधित्व इस अनशन में नहीं है. शुरू में टीम अन्ना के पांच सदस्यों में सभी पुरुष थे. इनमें एक भी महिला, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व नहीं था. अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को योग्यता के आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस समय इन वर्गो से अनेक योग्य व्यक्ति मौजूद हैं. इसका मतलब है कि टीम हजारे की कोर कमेटी स्वनियुक्त है. न ही इनका लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचन हुआ है और न ही इन्हें लोगों ने चयनित किया है. यही नहीं, ये सिविल सोसाइटी का भी प्रतिनिधित्व नहीं करते. एक टीवी बहस में अरविंद केजरीवाल ने मुझे बताया कि वे सिविल सोसाइटी का प्रतिनिधित्व नहीं करते. बेहूदगी की हद तो तब हुई जब इसी शो में किरण बेदी ने कहा कि सिविल सोसाइटी का मतलब सभ्य समाज से है, जैसे कि राजनीतिक तबका असभ्य है. अनशन के नेताओं की समझदारी का यह स्तर है.
कोई भी यह सवाल पूछ सकता है कि जब यह एक आंदोलन नहीं है तो इतनी बड़ी संख्या में लोग इससे क्यों जुड़ रहे हैं? इसका उत्तर यह है कि भ्रष्टाचार एक चेहराविहीन शत्रु है. कोई भी एक भ्रष्ट व्यक्ति की पहचान नहीं जानता है. यहां तक कि जो लोग भ्रष्टाचार में गहरे संलिप्त रहे हैं वे आगे की पंक्तियों में बैठकर विरोध कर रहे हैं. लेकिन यदि आप इसी भीड़ को सामाजिक न्याय, दलितों के खिलाफ अत्याचार, समाज में संसाधनों के बंटवारे आदि के खिलाफ आवाज दें तो वे सभी भाग जाएंगे. इसलिए, क्योंकि तब दुश्मन का एक चेहरा या एक पहचान होगी. स्पष्ट है कि संख्या से यह अनिवार्य रूप से स्पष्ट नहीं होता कि कोई आंदोलन वैधानिक है या नहीं? क्या हम एक बड़ी भीड़ द्वारा विवादित ढांचे के ध्वंस को सही ठहरा सकते हैं? क्या ईडन गार्डन में पाकिस्तान के खिलाफ भारत का मैच देख रहे लाखों दर्शकों को देशभक्त कहा जा सकता है? फिर हम इस अनशन को सिर्फ इस आधार पर उचित कैसे कह सकते हैं कि इसमें लाखों लोग भाग ले रहे हैं?
हजारे और उनकी टीम ने भ्रष्टाचार की बड़ी संकीर्ण व्याख्या की है. वे केवल सरकारी भ्रष्टाचार को ही भ्रष्टाचार मान रहे हैं. हजारे और उनके साथी समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार का संज्ञान लेने के लिए तैयार नहीं. यह भ्रष्टाचार एक बड़ी संख्या में लोगों को संस्थानों और सरकारी नौकरियों में जाने से रोकने के साथ आरंभ हो जाता है. फिर कारपोरेट सेक्टर, मीडिया और सबसे ऊपर अंतरराष्ट्रीय और गैर-सरकारी संगठनों के भ्रष्टाचार को लोकपाल बिल में लाने की बात नहीं की जा रही है. इससे गंभीर बहस पैदा होती है. वंचित वर्ग इस पर जोर दे रहा है कि मौजूदा अनशन जानबूझकर उन संस्थानों को निशाना बना रहा है जहां थोड़ी-बहुत जातीय और धार्मिक विभिन्नता परिलक्षित होती है.
इस अनशन की विडंबना यह है कि यह अविश्वास पर आधारित है. अविश्वास संसद पर, सरकार पर और न्यायपालिका पर. हम कैसे पांच स्वयंभू नेताओं पर भरोसा कर सकते हैं, जबकि वे खुद लोकसभा के 545 और राज्यसभा के 242 निर्वाचित लोगों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं? अगर निर्वाचित प्रतिनिधि अपना काम नहीं कर पाते हैं तो हम उन्हें हर पांच वर्ष बाद बदल सकते हैं, लेकिन हम अन्ना हजारे, केजरीवाल, शांति भूषण और प्रशांत भूषण जैसे लोगों को कैसे बदल सकते हैं?
साभारः दैनिक जागरण
(लेखक डा. विवेक कुमार, जेएनयू में प्राध्यापक हैं और उभरते हुए चिंतक हैं)
Labels:
Anna hajare,
dalit,
dalit mat,
dr. vivek kumar,
media,
news
लोकपाल बिल में सुझाव देगा 'सोशल जस्टिस फोरम'
लोकपाल में वंचित तबके की भागीदारी और उनके हितों की रक्षा को लेकर ‘सोशल जस्टिस फोरम’ का गठन किया गया है. यह फोरम स्टैंडिंग कमेटी के सामने अपना सुझाव रखने की तैयारी में है. दलित एवं पिछड़े समाज से ताल्लुक रखने वाले सोशल एक्टिविस्ट, बुद्धिजीवियों और एनजीओ का यह संगठन अपनी पांच मांगों को स्टैंडिंग कमेटी के सामने रखेगा. 31 अगस्त को इस संबंध में दिल्ली के Indian social institute में फोरम के कोर ग्रुप की एक बैठक होनी है, जहां इसके तमाम पहलुओं पर चर्चा होगी. 5 सितंबर को इस फोरम द्वारा अंबेडकर भवन से जंतर-मंतर तक एक रैली निकाली जाएगी.
