कभी-कभी यह मानने को विवश हो जाना पड़ता है कि हम दलित शायद तमाम अत्याचार, पीड़ा, अपमान और ज्यादतियां सहने के लिए ही इस धरती पर आएं हैं. यकीं नहीं आता तो इस आंकड़े को देखिए. हर दिन तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. हर हफ्ते पांच दलितों के घर जलाए जाते हैं. छह का अपहरण होता है. 11 दलितों की पिटाई होती है और हर सप्ताह 13 दलितों की हत्या होती है. यानि कुल मिलाकर हर 18वें मिनट में किसी न किसी दलित भाई के साथ अत्याचार हो रहा होता है. यह आंकड़ा संयुक्त राष्ट्र का है. देश के 11 राज्यों के 565 गांवों में कराए गए सर्वे से यह बात सामने आई है. यह भी तय है कि अन्य गांवों या राज्यों की स्थिति इससे बेहतर नहीं होगी. यह आंकड़े पिछले पांच साल के हैं.
यह आंकड़े उस स्थिति के हैं जब आज भी तमाम थाने में दलितों पर अत्याचार की रिपोर्ट नहीं लिखी जाती. कई तो खुद ही रिपोर्ट नहीं लखवाते हैं. समाजिक बदलाव के दावों के बीच ये आंकड़े बता रहे हैं कि सभी दावे बस कागजी भर हैं. इसी अध्ययन में जारी कई अन्य आंकड़ों को देखें तो वह भी दलितों पर अत्याचार की बानगी ही पेश करते हैं. आंकड़ों के मुताबिक 33 फीसदी गांवों में स्वास्थकर्मी दलितों के घर जाकर उनका इलाज करने से मना कर देते हैं. करीब 38 फीसदी सरकारी स्कूलों में दलित बच्चों को दोपहर का भोजन अलग बैठा कर कराया जाता है. 23.5 फीसदी गांवों में दलितों को उनके घरवालों की चिठ्ठी नहीं मिलती. यानि दलित समाज के सौ में से लगभग 25 लोगों को डाकिया उनकी चिठ्ठी नहीं देता है. वहीं लगभग 50 फीसदी (48.4) गांवों में दलितों को सावर्जनिक जल स्रोतों से पानी नहीं लेने दिया जाता है. वहीं उच्च समुदाय के लोगों से दलित कितने प्रताड़ित हैं, इसका लेखा भी इस अध्ययन में है. इसके मुताबिक 27.6 फीसदी गांवों में दलितों को थाने तक नहीं पहुंचने दिया जाता है.
Tuesday, December 8, 2009
Monday, December 7, 2009
दलित युवक कुर्सी पर बैठ गया तो गोली मार दी
घटना चार दिसंबर, 09 की है. बिहार के छपरा जिले में एक युवक की गोली मार कर हत्या कर दी गई. उस युवक की दो गलतियां थी. पहला वह दलित था और दूसरा दलित होने के बावजूद वह कुर्सी पर बैठ गया. घटना छपरा जिले के सलेमपुर गांव की है. गांव में राजपूत जाति के एक व्यक्ति के यहां बारात आई थी. द्वारपूजा का वक्त था. वहीं पर गांव का एक दलित युवक कुर्सी पर बैठा था. यह बात दूल्हे के पिता को इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने उसे गोली मार दी. मौके पर ही दलित युवक की मौत हो गई.
Wednesday, October 14, 2009
अब नरेगा में भी दबंगों से हार गए दलित
जिस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक वोट से सरकारें गिर जाती है, उसी संसद के द्वारा देश में पहली बार मजदूरों को दिये गये रोजगार के अधिकार कानून में 98 दलित मजदूर हार गये और 52 सवर्ण बाहुबली जीत गये है। सरकारी जॉच की रफ्तार कछुआ चाल से कुछ कदम भी नही चल पाई की गॉव के दबंग समूहों और जनप्रतिनिधियों ने दलित मजदूरों पर चाणक्य नीति के साम, दाम, दण्ड औरद भेद के सभी प्रयोग कर दिये गये। आखिर पहले से ही बमुश्किल अपने शोशण के खिलाफ आवाज उठाने कि हिम्मत जुटा पाये मजदूरों ने हार मान ली। वो बहुमत में होते हुये भी लोकतंत्र में हार गये।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून ´´नरेगा´´ के तहत दीवारों पर करोडों के खर्चो से लिखी गई इबारतें एक बार फिर शो पीस ही साबित हुई।
हर हाथ को काम मिलेगा,काम का पूरा दाम मिलेगा । कहीं न खाना पूर्ति होगी,पारदर्शिता पूरी होगी। नहीं चलेगी अब मनमानी,होगी चौतरफा निगरानी।
पूरी पूरी मिलै पगार,दूर हटाए ठेकेदार। उसको बोर्ड लगाना होगा,सब ब्यौरा बतलाना होगा। रोजगार गारंटी आई है,सब के घर खुशहाली लाई है।
दीवारों पर लिखे इन बड़े बड़े नारों से भरतपुर के बयाना में रहने वाले दलित गरीब मजदूर इत्तिफाक नहीं रखते है। ये पूरा बाकया राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून ´नरेगा´ के भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ था। 15 माह के बीच 20 शिकायतों से जूझ रहे राजस्थान में आईने की तरह साफ एक शिकायत में दलित मजदूरों ने आखिर चाणक्य नीति के सूत्रों के आगे समर्पण कर दिया है। जो ये बताने के लिए काफी है कि प्रदेश में काम के अधिकार में कितनी लचर व्यवस्थाऐं चल रही है । जिनके चलते सरकारी अमला और पंचायतीराज के नुमाइंदों ने नरेगा को किस हद तक भ्रश्टाचार के दलदल में धकेल अपनी जेबें भरने का काम किया जा रहा है।
राजस्थान के भरतपुर के बयाना में 98 दलित मजदूरों ने 13 जुलाई को एक शिकायत उपखंड अधिकारी को सौंपी। शिकायत में कहा गया था कि उनके गॉव में 1 से 15 जून तक चले नरेगा कार्य में सवर्ण जाति के मजदूरों ने उनके साथ रहकर कोई काम नहीं किया था। कार्यस्थल जिसके निर्धारण में भी उनके साथ भेदभाव हुआ उसपर काम करने केवल वो 98 मजदूर ही गये थे। उन्हें अपने पीने के पानी की व्यवस्था भी अपने साथ ले जाकर करनी पडी थी। मजदूरों के अनुसार पूरे मामले का खुलासा काम करने के पैसों के स्वीकृत होकर आने पर सामने आया। उनके प्रतिदिन के काम की दर केवल 62 रूप्ये प्रतिदिन की दर से स्वीकृत की गई। इस बात से दुखी मजदूरों ने जब जानकारी ली तो पता चला कि उनके साथ काम करने वालों की संख्या तो सूची में 150 दर्शायी गई है। जिससे पूरा मामला उनकी समझ में आ गया कि 98 मजदूरों के काम को 150 दर्शाने के कारण उनकी मजदूरी दर 62 रूपये आई है।
ये पूरा मामला ठीक उसी प्रकार से है जैसे फोटो में प्रकाशित बयाना पंचायत के मुख्य द्वार के पास लिखे नारे में लिखा है ´काम का पूरा दाम मिलेगा´ में से मिलेगा मिट सा गया है । ठीक ऐसा ही बाकया उन मजदूर के साथ हुआ है, जिसमें उन्हें काम तो मिला है मगर काम करने पर पूरे दाम नही मिले है। शिकायत करने की हिम्मत जुटा बमुश्किल मजदूर उपखंड अधिकारी के पास पहुंचे । उन्होंने पंचायत समिति के कार्यक्रम अधिकारी को जॉच सोंप औपचारिकता पूरी कर दी। 15 दिनों तक कोई कार्यवाही न होते देख इन मजदूरों ने एक बार फिर हिम्मत का प्रदर्शन कर संभागीय आयुक्त तक अपनी बात को पहुंचाया। उन्होंने उपखंड अधिकारी को जॉच के आदेश दे दिये। आज दिन तक मजदूरों की बात सरकारी कागजों में कही रेंग रही होगी। मजदूरों की मानें तो उनके पास उनकी बात सुनने उपखंड अधिकारी आज तक नहीं आये हैं।
