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Sunday, September 25, 2011

मिर्चपुर हत्याकांड में सिर्फ 15 दोषी, 82 बरी


दिल्ली की एक अदालत ने हरियाणा के मिर्चपुर गांव में पिछले साल 70 वर्षीय एक दलित और उसकी विकलांग बेटी को जिंदा जला देने के मामले में आरोपी बनाए गए 97 में से 15 लोगों को विभिन्न आपराधिक धाराओं के तहत दोषी करार दिया. जबकि अन्य 82 आरोपियों को निर्दोष बताया है. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लाउ ने जिन 15 आरोपियों को दोषी ठहराया है उन्हें हत्या के मामले में दोषी करार नहीं दिया है. कुलविंदर, रामफल और राजेन्दर को 21 अप्रैल को ताराचंद के घर को आग के हवाले करने को लेकर आईपीसी की धारा 304 के तहत दोषी करार दिया गया. गांव के प्रभावी जाटों और दलितों के बीच जातीय विवाद के बाद यह घटना हुई थी.
इन 15 आरोपियों में से 12 को आगजनी, दंगा करने और गैर कानूनी रूप से एकत्र होने के आरोप में दोषी करार दिया गया. अदालत ने अपने फैसले में इस मामले में हरियाणा पुलिस की खिंचाई करते हुए कहा, ‘‘जिस तरह से पूरे मामले को निपटाया गया वह अनुचित है.’’ गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल नौ दिसंबर को इस मामले को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया था. हरियाणा में निष्पक्ष सुनवाई नहीं होने की पीड़ितों की अर्जी पर ऐसा किया गया था. न्यायाधीश ने कहा कि राजनीतिक दबाव के चलते कई आरोपियों को फंसाए जाने की संभावना खारिज नहीं की जा सकती है. अदालत ने हिसार जिले के नारनौंद पुलिस थाना के प्रभारी विनोद के. काजल सहित 82 आरोपियों को निर्दोष करार दिया. गौरतलब है कि इस घटना के बाद आज तक मिर्चपुर गांव में दलितों की स्थिति सुधर नहीं पाई है. आज भी वहां के दलित दहशत में हैं. जाटों के डर से कई परिवार अभी भी गांव से बाहर शरण लिए हुए हैं, जहां उन्हें तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. जो परिवार वापस गांव लौट गए हैं, वो भी हर पल डर के साये में जी रहे हैं. इस पूरे मामले में संसद के अंदर मौजूद 120 दलित सांसदों की भूमिका भी समाज के प्रति साकारात्मक नहीं रही थी. जिस स्तर पर विरोध प्रदर्शन होना चाहिए था, राजनीतिक स्तर पर वैसा कुछ नहीं हो पाया. यहां तक की विपक्षी दलों ने भी विरोध दर्ज करा कर महज खानापूर्ति कर ली थी. तो आरक्षित सीट से जीतने वाले उम्मीदवार भी पार्टी के दबाव में दलितों पर अत्याचार के मामले को जोरदार ढ़ंग से उठाने में नाकाम रहे थे.