जिन पांच मांगों को स्टैंडिंग कमेटी के सामने रखने का निर्णय लिया गया है, उनमें सर्च कमेटी, सेलेक्शन कमेटी, लोकपाल और जांच एजेंसी में अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यक प्रतिनिधि को शामिल किए जाने की मांग की गई है. अनुसूचित जाति/जनजाति के खिलाफ लोकपाल के समक्ष आने वाले मामले को लोकपाल से पहले अनुसूचित जाति आयोग के पास ले जाने की मांग भी उठाई जा रही है. फोरम में शामिल लोगों का कहना है कि वंचित तबके से ताल्लुक रखने वाले अधिकारियों को लेकर सवर्ण समाज में जातिगत पूर्वाग्रह रहता है. इसके चलते अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान किया जाता है. फोरम जिन पांच मांगों को स्टैंडिंग कमेटी के सामने पेश करने की तैयारी में है, उनमें-
1. सर्च कमेटी, सेलेक्शन कमेटी, लोकपाल और जांच एजेंसी में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों का भी प्रतिनिधित्व हो.
2. फोरम ने कॉरपोरेट में फैले भ्रष्टाचार, मीडिया के भ्रष्टाचार, एनजीओ, पंचायत, म्युनिसिपैलिटी और म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन जैसी स्वायत संस्थाओं को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग की है. अनुसूचित जाति/जनजाति के विकास की योजनाओं के लिए मिलने वाले पैसे को दूसरे मद में खर्च किए जाने और इनके विकास के लिए आवंटित होने वाले सब प्लान के फंड के उचित इस्तेमाल नहीं होने पर इसे भी भ्रष्टाचार के दायरे में लाया जाए.
3. अनुसूचित जाति/जनजाति से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ आने वाली शिकायत को पहले अनुसूचित जाति आयोग और जनजाति आयोग को भेजा जाए. आयोग यह जांच करे कि उस पर भ्रष्टाचार का आरोप जातिगत आधार पर लगाया गया है या फिर वो वास्तव में दोषी है.
4. संविधान में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कल्याण के लिए उल्लिखित किसी भी सिद्धांत या बिंदु को न छुआ जाए.
5. लोकपाल बिल पास करने से पहले हमारी सभी मांगों पर भी बहस हो.
जिन पांच मांगों को स्टैंडिंग कमेटी के सामने रखने का निर्णय लिया गया है, उनमें सर्च कमेटी, सेलेक्शन कमेटी, लोकपाल और जांच एजेंसी में अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यक प्रतिनिधि को शामिल किए जाने की मांग की गई है. अनुसूचित जाति/जनजाति के खिलाफ लोकपाल के समक्ष आने वाले मामले को लोकपाल से पहले अनुसूचित जाति आयोग के पास ले जाने की मांग भी उठाई जा रही है. फोरम में शामिल लोगों का कहना है कि वंचित तबके से ताल्लुक रखने वाले अधिकारियों को लेकर सवर्ण समाज में जातिगत पूर्वाग्रह रहता है. इसके चलते अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान किया जाता है. फोरम जिन पांच मांगों को स्टैंडिंग कमेटी के सामने पेश करने की तैयारी में है, उनमें-
1. सर्च कमेटी, सेलेक्शन कमेटी, लोकपाल और जांच एजेंसी में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों का भी प्रतिनिधित्व हो.
2. फोरम ने कॉरपोरेट में फैले भ्रष्टाचार, मीडिया के भ्रष्टाचार, एनजीओ, पंचायत, म्युनिसिपैलिटी और म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन जैसी स्वायत संस्थाओं को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग की है. अनुसूचित जाति/जनजाति के विकास की योजनाओं के लिए मिलने वाले पैसे को दूसरे मद में खर्च किए जाने और इनके विकास के लिए आवंटित होने वाले सब प्लान के फंड के उचित इस्तेमाल नहीं होने पर इसे भी भ्रष्टाचार के दायरे में लाया जाए.
3. अनुसूचित जाति/जनजाति से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ आने वाली शिकायत को पहले अनुसूचित जाति आयोग और जनजाति आयोग को भेजा जाए. आयोग यह जांच करे कि उस पर भ्रष्टाचार का आरोप जातिगत आधार पर लगाया गया है या फिर वो वास्तव में दोषी है.
4. संविधान में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कल्याण के लिए उल्लिखित किसी भी सिद्धांत या बिंदु को न छुआ जाए.
5. लोकपाल बिल पास करने से पहले हमारी सभी मांगों पर भी बहस हो.
Monday, August 29, 2011
दलितों को ‘धन्य’ कर गया अन्ना का आंदोलन
तब रामलीला मैदान में मेला लगा था. ‘अन्ना मेला’. बड़ी भीड़ थी. हजारों लोग पहुंचे थे मैदान में. अन्ना को अनशन जो तोड़ना था. वह अन्ना जो पिछले बारह दिनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर के लाखों लोगों की आवाज बना था. तभी मीडिया में खबरें चलने लगी कि अन्ना एक दलित और एक मुस्लिम बच्ची के हाथ से अपना अनशन तोड़ेंगे. चौंकना लाजिमी था. ‘दलित बच्ची’, ‘मुस्लिम बच्ची’ ये दोनों शब्द बेध से रहे थे. लगा, बारह दिन के अनशन की कलई खुल गई हो. इसी दिन अचानक से मंच पर अंबेडकर भी प्रकट हो गए थे. अन्ना के रणबांकुरों का ह्रदय परिवर्तन हो चुका था. ‘बाबा साहब का भारत, बाबा साहब का संविधान, बाबा साहब की जय’. एक बार फिर चौंका. अब यकीन हो चुका था कि आंदोलन अपने असली रंग में आ चुका है.