वही दूसरी और गरीब दलित मजदूरों को अन्य प्रकारों से धमकाने की बाते भी मजदूर दबी जबान में स्वीकार कर रहे है । जिनमें खेत खलिहानों में न जाने देना,गॉव में रहते हुये अनेकों प्रकार से प्रताडित करने की बात भी उनके सामने रखी गई। जिसमें उनकी खडी फसल को उजाड देना, मारपीट करना आदि। सरकारी जॉच के भरोसे बैठे मजदूरों के सामने हर गुजरते दिन के साथ संकट खडे होने लग गये थे। ऐसे में गरीब दलित मजदूरों के पास भुगतान को लेने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बच पाया। मजदूर टूट गये और उन्होंने मजबूरन 62 रूप्ये प्रतिदिन की दर से ही अपना भुगतान ले लिया हैं। मजदूरों का कहना है कि अब कभी वो नरेगा के तहत काम नही करेगे, उधर कमिश्नर कार्यालय अभी मामले की जानकारी लेने की बात ही कर रहा है।
नरेगा के भ्रष्टाचार की ये तो एक दास्तान मात्र है। हॉल ही में राजधानी में आयोजित कलक्टरर्स कॉन्फ्रेंस में करौली कलक्टर ने मुख्यमंत्री की उपस्थिति में अपने जिले में 30 हजार फर्जी जॉब कार्ड होने की बात कहकर सबको चौंका दिया था। धौलपुर,भीलबाडा,अलवर,जोधपुर,जैसलमेर और अजमेर से ऐसे मामले प्रकाश में आये है जहॉ फर्जी मस्टरौलों में साधु संतों ,स्कूली छात्र छात्राओं और स्वर्गवासी हो चुके लोगों के नाम सामने आये है। इतना ही नहीं ऐसे लोगों के नाम से भुगतान भी उठा लिया गया है।
नरेगा के भ्रश्टाचार को अब तो प्रदेश के पंचायतीराज और ग्रामीण विकास मंत्री भरतसिंह ने भी खुले मन से स्वीकार कर लिया है । उनके अनुसार ´´नरेगा की रोजाना सैकड़ों शिकायतें नहीं भारी गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार की जानकारी मिल रहीं है। जिसका जहॉ बस चल रहा है वह वहीं से चोरी करने में जुटा हुआ है।´´ इसके बाद ये कहा जा सकता है कि प्रदेश में 8000 हजार करोड़ रूपये के विशालकाय बजट वाली इस योजना में किस प्रकार लूट और धमाचौकडी का खुला खेल खेला जा रहा है । जो इसके मूल लक्ष्यों और भावनाओं के एक दम विपरीत है।
लेखक- राजीव शर्मा (विस्फोट.कॉम से साभार)
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून ´´नरेगा´´ के तहत दीवारों पर करोडों के खर्चो से लिखी गई इबारतें एक बार फिर शो पीस ही साबित हुई।
हर हाथ को काम मिलेगा,काम का पूरा दाम मिलेगा । कहीं न खाना पूर्ति होगी,पारदर्शिता पूरी होगी। नहीं चलेगी अब मनमानी,होगी चौतरफा निगरानी।
पूरी पूरी मिलै पगार,दूर हटाए ठेकेदार। उसको बोर्ड लगाना होगा,सब ब्यौरा बतलाना होगा। रोजगार गारंटी आई है,सब के घर खुशहाली लाई है।
दीवारों पर लिखे इन बड़े बड़े नारों से भरतपुर के बयाना में रहने वाले दलित गरीब मजदूर इत्तिफाक नहीं रखते है। ये पूरा बाकया राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून ´नरेगा´ के भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ था। 15 माह के बीच 20 शिकायतों से जूझ रहे राजस्थान में आईने की तरह साफ एक शिकायत में दलित मजदूरों ने आखिर चाणक्य नीति के सूत्रों के आगे समर्पण कर दिया है। जो ये बताने के लिए काफी है कि प्रदेश में काम के अधिकार में कितनी लचर व्यवस्थाऐं चल रही है । जिनके चलते सरकारी अमला और पंचायतीराज के नुमाइंदों ने नरेगा को किस हद तक भ्रश्टाचार के दलदल में धकेल अपनी जेबें भरने का काम किया जा रहा है।
राजस्थान के भरतपुर के बयाना में 98 दलित मजदूरों ने 13 जुलाई को एक शिकायत उपखंड अधिकारी को सौंपी। शिकायत में कहा गया था कि उनके गॉव में 1 से 15 जून तक चले नरेगा कार्य में सवर्ण जाति के मजदूरों ने उनके साथ रहकर कोई काम नहीं किया था। कार्यस्थल जिसके निर्धारण में भी उनके साथ भेदभाव हुआ उसपर काम करने केवल वो 98 मजदूर ही गये थे। उन्हें अपने पीने के पानी की व्यवस्था भी अपने साथ ले जाकर करनी पडी थी। मजदूरों के अनुसार पूरे मामले का खुलासा काम करने के पैसों के स्वीकृत होकर आने पर सामने आया। उनके प्रतिदिन के काम की दर केवल 62 रूप्ये प्रतिदिन की दर से स्वीकृत की गई। इस बात से दुखी मजदूरों ने जब जानकारी ली तो पता चला कि उनके साथ काम करने वालों की संख्या तो सूची में 150 दर्शायी गई है। जिससे पूरा मामला उनकी समझ में आ गया कि 98 मजदूरों के काम को 150 दर्शाने के कारण उनकी मजदूरी दर 62 रूपये आई है।
ये पूरा मामला ठीक उसी प्रकार से है जैसे फोटो में प्रकाशित बयाना पंचायत के मुख्य द्वार के पास लिखे नारे में लिखा है ´काम का पूरा दाम मिलेगा´ में से मिलेगा मिट सा गया है । ठीक ऐसा ही बाकया उन मजदूर के साथ हुआ है, जिसमें उन्हें काम तो मिला है मगर काम करने पर पूरे दाम नही मिले है। शिकायत करने की हिम्मत जुटा बमुश्किल मजदूर उपखंड अधिकारी के पास पहुंचे । उन्होंने पंचायत समिति के कार्यक्रम अधिकारी को जॉच सोंप औपचारिकता पूरी कर दी। 15 दिनों तक कोई कार्यवाही न होते देख इन मजदूरों ने एक बार फिर हिम्मत का प्रदर्शन कर संभागीय आयुक्त तक अपनी बात को पहुंचाया। उन्होंने उपखंड अधिकारी को जॉच के आदेश दे दिये। आज दिन तक मजदूरों की बात सरकारी कागजों में कही रेंग रही होगी। मजदूरों की मानें तो उनके पास उनकी बात सुनने उपखंड अधिकारी आज तक नहीं आये हैं।
वही दूसरी और गरीब दलित मजदूरों को अन्य प्रकारों से धमकाने की बाते भी मजदूर दबी जबान में स्वीकार कर रहे है । जिनमें खेत खलिहानों में न जाने देना,गॉव में रहते हुये अनेकों प्रकार से प्रताडित करने की बात भी उनके सामने रखी गई। जिसमें उनकी खडी फसल को उजाड देना, मारपीट करना आदि। सरकारी जॉच के भरोसे बैठे मजदूरों के सामने हर गुजरते दिन के साथ संकट खडे होने लग गये थे। ऐसे में गरीब दलित मजदूरों के पास भुगतान को लेने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बच पाया। मजदूर टूट गये और उन्होंने मजबूरन 62 रूप्ये प्रतिदिन की दर से ही अपना भुगतान ले लिया हैं। मजदूरों का कहना है कि अब कभी वो नरेगा के तहत काम नही करेगे, उधर कमिश्नर कार्यालय अभी मामले की जानकारी लेने की बात ही कर रहा है।
नरेगा के भ्रष्टाचार की ये तो एक दास्तान मात्र है। हॉल ही में राजधानी में आयोजित कलक्टरर्स कॉन्फ्रेंस में करौली कलक्टर ने मुख्यमंत्री की उपस्थिति में अपने जिले में 30 हजार फर्जी जॉब कार्ड होने की बात कहकर सबको चौंका दिया था। धौलपुर,भीलबाडा,अलवर,जोधपुर,जैसलमेर और अजमेर से ऐसे मामले प्रकाश में आये है जहॉ फर्जी मस्टरौलों में साधु संतों ,स्कूली छात्र छात्राओं और स्वर्गवासी हो चुके लोगों के नाम सामने आये है। इतना ही नहीं ऐसे लोगों के नाम से भुगतान भी उठा लिया गया है।
नरेगा के भ्रश्टाचार को अब तो प्रदेश के पंचायतीराज और ग्रामीण विकास मंत्री भरतसिंह ने भी खुले मन से स्वीकार कर लिया है । उनके अनुसार ´´नरेगा की रोजाना सैकड़ों शिकायतें नहीं भारी गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार की जानकारी मिल रहीं है। जिसका जहॉ बस चल रहा है वह वहीं से चोरी करने में जुटा हुआ है।´´ इसके बाद ये कहा जा सकता है कि प्रदेश में 8000 हजार करोड़ रूपये के विशालकाय बजट वाली इस योजना में किस प्रकार लूट और धमाचौकडी का खुला खेल खेला जा रहा है । जो इसके मूल लक्ष्यों और भावनाओं के एक दम विपरीत है।
लेखक- राजीव शर्मा (विस्फोट.कॉम से साभार)
Saturday, October 10, 2009
दलित साहित्यकार बन गया राजमिस्त्री
बात थोड़ी पुरानी जरूर हो गयी है लेकिन हालात अभी भी बदले नहीं है. नागरिक अधिकार मंच और युवा संवाद के द्वारा मजदूर दिवस के अवसर पर शहर के मजदूर पीठों पर नुक्कड़ सभा का आयोजन किया गया । इसी दरमियान नेहरू नगर चौक पर मुलाकात हुई काम के इंतजार में खड़े राज मिस्त्री मूलचंद मेधोनिया से । इस मजदूर से मजदूर दिवस की बात करते - करते दलित साहित्यकार की उपेक्षा का नया ही अध्याय खुल गया ।
35 साल के मूलचंद ग्राम चीचली जिला नरसिंहपुर के रहने वाले है। अपने स्वतंत्रता संग्राम के लिए लड़ने वाले दादा से प्रेरित होकर वे दलित समाज व साहित्य की सेवा में युवावस्था से ही जुट पड़े । संत रविदास , कबीर ,गुरू घासीदास के साहित्य और मानव सेवा को आधार बनाकर मूलचंद ने दलित व आदिवासी समाज के बीच चेतना जगाने और संगठित करने का काम किया । स्वयं दलित समाज से होने तथा क्षेत्र में दलित समाज की उपेक्षा को देखते हुए उन्होंने तमाम पत्र - पत्रिकाओं में काव्य , आलेख व बुंदेलखंड शैली के साहित्य का लेखन किया। नरसिंहपुर जिले में न सिर्फ दलित समाज को संगठित व जागरूक करने का पराक्रम किया साथ ही दलित साहित्य अकादमी व दलित समाज के राष्ट्रीय आयोजनों में हिस्सा लिया । स्वयं मूलचंद जी ने मध्यप्रदेश दलित साहित्यकार मंच की स्थापना कर उल्लेखनीय कार्य किया । साहित्य भूषण की मानद उपाधि प्राप्त यह साहित्यकार समाज सेवा व पत्रकारिता के लिए वर्ष 1994 में दिल्ली में दलित साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है । बात सम्मान की हो तो मेधोनिया के पास सम्मानपत्रों का ढेर लगा हुआ है, लेकिन इन सम्मानपत्रों के ढेर से तो गुजारा नहीं किया जा सकता।
मध्यप्रदेश के शीर्षस्थ साहित्यकारों और नेताओं के साथ खिची फोटो और समाचार की कतरनें इसी ढ़ेर में दिखाई पड़तें है ।परिवार से बातचीत में मूलचंद की बूढ़ी माँ बताती है कि हमारे बेटे ने यही कमाई की है। युवा ऊर्जा से भरे मूलचंद ने जिला पंचायत के चुनाव में भी उतरने की कोशिश की जिसका नतीजा यह हुआ कि क्षेत्रीय दलीय नेताओं के लिए वे मनमानी और भ्रष्टाचार के बीच रोड़ा बनने लग गये । अंतत: संगठित दलीय नेतृत्व ने उन्हें मारने पीटने से लेकर बदनाम करने तक के हर हथकंडे का प्रयोग किया ।मजबूर होकर मेधोनिया को अपनी ज़मीन छोड़नी पड़ी ।
गत 5 वर्षों से मूलचंद मेधोनिया शेपाल शहर के झुग्गी बस्ती पंपापुर में 8x8 के किराये के मकान में रहता है। दलित साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र का यह सक्रिय रचनाधर्मी नेहरू नगर चौक के मजदूर पीठे पर तपती दोपहर में खड़ा रहने को मजबूर है। मूलचंद की अब पहचान राष्ट्रीय दलित साहित्यकार की न होकर राज मिस्त्री के रूप में होती है। वह बताते है कि मजदूरी मिलने के इंतजार में पीठे पर दोपहर तक भी खड़ा रहना पड़ता है कि शायद आधे दिन ही मजदूरी नसीब हो जाये । परिवार की गरीबी और सरकार की उपेक्षा से तंग आ चुके मूलचंद बताते है कि उन्होंने असंगठित मजदूरो और दलित साहित्यकारों को संगठित करने हेतु मंच भी बनाया किंतु मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी और संस्कृति विभाग से आज तक किसी प्रकार का पुरस्कार या आर्थिक सहयोग नहीं मिल सका ।
प्रदेश में राजनैतिक आधार पर साहित्यकारों को जहाँ सम्मान मिलता रहा वही वास्तविक हकदार की उपेक्षा की गईं । एक बार तो तंग आकर इस साहित्यकार ने राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमति तक मॉग ली लेकिन न वह मिली और न आज तक उसकी जिंदगी का , उसके अंदर बैठे साहित्यकर्म और सेवा के जज्बे का घुट घुट कर मरना खत्म हुआ। तो तपते पीठे पर अपनी मजदूरी की आस में खड़ा यह मजदूर अपने हक का इंतजार कर रहा है। तो कब खत्म होगा यह इंतजार? ..... प्रश्न तो हमारी तरफ भी है।
(विस्फोट.कॉम से साभार)
35 साल के मूलचंद ग्राम चीचली जिला नरसिंहपुर के रहने वाले है। अपने स्वतंत्रता संग्राम के लिए लड़ने वाले दादा से प्रेरित होकर वे दलित समाज व साहित्य की सेवा में युवावस्था से ही जुट पड़े । संत रविदास , कबीर ,गुरू घासीदास के साहित्य और मानव सेवा को आधार बनाकर मूलचंद ने दलित व आदिवासी समाज के बीच चेतना जगाने और संगठित करने का काम किया । स्वयं दलित समाज से होने तथा क्षेत्र में दलित समाज की उपेक्षा को देखते हुए उन्होंने तमाम पत्र - पत्रिकाओं में काव्य , आलेख व बुंदेलखंड शैली के साहित्य का लेखन किया। नरसिंहपुर जिले में न सिर्फ दलित समाज को संगठित व जागरूक करने का पराक्रम किया साथ ही दलित साहित्य अकादमी व दलित समाज के राष्ट्रीय आयोजनों में हिस्सा लिया । स्वयं मूलचंद जी ने मध्यप्रदेश दलित साहित्यकार मंच की स्थापना कर उल्लेखनीय कार्य किया । साहित्य भूषण की मानद उपाधि प्राप्त यह साहित्यकार समाज सेवा व पत्रकारिता के लिए वर्ष 1994 में दिल्ली में दलित साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है । बात सम्मान की हो तो मेधोनिया के पास सम्मानपत्रों का ढेर लगा हुआ है, लेकिन इन सम्मानपत्रों के ढेर से तो गुजारा नहीं किया जा सकता।