अन्ना के दरबार में सीना ताने उनके मंत्री मंच के चारो ओर घुमड़ रहे थे. पिछले शाम की जीत ने उन्हें मदहोश कर दिया था. राजनीतिक बिसात बिछ चुकी थी. पहले मुख्य सेनापति पधारे. इनकी खासियत यह है कि ये दलितों और पिछड़ों को मिलने वाले आरक्षण के घोर विरोधी हैं. आते ही इन्होंने बाबा साहब का जयकारा करवाया. आप खुद सोचिए कि आरक्षण का विरोध करने वाले व्यक्ति की जुबान पर जब बाबा साहब का नाम हो तो उसके दिल में क्या चल रहा होगा. खैर, उसने बाबा साहब का जयकारा करवाया. अमूमन नारे लगाने के वक्त रामलीला मैदान की गूंज पूरे चांदनी चौक में सुनाई देती थी. लेकिन इस बार आवाज जरा धीमी आई. बाबा साहब पर लेख पढ़ा गया. उनके संविधान की दुहाई दी गई कि हम इसकी इज्जत करते हैं. ध्यान रहे, ये बातें वो लोग कर रहे थे जिन्होंने आंदोलन शुरू करने से लेकर आंदोलन खत्म करने तक हर पल संविधान को तोड़ने की बात कही थी. संविधान को बदलने की बात की थी. संसद में लोकपाल पर चर्चा के दौरान शरद यादव का सवाल वाजिब था कि अन्ना ने हर पल गांधी की बात की, शिवाजी को याद किया, लेकिन वह अपने प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले देश के दो महान विभूतियों अंबेडकर और फुले को भूल गए. सोचना होगा. भूल गए या फिर याद ही नहीं किया. मंच से इस तरह की बातों ने अन्ना के आंदोलन की कलई खोल दी थी.
रही-सही कसर दो खास समुदाय की बच्चियों से अन्ना का अनशन तुड़वाने की घोषणा कर के किया गया. अब तक लोकपाल के समूचे आंदोलन में दलितों और मुसलमानों को कभी भी शामिल नहीं किया गया था. लेकिन जिस तरीके से इन दोनों समुदाय के बच्चों को सामने लाया गया उसने ब्राह्मणवादी सोच का एक घिनौना चेहरा पेश किया. कोर टीम से जुड़े एक कवि महोदय बार-बार मंच से घोषणा कर रहे थे और दोनों बच्चों की जात और धर्म बता रहे थे. गोया कह रहे हों ‘’ए दलितों...ए पिछड़ों...ए मुसलमानों. तुमने हमारा बहुत विरोध किया. लेकिन देखो, देखो कि हम कितने उदार हैं. तुम्हारे बच्चों के हाथ से पानी पी लिया. हमने तुम पर अहसान किया. अब जाओ तुम्हारी कौम पवित्र हो गई. अब विरोध छोड़ो. हमें लोकपाल बनाने दो. अगली बार फिर आंदोलन करेंगे तो तुम लोग साथ देना. हम तुम्हारी कौम को फिर से धन्य कर देंगे.’’
अन्ना के दरबार में सीना ताने उनके मंत्री मंच के चारो ओर घुमड़ रहे थे. पिछले शाम की जीत ने उन्हें मदहोश कर दिया था. राजनीतिक बिसात बिछ चुकी थी. पहले मुख्य सेनापति पधारे. इनकी खासियत यह है कि ये दलितों और पिछड़ों को मिलने वाले आरक्षण के घोर विरोधी हैं. आते ही इन्होंने बाबा साहब का जयकारा करवाया. आप खुद सोचिए कि आरक्षण का विरोध करने वाले व्यक्ति की जुबान पर जब बाबा साहब का नाम हो तो उसके दिल में क्या चल रहा होगा. खैर, उसने बाबा साहब का जयकारा करवाया. अमूमन नारे लगाने के वक्त रामलीला मैदान की गूंज पूरे चांदनी चौक में सुनाई देती थी. लेकिन इस बार आवाज जरा धीमी आई. बाबा साहब पर लेख पढ़ा गया. उनके संविधान की दुहाई दी गई कि हम इसकी इज्जत करते हैं. ध्यान रहे, ये बातें वो लोग कर रहे थे जिन्होंने आंदोलन शुरू करने से लेकर आंदोलन खत्म करने तक हर पल संविधान को तोड़ने की बात कही थी. संविधान को बदलने की बात की थी. संसद में लोकपाल पर चर्चा के दौरान शरद यादव का सवाल वाजिब था कि अन्ना ने हर पल गांधी की बात की, शिवाजी को याद किया, लेकिन वह अपने प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले देश के दो महान विभूतियों अंबेडकर और फुले को भूल गए. सोचना होगा. भूल गए या फिर याद ही नहीं किया. मंच से इस तरह की बातों ने अन्ना के आंदोलन की कलई खोल दी थी.