मध्यप्रदेश के शीर्षस्थ साहित्यकारों और नेताओं के साथ खिची फोटो और समाचार की कतरनें इसी ढ़ेर में दिखाई पड़तें है ।परिवार से बातचीत में मूलचंद की बूढ़ी माँ बताती है कि हमारे बेटे ने यही कमाई की है। युवा ऊर्जा से भरे मूलचंद ने जिला पंचायत के चुनाव में भी उतरने की कोशिश की जिसका नतीजा यह हुआ कि क्षेत्रीय दलीय नेताओं के लिए वे मनमानी और भ्रष्टाचार के बीच रोड़ा बनने लग गये । अंतत: संगठित दलीय नेतृत्व ने उन्हें मारने पीटने से लेकर बदनाम करने तक के हर हथकंडे का प्रयोग किया ।मजबूर होकर मेधोनिया को अपनी ज़मीन छोड़नी पड़ी ।
गत 5 वर्षों से मूलचंद मेधोनिया शेपाल शहर के झुग्गी बस्ती पंपापुर में 8x8 के किराये के मकान में रहता है। दलित साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र का यह सक्रिय रचनाधर्मी नेहरू नगर चौक के मजदूर पीठे पर तपती दोपहर में खड़ा रहने को मजबूर है। मूलचंद की अब पहचान राष्ट्रीय दलित साहित्यकार की न होकर राज मिस्त्री के रूप में होती है। वह बताते है कि मजदूरी मिलने के इंतजार में पीठे पर दोपहर तक भी खड़ा रहना पड़ता है कि शायद आधे दिन ही मजदूरी नसीब हो जाये । परिवार की गरीबी और सरकार की उपेक्षा से तंग आ चुके मूलचंद बताते है कि उन्होंने असंगठित मजदूरो और दलित साहित्यकारों को संगठित करने हेतु मंच भी बनाया किंतु मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी और संस्कृति विभाग से आज तक किसी प्रकार का पुरस्कार या आर्थिक सहयोग नहीं मिल सका ।
प्रदेश में राजनैतिक आधार पर साहित्यकारों को जहाँ सम्मान मिलता रहा वही वास्तविक हकदार की उपेक्षा की गईं । एक बार तो तंग आकर इस साहित्यकार ने राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमति तक मॉग ली लेकिन न वह मिली और न आज तक उसकी जिंदगी का , उसके अंदर बैठे साहित्यकर्म और सेवा के जज्बे का घुट घुट कर मरना खत्म हुआ। तो तपते पीठे पर अपनी मजदूरी की आस में खड़ा यह मजदूर अपने हक का इंतजार कर रहा है। तो कब खत्म होगा यह इंतजार? ..... प्रश्न तो हमारी तरफ भी है।
(विस्फोट.कॉम से साभार)
Thursday, May 14, 2009
देश को जरूरत दलित थेरपी की
उत्तर भारत में एक परंपरा है। परंपरा के अनुसार शादियों के अवसर पर सवर्ण परिवार सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं। परिवार के सदस्य की मृत्यु के अवसर पर भी सामूहिक भोज का आयोजन होता है, जहां गांव के हर परिवार से कम से कम एक व्यक्ति भोजन के लिए आमंत्रित होता है। दलित भी इस निमंत्रण में शामिल किए जाते हैं।
अभी हाल में अमेरिका स्थित विश्व प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया से संबद्ध सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया ने यूपी के 20 हजार दलित परिवारों का सर्वे करवाया। सर्वे का फोकस था : 1990-2007 के दौरान दलितों की खानपान की आदतों, लाइफ स्टाइल और नौकरीपेशा में क्या परिवर्तन आया। इसमें दलित परिवारों से 80 सवाल पूछे गए। एक सवाल यह था कि 'क्या सवर्णों द्वारा आयोजित सामूहिक भोजों में आपको अलग पंक्ति में बिठा कर खाना खिलाया जाता था? कुल 75.2 प्रतिशत परिवारों ने कहा 'हां'। यानी, ग्रामीण यूपी में पैदा हुए 40 वर्ष के दलितों के तीन-चौथाई हिस्से ने अपने जीवनकाल में कभी न कभी अलग पंक्ति में बैठकर भोजन किया होगा।
यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक सवाल यह भी पूछा कि 1990 के आसपास सवर्णों के मृत जानवरों को कौन उठाता था? 39.9 प्रतिशत दलितों ने कहा कि 'केवल दलित'। दस वर्ष और पीछे जाकर यह सवाल पूछा गया होता, तो उत्तर शायद यह होता- 'केवल दलित'। यानी तब यह प्रतिशत सौ फीसदी होता। ग्रामीण भारत से संबंध रखने वाले पाठक यह जानते ही होंगे कि मृत जानवरों को उठाने के एवज में दलितों को कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। दलितों का यह सामाजिक दायित्व था। अतीत में भी जाने की जरूरत नहीं है और न ही दिल्ली से बहुत दूर। भारत की राजधानी के 50 किलोमीटर के दायरे में ही हर साल दर्जनों ऐसी घटनाएं होती हैं जहां दलित दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया जाता है और दलितों की शादियों में बारातियों पर हिंसक हमले होते हैं। मात्र जूते पहनने, धूप का चश्मा लगाने या छाता तान कर चलने पर भी दलितों पर हमले हो चुके हैं।
मनुष्य के चेतना निर्माण में उसके जीवन-अनुभवों की बड़ी भूमिका होती है। दलित चेतना पर कोई एकतरफा राय बनाने से पूर्व कृपया दलित जीवन पर थोपे गए अपमानों पर भी एक बार ध्यान दें। जीवन के अनुभव से रचित दलित चेतना में मुख्य धारा के समाज के प्रति घोर अविश्वास है। जब तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को टीवी पर कैश लेते हुए दिखाया गया तो इस लेखक के संपर्क के सारे दलितों ने इसे एक 'साजिश' करार दिया था। दलितों की राय आज भी नहीं बदली है।
भारत का राजनीतिक ढांचा तब तक अच्छा नहीं बन पाएगा, जब तक देश का सामाजिक ढांचा अच्छा नहीं बन जाता। पर किसी सामाजिक ढांचे को कभी भी नियम, कानून, न्यायपालिका, पुलिस या सैन्य शक्ति की ताकत से नहीं बदला जा सकता है। सामाजिक ढांचे के पुनर्निमाण में 'सोशल थेरपी' की जरूरत पड़ती है। अब तो मेडिकल साइंस भी यह मान चुकी है कई बीमारियों का इलाज थेरपी से ही संभव है। भारत के जाति-समाज को अब जरूरत दलित थेरपी की है।
इस संदर्भ में वर्तमान लोकसभा चुनाव भारतीयों को एक बड़ा अवसर प्रदान कर रहा है। यदि इन चुनावों के जरिए दलित प्रधानमंत्री चुना जाता है, तो यह भारतवासियों का सौभाग्य होगा। दलित प्रधानमंत्री से हमें कुछ भी नया नहीं चाहिए। बस एक दलित प्रधानमंत्री चाहिए। दलित प्रधानमंत्री का अर्थ और महत्व कुछ और ही है। पांच वर्ष के अपने कार्यकाल में दलित प्रधानमंत्री दलितों को कुछ दिए बगैर ही, एक सामाजिक क्रांति का सूत्रपात कर सकता है। दलित प्रधानमंत्री अनजाने और अनचाहे सोशल पॉइंट ऑफ रेफरेंस बदल सकता है। दलित प्रधानमंत्री मात्र दिल्ली की गद्दी पर नहीं बैठेगा, भारतवासियों के दिमाग में बैठेगा। दिमाग में पैठे दलित प्रधानमंत्री के कारण दलित यह नहीं कह पाएंगे कि 'यह समाज हमें स्वीकार नहीं करता।' इससे दलितों का व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा। दूसरी ओर, दलित प्रधानमंत्री के कारण गैर-दलित समाज भी दलितों को परंपरागत ढंग से परिभाषित नहीं कर सकेगा।
दलित प्रधानमंत्री बड़ी तेजी से दलित संबंधी सोशल पॉइंट ऑफ रेफेरेंस बदलना शुरू कर सकता है। दलित जब देश का प्रधानमंत्री होगा तो गैर-दलित समाज में दलित दूल्हों की भी स्वीकार्यता बढ़ सकेगी। गैर दलितों से रिश्तेदारी बना कर दलित समाज भी गैर-दलित समाज को अपना ही समझना शुरू कर सकेगा।
अमेरिका के ब्लैक बुद्धिजीवी बराक ओबामा को इसी तरह देख और समझ रहे हैं। उनकी दृष्टि में ओबामा के प्रेजिडेंट चुने जाने के कारण आम ब्लैक समाज की सेल्फ इस्टीम बढ़ रही है तथा अमेरिकी समाज के प्रति अविश्वास के भाव में कमी आ रही है। यदि ब्लैक थेरपी अमेरिका में कार्य कर सकती है तो दलित थेरपी भारत में भी कार्य कर सकती है।
मायावती के रूप में दलित प्रधानमंत्री की प्रबल संभावना देश के समक्ष मौजूद है। गठबंधन सरकारों के इस दौर में यह जरूरी नहीं है कि कोई पार्टी अकेले ही 272 सीटों के साथ सरकार बना ले। चरण सिंह, चंद्रशेखर देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल कुछ ही सांसदों के साथ प्रधानमंत्री बन चुके हैं। इनमें से कोई भी नेता ऐसा नहीं था, जिसकी अखिल भारतीय स्तर की अपील हो। मायावती को दार्जिलिंग से लेकर अंडमान-निकोबार तक वोट मिलते हैं। यदि मायावती को देश प्रधानमंत्री के तौर पर अपनाता है, तो इससे मायावती के अंदर से भी बहुत सारी कटुताओं का खात्मा हो सकता है। अवसर मिलने से व्यक्ति सीखता है, जिम्मेदारी मिलने पर व्यक्ति जिम्मेदार हो जाता है।
मायावती को प्रधानमंत्री चुनकर देश की राजनीति को भी एक नई दिशा दी जा सकेगी। आजादी को 60 वर्ष हो गए, पर हम राजनीति के अर्थ को ठीक से नहीं समझ पाए हैं। इसी कारण आज चुनाव आयोग में रजिस्टर होने वाली हर पार्टी की एक जातीय पहचान है। तमाम ज्ञानी नेताओं एवं राजनीतिक शास्त्रियों के बावजूद हमने राजनीति को मात्र सत्ता संचालन का औजार समझा। राजनीति को समाज बदलने का औजार इस देश ने माना ही नहीं। परिणाम सबके सामने है। जहां हम आईटी के क्षेत्र में विश्व पटल पर सम्मान पा रहे हैं, वहीं राजनीति के क्षेत्र में नैतिक रूप से पतित होते जा रहे हैं।
== नवभारत टाइम्स के 14 मई के अंक के संपादकीय से साभार (लेखकः चंद्रभान प्रसाद)==
अभी हाल में अमेरिका स्थित विश्व प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया से संबद्ध सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया ने यूपी के 20 हजार दलित परिवारों का सर्वे करवाया। सर्वे का फोकस था : 1990-2007 के दौरान दलितों की खानपान की आदतों, लाइफ स्टाइल और नौकरीपेशा में क्या परिवर्तन आया। इसमें दलित परिवारों से 80 सवाल पूछे गए। एक सवाल यह था कि 'क्या सवर्णों द्वारा आयोजित सामूहिक भोजों में आपको अलग पंक्ति में बिठा कर खाना खिलाया जाता था? कुल 75.2 प्रतिशत परिवारों ने कहा 'हां'। यानी, ग्रामीण यूपी में पैदा हुए 40 वर्ष के दलितों के तीन-चौथाई हिस्से ने अपने जीवनकाल में कभी न कभी अलग पंक्ति में बैठकर भोजन किया होगा।
यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक सवाल यह भी पूछा कि 1990 के आसपास सवर्णों के मृत जानवरों को कौन उठाता था? 39.9 प्रतिशत दलितों ने कहा कि 'केवल दलित'। दस वर्ष और पीछे जाकर यह सवाल पूछा गया होता, तो उत्तर शायद यह होता- 'केवल दलित'। यानी तब यह प्रतिशत सौ फीसदी होता। ग्रामीण भारत से संबंध रखने वाले पाठक यह जानते ही होंगे कि मृत जानवरों को उठाने के एवज में दलितों को कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। दलितों का यह सामाजिक दायित्व था। अतीत में भी जाने की जरूरत नहीं है और न ही दिल्ली से बहुत दूर। भारत की राजधानी के 50 किलोमीटर के दायरे में ही हर साल दर्जनों ऐसी घटनाएं होती हैं जहां दलित दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया जाता है और दलितों की शादियों में बारातियों पर हिंसक हमले होते हैं। मात्र जूते पहनने, धूप का चश्मा लगाने या छाता तान कर चलने पर भी दलितों पर हमले हो चुके हैं।
मनुष्य के चेतना निर्माण में उसके जीवन-अनुभवों की बड़ी भूमिका होती है। दलित चेतना पर कोई एकतरफा राय बनाने से पूर्व कृपया दलित जीवन पर थोपे गए अपमानों पर भी एक बार ध्यान दें। जीवन के अनुभव से रचित दलित चेतना में मुख्य धारा के समाज के प्रति घोर अविश्वास है। जब तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को टीवी पर कैश लेते हुए दिखाया गया तो इस लेखक के संपर्क के सारे दलितों ने इसे एक 'साजिश' करार दिया था। दलितों की राय आज भी नहीं बदली है।
भारत का राजनीतिक ढांचा तब तक अच्छा नहीं बन पाएगा, जब तक देश का सामाजिक ढांचा अच्छा नहीं बन जाता। पर किसी सामाजिक ढांचे को कभी भी नियम, कानून, न्यायपालिका, पुलिस या सैन्य शक्ति की ताकत से नहीं बदला जा सकता है। सामाजिक ढांचे के पुनर्निमाण में 'सोशल थेरपी' की जरूरत पड़ती है। अब तो मेडिकल साइंस भी यह मान चुकी है कई बीमारियों का इलाज थेरपी से ही संभव है। भारत के जाति-समाज को अब जरूरत दलित थेरपी की है।