रही-सही कसर दो खास समुदाय की बच्चियों से अन्ना का अनशन तुड़वाने की घोषणा कर के किया गया. अब तक लोकपाल के समूचे आंदोलन में दलितों और मुसलमानों को कभी भी शामिल नहीं किया गया था. लेकिन जिस तरीके से इन दोनों समुदाय के बच्चों को सामने लाया गया उसने ब्राह्मणवादी सोच का एक घिनौना चेहरा पेश किया. कोर टीम से जुड़े एक कवि महोदय बार-बार मंच से घोषणा कर रहे थे और दोनों बच्चों की जात और धर्म बता रहे थे. गोया कह रहे हों ‘’ए दलितों...ए पिछड़ों...ए मुसलमानों. तुमने हमारा बहुत विरोध किया. लेकिन देखो, देखो कि हम कितने उदार हैं. तुम्हारे बच्चों के हाथ से पानी पी लिया. हमने तुम पर अहसान किया. अब जाओ तुम्हारी कौम पवित्र हो गई. अब विरोध छोड़ो. हमें लोकपाल बनाने दो. अगली बार फिर आंदोलन करेंगे तो तुम लोग साथ देना. हम तुम्हारी कौम को फिर से धन्य कर देंगे.’’
Tuesday, August 23, 2011
अन्ना के आंदोलन पर 'दलित' राय
अन्ना के आंदोलन पर पिछले दिनों में काफी बातें हुई है. यह बहस का मुद्दा बन चुका है कि जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और उनके सहयोगी आंदोलन चला रही है क्या वह पूरे समाज का आंदोलन है या फिर समाज का एक विशेष तबका यह आंदोल चला रहा है. पिछले दिनों में फेसबुकिया दुनिया में भी इस आंदोलन को लेकर बवाल मचा हुआ है. इस पूरी प्रक्रिया में दलितों के लिए कुछ नहीं है और दलितों का प्रतिनिधित्व नहीं है, यह बात भी हो रही है. हर कोई अपने-अपने विचारों को रख रहा है. इसी क्रम में 'दलित मत' ने विभिन्न मंचों पर दलित समाज का नेतृत्व करने वाले लेखकों, चिंतकों, बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और समाजसेवी से बात की. उनका 'मत' जानने की कोशिश की. पेश है...
डा. विवेक कुमार (प्रध्यापक, समाजशास्त्र विभाग, जेएनयू)
प्रजातंत्र बाहें मरोड़ने से नहीं चलता. दूसरी बात, भ्रष्टाचार की जो परिभाषा है वह बहुत संकुचित और सीमित है. यह केवल सरकारी भ्रष्टाचार की बात करता है, जबकि पूरे देश की संरचना में भ्रष्टाचार व्याप्त है. जिसमें लोगों के मानव अधिकारों का हनन, असमानता का व्यवहार और व्यक्तिगत पृथकता व्याप्त है. भगवान को चढ़ावा चढ़ाने का और पाप कर के गंगा नहाने का भी प्रावधान है. हजारों टन सोना मंदिरों में मौजूद है. सोना चढ़ाने वाले क्या रसीद देते हैं कि उन्होंने कहां से खरीदा, टैक्स दिया कि नहीं. जिस तरह सरकार लाखों करोड़ों रुपये का कारपोरेट टेक्स, एक्साइज ड्यूटी और इंपोर्ट ड्यूटी जिस तरह एक बार में माफ कर देती है, क्या यह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है या फिर आएगा? अगर आएगा तो इसमें जन लोकपाल बिल क्या करेगा.
अगर आप 542 प्रतिनिधियों पर विश्वास नहीं कर रहे हो तो मैं पांच स्वघोषित प्रतिनिधियों पर कैसे भरोसा कर लूं. यहीं पर प्रजातांत्रिक प्रणाली की अवहेलना हो रही है, क्योंकि वो तो चुन कर आए हैं. जनता ने चुन कर भेजा है. लेकिन ये जो पांच लोग है वो स्वघोषित हैं. जनता ने इन्हें चुना नहीं है बल्कि इनके बैठ जाने के बाद लोग आए हैं. जहां तक लाखों लोगों का समर्थन मिलने की बात कही जा रही है तो अगर लाखों लोग जाकर बाबरी मस्जिद तोड़ रहे थे तो क्या वो जायज है? कानूनन क्या जायज है कि आप प्राइवेट बिल को पास करने के लिए कहे, जबकि संसद मौजूद है. आप उसी राजनीति को धत्ता बताते हो. कहते हो कि पूरा सिस्टम खराब है और दूसरी ओर उसी राजनीतिज्ञों के पास जाकर गिरगिरा रहे हो कि हमें बैठने की इजाजत दो, हमारा बिल पास कर दो. आप प्रजातंत्र की हमारी स्थापित संस्थाओं का गला घोंट रहे हैं. ये लोग आम जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.
इस देश में यह कौन तय करेगा कि भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मसला है कि भूख सबसे बड़ा मसला है. हमारी 70 फीसदी जनता जो हर दिन महज 20 रुपये कमाती है, वो किस तरह घूस देगी? जो लोग सत्ता की संस्थाओं में काबिज हैं चाहे वो राजनीति में हो, ब्यूरोक्रेसी में हो, इंडस्ट्री में हो या फिर यूनिवर्सिटी में हो, जरा अनुपात देखिए कि कौन लोग हैं जो इन पर काबिज हैं. एकछत्र राज कायम कर रखा है. उसी के खिलाफ अन्ना आंदोलन कर रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि अन्ना स्वतः सवर्ण समाज के खिलाफ ही आंदोलन कर रहे हैं और राष्ट्र को शामिल करने की बात कर रहे हैं. तो यह कहीं न कहीं विरोधाभाष है. यह पूरे समाज का आंदोलन नहीं है.