इस संदर्भ में वर्तमान लोकसभा चुनाव भारतीयों को एक बड़ा अवसर प्रदान कर रहा है। यदि इन चुनावों के जरिए दलित प्रधानमंत्री चुना जाता है, तो यह भारतवासियों का सौभाग्य होगा। दलित प्रधानमंत्री से हमें कुछ भी नया नहीं चाहिए। बस एक दलित प्रधानमंत्री चाहिए। दलित प्रधानमंत्री का अर्थ और महत्व कुछ और ही है। पांच वर्ष के अपने कार्यकाल में दलित प्रधानमंत्री दलितों को कुछ दिए बगैर ही, एक सामाजिक क्रांति का सूत्रपात कर सकता है। दलित प्रधानमंत्री अनजाने और अनचाहे सोशल पॉइंट ऑफ रेफरेंस बदल सकता है। दलित प्रधानमंत्री मात्र दिल्ली की गद्दी पर नहीं बैठेगा, भारतवासियों के दिमाग में बैठेगा। दिमाग में पैठे दलित प्रधानमंत्री के कारण दलित यह नहीं कह पाएंगे कि 'यह समाज हमें स्वीकार नहीं करता।' इससे दलितों का व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा। दूसरी ओर, दलित प्रधानमंत्री के कारण गैर-दलित समाज भी दलितों को परंपरागत ढंग से परिभाषित नहीं कर सकेगा।
दलित प्रधानमंत्री बड़ी तेजी से दलित संबंधी सोशल पॉइंट ऑफ रेफेरेंस बदलना शुरू कर सकता है। दलित जब देश का प्रधानमंत्री होगा तो गैर-दलित समाज में दलित दूल्हों की भी स्वीकार्यता बढ़ सकेगी। गैर दलितों से रिश्तेदारी बना कर दलित समाज भी गैर-दलित समाज को अपना ही समझना शुरू कर सकेगा।
अमेरिका के ब्लैक बुद्धिजीवी बराक ओबामा को इसी तरह देख और समझ रहे हैं। उनकी दृष्टि में ओबामा के प्रेजिडेंट चुने जाने के कारण आम ब्लैक समाज की सेल्फ इस्टीम बढ़ रही है तथा अमेरिकी समाज के प्रति अविश्वास के भाव में कमी आ रही है। यदि ब्लैक थेरपी अमेरिका में कार्य कर सकती है तो दलित थेरपी भारत में भी कार्य कर सकती है।
मायावती के रूप में दलित प्रधानमंत्री की प्रबल संभावना देश के समक्ष मौजूद है। गठबंधन सरकारों के इस दौर में यह जरूरी नहीं है कि कोई पार्टी अकेले ही 272 सीटों के साथ सरकार बना ले। चरण सिंह, चंद्रशेखर देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल कुछ ही सांसदों के साथ प्रधानमंत्री बन चुके हैं। इनमें से कोई भी नेता ऐसा नहीं था, जिसकी अखिल भारतीय स्तर की अपील हो। मायावती को दार्जिलिंग से लेकर अंडमान-निकोबार तक वोट मिलते हैं। यदि मायावती को देश प्रधानमंत्री के तौर पर अपनाता है, तो इससे मायावती के अंदर से भी बहुत सारी कटुताओं का खात्मा हो सकता है। अवसर मिलने से व्यक्ति सीखता है, जिम्मेदारी मिलने पर व्यक्ति जिम्मेदार हो जाता है।
मायावती को प्रधानमंत्री चुनकर देश की राजनीति को भी एक नई दिशा दी जा सकेगी। आजादी को 60 वर्ष हो गए, पर हम राजनीति के अर्थ को ठीक से नहीं समझ पाए हैं। इसी कारण आज चुनाव आयोग में रजिस्टर होने वाली हर पार्टी की एक जातीय पहचान है। तमाम ज्ञानी नेताओं एवं राजनीतिक शास्त्रियों के बावजूद हमने राजनीति को मात्र सत्ता संचालन का औजार समझा। राजनीति को समाज बदलने का औजार इस देश ने माना ही नहीं। परिणाम सबके सामने है। जहां हम आईटी के क्षेत्र में विश्व पटल पर सम्मान पा रहे हैं, वहीं राजनीति के क्षेत्र में नैतिक रूप से पतित होते जा रहे हैं।
== नवभारत टाइम्स के 14 मई के अंक के संपादकीय से साभार (लेखकः चंद्रभान प्रसाद)==
Friday, April 10, 2009
आखिर किसे वोट दें हम दलित?
चुनावी समर में उतरने के लिए सभी तैयार हैं। नेता भी, जनता भी। नेता अपने जातीय समीकरण बैठा रहे हैं तो जनता भी इसी गणित में लगी है कि कौन उम्मीदवार अपना है। किसे वोट देना है। हर किसी की अपनी पार्टी है। सवर्णों की कांग्रेस, बनियों की बीजेपी, पिछड़ों की सपा, जनता दल यूनाइटेड और राजद। दलितों की भी अपनी पार्टी है, जिसकी अगुवाई बिहार में रामविलास और उत्तरप्रदेश में मायावती करती हैं। पिछले सालों में लालू करते थे मगर पासवान ने उनसे दलितों को लगभग छिन लिया है। सिर्फ बिहार और उत्तरप्रदेश की बात इसलिए क्योंकि इन दोनों राज्यों के बिना कोई सरकार नहीं बनने वाली। गठबंधन के दौर में सत्ता की चाबी इन्हीं दोनों राज्यों के बीच ही रही है। चूकि मैं दलित हूं इसलिए यहां सिर्फ दलितों और उनकी पार्टियों की बात।
हम दलित किसे वोट दें, यह समझ नहीं आ रहा। हालांकि ज्यादातर लोगों के सामने मायावती और रामविलास का ही आप्सन है। लेकिन सच कहें तो इनकी कार्यप्रणाली क्षुब्ध करने वाली है। पहले मायावती और उत्तरप्रदेश। ठीक है कि मायावती के शासन में महत्वपूर्ण पदों पर वो तमाम दलित अधिकारी पहुंच जाते हैं जो उनके नहीं होने पर आम तौर पर सचिवालय की फाइलों से धूल झाड़ते रहते हैं। पहले की अपेक्षा दलितों की आवाज भी सुनी जाती है। पुलिस उनकी रपट भी लिख लेती है। हो सकता है कि गांव का भोला-भाला दलित मतदाता इससे खुश भी हो कि मुख्यमंत्री एक दलित हैं। हो सकता है वह उन्हें ही वोट दें। मगर, मध्यम वर्ग का मतदाता, जो सब देख रहा है वह विचलित है।
मायावती की लंबी-लंबी मूर्तियां देखकर उसे खिन्नता होती है। हाथियों के लंबे काफिले उसे परेशान करते हैं। उनकी शानों-शौकत देखकर वह खुन्नस खाता है, क्योंकि यह उसकी गाढ़ी कमाई होती है। मंत्रियों से पैसे लेने वाली मायावती में उन्हें एक लालची औरत की छवि नजर आती है। हमारे यहां कई ऐसे नेता हुए हैं जो अविवाहित रहे हैं और अपने राजनीतिक जीवन को पारदर्शी रखा है। मायावती भी अविवाहित हैं। वह चाहती तो मोह-माया से मुक्त होकर दलित हितों के लिए ऐसा कर सकती थी जो उन्हें अंबेडकर के बाद का स्थान दे सकता था। अंबेडकर के बाद वही एक ऐसी नेता हैं जिन्हें इतने अधिकार मिल पाए हैं और ऐसा कभी-कभी ही होता है। दुर्भाग्य से मायावती इसमें अब तक नाकाम रही हैं।
अब बिहार और रामविलास पासवान की बात। जितनी तेजी से रामविलास बिहार में दलित हितचिंतक के रूप में उभरे थे, वह करिश्माई था। अब वो अपनी उस छवि को खुद से ही तोड़ते जा रहे हैं। पिछले दिनों जब उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला था तो उन्होंने उसे ठुकरा कर जैसे अपने पैर में कुल्हाड़ी मार ली थी। तब आम दलित भी निराश हुए थे, हताश हुए थे। उन्होंने जिस तरह से लोगों को दोबारा चुनाव में झोंका उससे उनकी साख गिरी ही। बिहार मे वो जिन लोगों को लोकसभा का टिकट देकर चुनाव जीतते आएं हैं और संसद मे अपनी संख्या बढ़ाने में लगे हैं, गौर करें तो अगर उन्हें लोजपा टिकट न भी देती तब भी वो जीत ही जाते। इस मामले में रामविलास भ्रम में हैं। पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन ने उन्हें आइना भी दिखा दिया है।
पिछले दिनों एक रैली में उन्होंने सूरभान सिंह नाम के अपने सांसद को समाज सेवक कह डाला। वह चौंकाने वाला था। सारा देश जानता है कि सूरजभान छंटा हुआ बदमाश हैं। उस पर दर्जनों मुकदमें चल रहे हैं। उसे समाज सेवक कह कर पासवान ने अपने चरित्र पर भी सवाल उठाने का मौका दिया है। रामविलास से बिहार की जनता को जो उम्मीदें थी उस पर उनकी खुद की कारिश्तानियों से धुंध पड़ती जा रही है।
पिछले सालों में लालू यादव के साथ भी यही हुआ। लालू जब सत्ता में आएं तो उन्होंने अपने भाषणों में हर बार दलित वर्ग का जिक्र कर उसको खुश कर दिया। जब वो किसी के साथ बैठकर ताड़ी पी लेते, मंच पर किसी गरीब को बुलाकर उससे यह पूछते कि बताओ, कौन अधिकारी तुम्हें परेशान करता है। तो लाखों दलित गदगद हो जाते। लगा, आ गया दलितों का मसीहा। लालू कहते हैं कि उनके शासन में दलित सीना चौड़ा कर के घूमते थे। उन्होंने दलितों को सामाजिक न्याय दिलाया। सही है। मगर वह भूल गए कि सीना चौ़ड़ा कर घूमने वाले दलित को पेट भरने के लिए रोटी भी चाहिए होती है। गांव का दलित इस रोटी के लिए बाबुओं और बाबाओं पर ही निर्भर है। भाषण सुनकर वह सीना तो चौड़ा कर लेता था मगर भूख लगते ही उन्हीं के सामने गिड़गिड़ाना उसकी मजबूरी होती थी। सारा का सारा सामाजिक न्याय भूख के आगे दम तोड़ देता। लालू ने उनकी रोटी का इंतजाम नहीं किया। इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।
दलितों का हितचिंतक कौन है, दलित खुद नहीं समझ पा रहे हैं। बल्कि सच तो यह है कि दलितों का हितचिंतक कोई हो ही नहीं सकता। हमलोगों को दांव पर लगा कर अपना राजनीतिक कैरियर चमकाने वाले ये दलित और पिछड़े नेता जब खुद ऊपर उठ जाते हैं तो टीकाधारी इन्हें लपक लेते हैं। उस समय ये उस जमात में शामिल हो खुद उच्च हो जाते हैं। हम दलितों को भूल जाते हैं। छोड़ देते हैं। यूं ही भूखे-नंगे, रोज की रोटी की खातिर लड़ने के लिए।
हम दलित किसे वोट दें, यह समझ नहीं आ रहा। हालांकि ज्यादातर लोगों के सामने मायावती और रामविलास का ही आप्सन है। लेकिन सच कहें तो इनकी कार्यप्रणाली क्षुब्ध करने वाली है। पहले मायावती और उत्तरप्रदेश। ठीक है कि मायावती के शासन में महत्वपूर्ण पदों पर वो तमाम दलित अधिकारी पहुंच जाते हैं जो उनके नहीं होने पर आम तौर पर सचिवालय की फाइलों से धूल झाड़ते रहते हैं। पहले की अपेक्षा दलितों की आवाज भी सुनी जाती है। पुलिस उनकी रपट भी लिख लेती है। हो सकता है कि गांव का भोला-भाला दलित मतदाता इससे खुश भी हो कि मुख्यमंत्री एक दलित हैं। हो सकता है वह उन्हें ही वोट दें। मगर, मध्यम वर्ग का मतदाता, जो सब देख रहा है वह विचलित है।
मायावती की लंबी-लंबी मूर्तियां देखकर उसे खिन्नता होती है। हाथियों के लंबे काफिले उसे परेशान करते हैं। उनकी शानों-शौकत देखकर वह खुन्नस खाता है, क्योंकि यह उसकी गाढ़ी कमाई होती है। मंत्रियों से पैसे लेने वाली मायावती में उन्हें एक लालची औरत की छवि नजर आती है। हमारे यहां कई ऐसे नेता हुए हैं जो अविवाहित रहे हैं और अपने राजनीतिक जीवन को पारदर्शी रखा है। मायावती भी अविवाहित हैं। वह चाहती तो मोह-माया से मुक्त होकर दलित हितों के लिए ऐसा कर सकती थी जो उन्हें अंबेडकर के बाद का स्थान दे सकता था। अंबेडकर के बाद वही एक ऐसी नेता हैं जिन्हें इतने अधिकार मिल पाए हैं और ऐसा कभी-कभी ही होता है। दुर्भाग्य से मायावती इसमें अब तक नाकाम रही हैं।
अब बिहार और रामविलास पासवान की बात। जितनी तेजी से रामविलास बिहार में दलित हितचिंतक के रूप में उभरे थे, वह करिश्माई था। अब वो अपनी उस छवि को खुद से ही तोड़ते जा रहे हैं। पिछले दिनों जब उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला था तो उन्होंने उसे ठुकरा कर जैसे अपने पैर में कुल्हाड़ी मार ली थी। तब आम दलित भी निराश हुए थे, हताश हुए थे। उन्होंने जिस तरह से लोगों को दोबारा चुनाव में झोंका उससे उनकी साख गिरी ही। बिहार मे वो जिन लोगों को लोकसभा का टिकट देकर चुनाव जीतते आएं हैं और संसद मे अपनी संख्या बढ़ाने में लगे हैं, गौर करें तो अगर उन्हें लोजपा टिकट न भी देती तब भी वो जीत ही जाते। इस मामले में रामविलास भ्रम में हैं। पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन ने उन्हें आइना भी दिखा दिया है।
पिछले दिनों एक रैली में उन्होंने सूरभान सिंह नाम के अपने सांसद को समाज सेवक कह डाला। वह चौंकाने वाला था। सारा देश जानता है कि सूरजभान छंटा हुआ बदमाश हैं। उस पर दर्जनों मुकदमें चल रहे हैं। उसे समाज सेवक कह कर पासवान ने अपने चरित्र पर भी सवाल उठाने का मौका दिया है। रामविलास से बिहार की जनता को जो उम्मीदें थी उस पर उनकी खुद की कारिश्तानियों से धुंध पड़ती जा रही है।
पिछले सालों में लालू यादव के साथ भी यही हुआ। लालू जब सत्ता में आएं तो उन्होंने अपने भाषणों में हर बार दलित वर्ग का जिक्र कर उसको खुश कर दिया। जब वो किसी के साथ बैठकर ताड़ी पी लेते, मंच पर किसी गरीब को बुलाकर उससे यह पूछते कि बताओ, कौन अधिकारी तुम्हें परेशान करता है। तो लाखों दलित गदगद हो जाते। लगा, आ गया दलितों का मसीहा। लालू कहते हैं कि उनके शासन में दलित सीना चौड़ा कर के घूमते थे। उन्होंने दलितों को सामाजिक न्याय दिलाया। सही है। मगर वह भूल गए कि सीना चौ़ड़ा कर घूमने वाले दलित को पेट भरने के लिए रोटी भी चाहिए होती है। गांव का दलित इस रोटी के लिए बाबुओं और बाबाओं पर ही निर्भर है। भाषण सुनकर वह सीना तो चौड़ा कर लेता था मगर भूख लगते ही उन्हीं के सामने गिड़गिड़ाना उसकी मजबूरी होती थी। सारा का सारा सामाजिक न्याय भूख के आगे दम तोड़ देता। लालू ने उनकी रोटी का इंतजाम नहीं किया। इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।
दलितों का हितचिंतक कौन है, दलित खुद नहीं समझ पा रहे हैं। बल्कि सच तो यह है कि दलितों का हितचिंतक कोई हो ही नहीं सकता। हमलोगों को दांव पर लगा कर अपना राजनीतिक कैरियर चमकाने वाले ये दलित और पिछड़े नेता जब खुद ऊपर उठ जाते हैं तो टीकाधारी इन्हें लपक लेते हैं। उस समय ये उस जमात में शामिल हो खुद उच्च हो जाते हैं। हम दलितों को भूल जाते हैं। छोड़ देते हैं। यूं ही भूखे-नंगे, रोज की रोटी की खातिर लड़ने के लिए।