चंद्रभान प्रसाद (लेखक एवं चिंतक)
अन्ना का आंदोलन अपर कास्ट का आंदोलन है. यह संविधान पर सवाल खड़े कर रहा है, संसद और लोकतंत्र पर सवाल उठा रहा है. जहां तक सिविल सोसाइटी द्वारा आंदोलन की बात है तो सवाल उठता है कि क्या भारत सिविल सोसाइटी यानि सभ्य समाज बन चुका है? जाति के प्रारूप के मौजूद रहते कोई समाज, सभ्य समाज कैसे बन सकता है? हां, यह प्रक्रिया जारी है. जब एनडीए सरकार आई थी तो उसका सबसे पसंदीदा विषय था ‘रिव्यू ऑफ कांस्टीट्यूशन’. इसके बहाने वह एक तबके को खुश कर रही थी. यानि की संविधान के विरुद्ध समाज के एक तबके में एक Sentiment (विचार) है. क्योंकि संविधान के पहले चाहे अंग्रेजों का राज रहा हो या फिर मुगलों का, सब कुछ अपर कॉस्ट के हाथ में था.
संविधान के बनने के बाद लोकतंत्र के आने से ही उनका एकाधिकार टूटा है. अपर कॉस्ट में जो अधिक कंजरवेटिव तबका है उसके दिमाग में यह बात हमेशा रही है कि संविधान की वजह से हमारा नुकसान हुआ है. उसको ERUPT (दबी भावनाओं का बाहर आना) करने का एक मौका मिला है. जैसे आपने देखा होगा कि ब्रिटेन में, इटली में अचानक दंगे हो गए. तो यह बिल्कुल ज्वालामुखी की तरह है. जो सालों साल तक खामोश रहने के बाद फट पड़ता है. इसी तरह यह बात उनकी चेतना में बैठ गई है कि संविधान आने से हमारा नुकसान हुआ है. एंटी कांस्टीट्यूशन, एंटी डेमोक्रेसी, एंटी स्टेट की यह भावना बहुत पहले से है. इसलिए मैं यह कहूंगा कि यह अपर कॉस्ट का आंदोनल है. अगेंसट कांस्टीट्यूशन, अगेंस्ट स्टेट, अगेंस्ट डेमोक्रेसी.
अशोक भारती (समाज सेवी, अध्यक्ष नैक्डोर)
भारतीय समाज पूरी तरह से भ्रष्ट है. यह मानसिक रुप से भ्रष्ट है, सामाजिक रूप से भ्रष्ट है, आर्थिक रूप से भ्रष्ट है. इस दृष्टि से भ्रष्टाचार दलित समाज और भारतीय समाज के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है. मेरा मानना है कि बहुजनों और दलितों को इस पूरे आंदोलन को आगे बढ़कर लीडरशिप प्रदान करनी चाहिए. ये जो पांच लोग हैं वो ‘सो कॉल्ड’ प्रवक्ता बने हुए हैं. जो रामलीला मैदान में लाखों जनता इकठ्ठी हो रही है वो पांच लोग नहीं है. सड़कों पर पांच लोग नहीं है. हमारे समाज के शामिल होने की बात है तो सिविल सोसाइटी का इतिहास रहा है कि उनकी कभी कोशिश नहीं रही की वो हमें इसमें शामिल करें. लेकिन हमें यह देखना है कि अगर वो शामिल नहीं करना चाहते तो हम कैसे उन्हें कंपेल करे.
मेरा मानना है कि दलित-बहुजन समाज को आगे बढ़कर आंदोलन का नेतृत्व ले लेना चाहिए. हालांकि मैं मानता हूं कि आंदोलन में जो लोग शामिल हैं, उनमें हमारी भी जनता है. लेकिन वह जनता के तौर पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत तौर पर मौजूद है. उन्हें एक समुदाय के तौर पर साथ आना चाहिए. अगर वो समुदाय के तौर पर सामने आते हैं तो इस आंदोलन का नेतृत्व हमारे हाथ में आएगा, नहीं तो नहीं आएगा. तो यह टेबल टर्न करने का मामला है. एक मामला यह भी है कि सरकार अगर इस बारे में कोई भी प्रक्रिया आगे बढ़ाती है तो उसे दलितों को भी इसमें शामिल करना चाहिए. उसे दलितों से बात करनी चाहिए. अगर अन्ना की टीम दलितों और बहुजनो को शामिल नहीं करना चाहती तो सरकार को यह साफ कर देना चाहिए कि दलितों की भागीदारी के बिना वो इस प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाएगी.
प्रकाश आंबेडकर (अध्यक्ष, आरपीआई)
देश की पोलिटिकल लिडरशिप बहुत वीक है. पढ़े लिखे जरूर हैं लेकिन प्रशासन चलाना जानते नहीं हैं. दूसरा यह है कि सरकार के सामने कोई विकल्प नहीं है. जहां तक लोकपाल बिल की बात है तो वो सुपर पावर बनाना चाहते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है. लोकपाल बिल के कुछ मुद्दों का विरोध कर रहे हैं. पूरे मुद्दे पर समर्थन नहीं है. सुपर पार्लियामेंट बनाने का जो मुद्दा है, हमारा उससे विरोध है. जहां तक भ्रष्टाचार की बात है तो इस पर हमारा पूरा समर्थन है. क्योंकि भ्रष्टाचार हो रहा है तो आम आदमी का ही पैसा जा रहा है. अमीर और अमीर हो रहा है, गरीब और गरीब हो रहा है.
सिविल सोसाइटी का कहना है कि राजनीतिक करप्शन कर रहे हैं. लेकिन यह भी है कि आम आदमी भी करप्शन कर रहा है. करप्शन कई प्रकार के हैं. फाइनेंनसियल करप्शन तो दिखाई देता है लेकिन इंटलेक्चुअल करप्शन कहां दिखाई देता है. बाबा साहब ने जो सबसे बड़ी बात कही थी कि यहां पर इंटलेक्चुअल ओनेस्टी नहीं है. जब ऑनेस्टी नहीं है तो करप्शन तो होगा ही. सिविल सोसाइटी वाले ऑनेस्टी की बात तो करते नहीं हैं. समाजिक व्यवस्था में ऑनेस्टी कैसे लाई जाए इसका विकल्प न तो सिविल सोसाइटी के पास है और ना ही सरकार के पास है. जो आम आदमी आंदोलन में आ रहा है क्या वो शपथ लेगा कि वो घूसखोरी नहीं करेगा. क्या वो इंटलेक्चुअल करप्शन हो, पैसे की हो, शिक्षा की हो या एडमिनिस्ट्रेशन की हो. वो सिर्फ पॉलिटिकल करप्शन को टारगेट कर के चल रहे हैं. ये एक मुद्दा है. असल में देश का चरित्र निर्माण करने की बात है, जिसके लिए किसी के पास कोई विकल्प नहीं है. जहां तक ये लोग देश की पूरी जनता के साथ होने की बात कर रहे हैं तो मान लिया जाए कि करप्शन के मुद्दे पर इनके साथ 90 फीसदी जनता है. लेकिन ये सभी जन लोकपाल बिल के साथ हैं ऐसा नहीं है. जनता जन लोकपाल के विरोध में काफी है लेकिन वो सामने इसलिए नहीं आ रही है क्योंकि इसके साथ करप्शन का मुद्दा जुड़ा है. अगर इसका विरोध करेंगे तो वो कहेंगे की हम भ्रष्टाचार की लड़ाई कमजोर कर रहे हैं.
जहां तक यह कहा जा रहा है कि इस आंदोलन में दलित और बहुजन समाज नहीं है तो यह समाज अपना आंदोलन क्यों नहीं करता. वह क्यों इनके पास भीख मांगने जा रहा है. इनको किसने रोका है. अब अगर ये कहते है कि राजा दलित है इसलिए उसको पकड़ा है तो और लोगों को टारगेट करने के लिए किसने रोका है. राजा अकेला थोड़े ही चोर है. मैं सारे दलित संगठनों से पूछना चाहता हूं कि तुमको पूछा नहीं जा रहा है तो तुम क्यों उनके रिकागनाइजेशन के लिए भाग रहे हो. बाबा साहब ने तो आंदोलन के लिए एक अलग आइडेंटिटी बनाई थी, आप उस आइडेंटिटी के साथ चलो. सभी अपने रिकागनाइजेशन के पीछे लगे हैं. दलित बुद्धिजीवी असल में रीढ़वीहीन हैं. कोई भी कमाता है तो उसके पीछे लग जाता है कि मैं दलित हूं हमें अपने साथ ले लो. असल में ये लोग मेहनत करने के लिए तैयार नहीं हैं.
(दलित मत.कॉम के संपादक अशोक दास से बातचीत पर आधारित )
दलित मुद्दों पर आधारित देश के पहले हिंदी न्यूज पोर्टल www.dalitmat.com से साभार
डा. विवेक कुमार (प्रध्यापक, समाजशास्त्र विभाग, जेएनयू)
प्रजातंत्र बाहें मरोड़ने से नहीं चलता. दूसरी बात, भ्रष्टाचार की जो परिभाषा है वह बहुत संकुचित और सीमित है. यह केवल सरकारी भ्रष्टाचार की बात करता है, जबकि पूरे देश की संरचना में भ्रष्टाचार व्याप्त है. जिसमें लोगों के मानव अधिकारों का हनन, असमानता का व्यवहार और व्यक्तिगत पृथकता व्याप्त है. भगवान को चढ़ावा चढ़ाने का और पाप कर के गंगा नहाने का भी प्रावधान है. हजारों टन सोना मंदिरों में मौजूद है. सोना चढ़ाने वाले क्या रसीद देते हैं कि उन्होंने कहां से खरीदा, टैक्स दिया कि नहीं. जिस तरह सरकार लाखों करोड़ों रुपये का कारपोरेट टेक्स, एक्साइज ड्यूटी और इंपोर्ट ड्यूटी जिस तरह एक बार में माफ कर देती है, क्या यह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है या फिर आएगा? अगर आएगा तो इसमें जन लोकपाल बिल क्या करेगा.