Tuesday, March 31, 2009
"दीन दलित" के सहारे जारी है गौरीशंकर की जंग
आजादी के 60 साल बाद भी हम आम दलितों में आत्मविश्वास कम ही आ पाया है। अमूमन अगर कोई हमें डराता है तो हम डर जाते हैं। कोई झिड़क देता है तो चुप हो जाते है। कोई ऐसी चीज जिस पर हमारा हक है, अगर न मिले तो भी चुपचाप सह लेते हैं। झारखंड के दुमका शहर के गौरीशंकर जब सामाजिक सुरक्षा योजना में अपना नाम जुड़वाने के लिए कुछ लोगों के साथ अधिकारियों के पास गए तो उनका भी अपमान किया गया। मगर, एक सामान्य दलित की तरह गौरीशंकर खामोश नहीं रहें। उन्होंने लड़ने की ठान ली। इसके बाद सामने आया 'दीन दलित' नाम का साप्ताहिक अखबार, जिसके बूते गौरीशंकर आमलोगों की लड़ाई लड़ रहे हैं।
वह हाथ से लिखे जाने वाले इस अखबार के संपादक हैं। या यूं कहें कि रिपोर्टर, डेस्क प्रभारी, पेजमेकर, हॉकर और मालिक सबकुछ वही हैं। दीन दलित का पहला संस्करण अक्टूबर, 1986 में निकला था। तब से आज इक्कीस साल हो गए, सफर बदस्तूर जारी है। खास यह कि वह कभी स्कूल नहीं गए। और आज भी जातिगत पेशे के तहत धोबी का काम करते हैं। गौरीशंकर की आमदनी बहुत कम है लेकिन जज्बा अथाह, जिसके बलबूते वह डटे हुए हैं। लगातार। बिना थके। बिना डरे। बिना रुके।
लेकिन सब इतना आसान नहीं था। गौरीशंकर को शुरुआत में ही मुसीबत का सामना पड़ा। अखबार शुरु करने के लिए उन्हें इसको रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज़पेपर्स फॉर इंडिया (आरएनआई) में पंजीकृत कराना था। मगर एक दलित, वो भी बिना पढ़ा-लिखा, ऊपर से जेब से करक, के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया सहज नही थी। इस काम के लिए उन्हें कई बार चक्कर काटना पड़ा। आखिर में देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन के सहयोग के बाद जाकर अख़बार पंजीकृत हो सका।
हर हफ्ते अखबार निकालने की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। चार पेज के इस हिन्दी अखबार को गौरीशंकर खुद अपने हाथ से लिखते हैं। तब जाकर यह पाठकों के पास पहुंचता है। गुजर-बसर के लिए पूरे ह़फ्ते कपड़े धोने के बाद रविवार की सुबह अख़बार की 100 प्रतियां तैयार की जाती है। लगभग 50 प्रतियां नियमित ग्राहकों को बांटी जाती है, 25 सरकारी विभागों में जाती है और बाकी प्रतियों को दुमका की प्रमुख जगहों की दीवारों पर चिपका दिया जाता है। इस नेक काम में उनका पूरा परिवार उनके साथ खड़ा रहता है। उनकी पत्नी और चार बच्चे हर प्रक्रिया में उनकी मदद करते हैं। हालांकि कुछ समय पहले ही ‘दीन दलित’ को उसका पहला रिपोर्टर मिल गया है। किराने की दुकान पर काम करने वाले 45 वर्षीय रविशंकर गुप्ता अब अखबार के लिए खबरें जुटाते हैं। अखबार में स्थानीय स्तर पर हो रहे अन्याय और भ्रष्टाचार से संबंधित खबरें होती है। अब तक इसने कई बार सरकारी विभागों में फैले भ्रष्टाचार के बारे में लिखा और उसका असर भी हुआ। कई बार ऐसा हुआ जब अख़बार में ख़बर छपने के बाद प्रशासन की आंख खुली और लोगों को न्याय मिला।
हालांकि मैं इस खबर को लिख रहा हूं। पर मुझे पता है कि इसे गौरीशंकर रजक नहीं पढ़ पाएंगें। मगर, जज्बे से भरा यह इंसान हर दलित के लिए प्रेरणा लेने लायक है। जैसे गौरीशंकर दुष्यंत कुमार की लाइनें गुनगुना रहे हों ...."कौन कहता है आकाश में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।"
वह हाथ से लिखे जाने वाले इस अखबार के संपादक हैं। या यूं कहें कि रिपोर्टर, डेस्क प्रभारी, पेजमेकर, हॉकर और मालिक सबकुछ वही हैं। दीन दलित का पहला संस्करण अक्टूबर, 1986 में निकला था। तब से आज इक्कीस साल हो गए, सफर बदस्तूर जारी है। खास यह कि वह कभी स्कूल नहीं गए। और आज भी जातिगत पेशे के तहत धोबी का काम करते हैं। गौरीशंकर की आमदनी बहुत कम है लेकिन जज्बा अथाह, जिसके बलबूते वह डटे हुए हैं। लगातार। बिना थके। बिना डरे। बिना रुके।
लेकिन सब इतना आसान नहीं था। गौरीशंकर को शुरुआत में ही मुसीबत का सामना पड़ा। अखबार शुरु करने के लिए उन्हें इसको रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज़पेपर्स फॉर इंडिया (आरएनआई) में पंजीकृत कराना था। मगर एक दलित, वो भी बिना पढ़ा-लिखा, ऊपर से जेब से करक, के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया सहज नही थी। इस काम के लिए उन्हें कई बार चक्कर काटना पड़ा। आखिर में देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन के सहयोग के बाद जाकर अख़बार पंजीकृत हो सका।
हर हफ्ते अखबार निकालने की प्रक्रिया भी आसान नहीं है। चार पेज के इस हिन्दी अखबार को गौरीशंकर खुद अपने हाथ से लिखते हैं। तब जाकर यह पाठकों के पास पहुंचता है। गुजर-बसर के लिए पूरे ह़फ्ते कपड़े धोने के बाद रविवार की सुबह अख़बार की 100 प्रतियां तैयार की जाती है। लगभग 50 प्रतियां नियमित ग्राहकों को बांटी जाती है, 25 सरकारी विभागों में जाती है और बाकी प्रतियों को दुमका की प्रमुख जगहों की दीवारों पर चिपका दिया जाता है। इस नेक काम में उनका पूरा परिवार उनके साथ खड़ा रहता है। उनकी पत्नी और चार बच्चे हर प्रक्रिया में उनकी मदद करते हैं। हालांकि कुछ समय पहले ही ‘दीन दलित’ को उसका पहला रिपोर्टर मिल गया है। किराने की दुकान पर काम करने वाले 45 वर्षीय रविशंकर गुप्ता अब अखबार के लिए खबरें जुटाते हैं। अखबार में स्थानीय स्तर पर हो रहे अन्याय और भ्रष्टाचार से संबंधित खबरें होती है। अब तक इसने कई बार सरकारी विभागों में फैले भ्रष्टाचार के बारे में लिखा और उसका असर भी हुआ। कई बार ऐसा हुआ जब अख़बार में ख़बर छपने के बाद प्रशासन की आंख खुली और लोगों को न्याय मिला।
हालांकि मैं इस खबर को लिख रहा हूं। पर मुझे पता है कि इसे गौरीशंकर रजक नहीं पढ़ पाएंगें। मगर, जज्बे से भरा यह इंसान हर दलित के लिए प्रेरणा लेने लायक है। जैसे गौरीशंकर दुष्यंत कुमार की लाइनें गुनगुना रहे हों ...."कौन कहता है आकाश में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।"
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