अगर आप 542 प्रतिनिधियों पर विश्वास नहीं कर रहे हो तो मैं पांच स्वघोषित प्रतिनिधियों पर कैसे भरोसा कर लूं. यहीं पर प्रजातांत्रिक प्रणाली की अवहेलना हो रही है, क्योंकि वो तो चुन कर आए हैं. जनता ने चुन कर भेजा है. लेकिन ये जो पांच लोग है वो स्वघोषित हैं. जनता ने इन्हें चुना नहीं है बल्कि इनके बैठ जाने के बाद लोग आए हैं. जहां तक लाखों लोगों का समर्थन मिलने की बात कही जा रही है तो अगर लाखों लोग जाकर बाबरी मस्जिद तोड़ रहे थे तो क्या वो जायज है? कानूनन क्या जायज है कि आप प्राइवेट बिल को पास करने के लिए कहे, जबकि संसद मौजूद है. आप उसी राजनीति को धत्ता बताते हो. कहते हो कि पूरा सिस्टम खराब है और दूसरी ओर उसी राजनीतिज्ञों के पास जाकर गिरगिरा रहे हो कि हमें बैठने की इजाजत दो, हमारा बिल पास कर दो. आप प्रजातंत्र की हमारी स्थापित संस्थाओं का गला घोंट रहे हैं. ये लोग आम जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.
इस देश में यह कौन तय करेगा कि भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मसला है कि भूख सबसे बड़ा मसला है. हमारी 70 फीसदी जनता जो हर दिन महज 20 रुपये कमाती है, वो किस तरह घूस देगी? जो लोग सत्ता की संस्थाओं में काबिज हैं चाहे वो राजनीति में हो, ब्यूरोक्रेसी में हो, इंडस्ट्री में हो या फिर यूनिवर्सिटी में हो, जरा अनुपात देखिए कि कौन लोग हैं जो इन पर काबिज हैं. एकछत्र राज कायम कर रखा है. उसी के खिलाफ अन्ना आंदोलन कर रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि अन्ना स्वतः सवर्ण समाज के खिलाफ ही आंदोलन कर रहे हैं और राष्ट्र को शामिल करने की बात कर रहे हैं. तो यह कहीं न कहीं विरोधाभाष है. यह पूरे समाज का आंदोलन नहीं है.
चंद्रभान प्रसाद (लेखक एवं चिंतक)
अन्ना का आंदोलन अपर कास्ट का आंदोलन है. यह संविधान पर सवाल खड़े कर रहा है, संसद और लोकतंत्र पर सवाल उठा रहा है. जहां तक सिविल सोसाइटी द्वारा आंदोलन की बात है तो सवाल उठता है कि क्या भारत सिविल सोसाइटी यानि सभ्य समाज बन चुका है? जाति के प्रारूप के मौजूद रहते कोई समाज, सभ्य समाज कैसे बन सकता है? हां, यह प्रक्रिया जारी है. जब एनडीए सरकार आई थी तो उसका सबसे पसंदीदा विषय था ‘रिव्यू ऑफ कांस्टीट्यूशन’. इसके बहाने वह एक तबके को खुश कर रही थी. यानि की संविधान के विरुद्ध समाज के एक तबके में एक Sentiment (विचार) है. क्योंकि संविधान के पहले चाहे अंग्रेजों का राज रहा हो या फिर मुगलों का, सब कुछ अपर कॉस्ट के हाथ में था.
संविधान के बनने के बाद लोकतंत्र के आने से ही उनका एकाधिकार टूटा है. अपर कॉस्ट में जो अधिक कंजरवेटिव तबका है उसके दिमाग में यह बात हमेशा रही है कि संविधान की वजह से हमारा नुकसान हुआ है. उसको ERUPT (दबी भावनाओं का बाहर आना) करने का एक मौका मिला है. जैसे आपने देखा होगा कि ब्रिटेन में, इटली में अचानक दंगे हो गए. तो यह बिल्कुल ज्वालामुखी की तरह है. जो सालों साल तक खामोश रहने के बाद फट पड़ता है. इसी तरह यह बात उनकी चेतना में बैठ गई है कि संविधान आने से हमारा नुकसान हुआ है. एंटी कांस्टीट्यूशन, एंटी डेमोक्रेसी, एंटी स्टेट की यह भावना बहुत पहले से है. इसलिए मैं यह कहूंगा कि यह अपर कॉस्ट का आंदोनल है. अगेंसट कांस्टीट्यूशन, अगेंस्ट स्टेट, अगेंस्ट डेमोक्रेसी.
अशोक भारती (समाज सेवी, अध्यक्ष नैक्डोर)
भारतीय समाज पूरी तरह से भ्रष्ट है. यह मानसिक रुप से भ्रष्ट है, सामाजिक रूप से भ्रष्ट है, आर्थिक रूप से भ्रष्ट है. इस दृष्टि से भ्रष्टाचार दलित समाज और भारतीय समाज के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है. मेरा मानना है कि बहुजनों और दलितों को इस पूरे आंदोलन को आगे बढ़कर लीडरशिप प्रदान करनी चाहिए. ये जो पांच लोग हैं वो ‘सो कॉल्ड’ प्रवक्ता बने हुए हैं. जो रामलीला मैदान में लाखों जनता इकठ्ठी हो रही है वो पांच लोग नहीं है. सड़कों पर पांच लोग नहीं है. हमारे समाज के शामिल होने की बात है तो सिविल सोसाइटी का इतिहास रहा है कि उनकी कभी कोशिश नहीं रही की वो हमें इसमें शामिल करें. लेकिन हमें यह देखना है कि अगर वो शामिल नहीं करना चाहते तो हम कैसे उन्हें कंपेल करे.
मेरा मानना है कि दलित-बहुजन समाज को आगे बढ़कर आंदोलन का नेतृत्व ले लेना चाहिए. हालांकि मैं मानता हूं कि आंदोलन में जो लोग शामिल हैं, उनमें हमारी भी जनता है. लेकिन वह जनता के तौर पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत तौर पर मौजूद है. उन्हें एक समुदाय के तौर पर साथ आना चाहिए. अगर वो समुदाय के तौर पर सामने आते हैं तो इस आंदोलन का नेतृत्व हमारे हाथ में आएगा, नहीं तो नहीं आएगा. तो यह टेबल टर्न करने का मामला है. एक मामला यह भी है कि सरकार अगर इस बारे में कोई भी प्रक्रिया आगे बढ़ाती है तो उसे दलितों को भी इसमें शामिल करना चाहिए. उसे दलितों से बात करनी चाहिए. अगर अन्ना की टीम दलितों और बहुजनो को शामिल नहीं करना चाहती तो सरकार को यह साफ कर देना चाहिए कि दलितों की भागीदारी के बिना वो इस प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाएगी.
प्रकाश आंबेडकर (अध्यक्ष, आरपीआई)
देश की पोलिटिकल लिडरशिप बहुत वीक है. पढ़े लिखे जरूर हैं लेकिन प्रशासन चलाना जानते नहीं हैं. दूसरा यह है कि सरकार के सामने कोई विकल्प नहीं है. जहां तक लोकपाल बिल की बात है तो वो सुपर पावर बनाना चाहते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है. लोकपाल बिल के कुछ मुद्दों का विरोध कर रहे हैं. पूरे मुद्दे पर समर्थन नहीं है. सुपर पार्लियामेंट बनाने का जो मुद्दा है, हमारा उससे विरोध है. जहां तक भ्रष्टाचार की बात है तो इस पर हमारा पूरा समर्थन है. क्योंकि भ्रष्टाचार हो रहा है तो आम आदमी का ही पैसा जा रहा है. अमीर और अमीर हो रहा है, गरीब और गरीब हो रहा है.
सिविल सोसाइटी का कहना है कि राजनीतिक करप्शन कर रहे हैं. लेकिन यह भी है कि आम आदमी भी करप्शन कर रहा है. करप्शन कई प्रकार के हैं. फाइनेंनसियल करप्शन तो दिखाई देता है लेकिन इंटलेक्चुअल करप्शन कहां दिखाई देता है. बाबा साहब ने जो सबसे बड़ी बात कही थी कि यहां पर इंटलेक्चुअल ओनेस्टी नहीं है. जब ऑनेस्टी नहीं है तो करप्शन तो होगा ही. सिविल सोसाइटी वाले ऑनेस्टी की बात तो करते नहीं हैं. समाजिक व्यवस्था में ऑनेस्टी कैसे लाई जाए इसका विकल्प न तो सिविल सोसाइटी के पास है और ना ही सरकार के पास है. जो आम आदमी आंदोलन में आ रहा है क्या वो शपथ लेगा कि वो घूसखोरी नहीं करेगा. क्या वो इंटलेक्चुअल करप्शन हो, पैसे की हो, शिक्षा की हो या एडमिनिस्ट्रेशन की हो. वो सिर्फ पॉलिटिकल करप्शन को टारगेट कर के चल रहे हैं. ये एक मुद्दा है. असल में देश का चरित्र निर्माण करने की बात है, जिसके लिए किसी के पास कोई विकल्प नहीं है. जहां तक ये लोग देश की पूरी जनता के साथ होने की बात कर रहे हैं तो मान लिया जाए कि करप्शन के मुद्दे पर इनके साथ 90 फीसदी जनता है. लेकिन ये सभी जन लोकपाल बिल के साथ हैं ऐसा नहीं है. जनता जन लोकपाल के विरोध में काफी है लेकिन वो सामने इसलिए नहीं आ रही है क्योंकि इसके साथ करप्शन का मुद्दा जुड़ा है. अगर इसका विरोध करेंगे तो वो कहेंगे की हम भ्रष्टाचार की लड़ाई कमजोर कर रहे हैं.
जहां तक यह कहा जा रहा है कि इस आंदोलन में दलित और बहुजन समाज नहीं है तो यह समाज अपना आंदोलन क्यों नहीं करता. वह क्यों इनके पास भीख मांगने जा रहा है. इनको किसने रोका है. अब अगर ये कहते है कि राजा दलित है इसलिए उसको पकड़ा है तो और लोगों को टारगेट करने के लिए किसने रोका है. राजा अकेला थोड़े ही चोर है. मैं सारे दलित संगठनों से पूछना चाहता हूं कि तुमको पूछा नहीं जा रहा है तो तुम क्यों उनके रिकागनाइजेशन के लिए भाग रहे हो. बाबा साहब ने तो आंदोलन के लिए एक अलग आइडेंटिटी बनाई थी, आप उस आइडेंटिटी के साथ चलो. सभी अपने रिकागनाइजेशन के पीछे लगे हैं. दलित बुद्धिजीवी असल में रीढ़वीहीन हैं. कोई भी कमाता है तो उसके पीछे लग जाता है कि मैं दलित हूं हमें अपने साथ ले लो. असल में ये लोग मेहनत करने के लिए तैयार नहीं हैं.
(दलित मत.कॉम के संपादक अशोक दास से बातचीत पर आधारित )
दलित मुद्दों पर आधारित देश के पहले हिंदी न्यूज पोर्टल www.dalitmat.com से साभार
Subscribe to:
Posts (Atom)