Tuesday, August 9, 2011

दलित महिला सरपंचों को नहीं मिलता सहयोग

संविधान में भले ही महिला व दलितों के प्रति भेदभाव व छुआछूत को खत्म करने की भावना और प्रावधानों को शामिल किया गया हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है. खासतौर पर राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में दलित उत्पीड़न की प्रवृति में कोई परिवर्तन नहीं आया है. प्रदेश में एक नया मामला सामने आया है, जिसमें दलित महिला सरपंचों को अपने साथी पंचायत प्रतिनिधियों व विकास अधिकारियों के भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है. जिससे उन्हें काम करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पर रहा है. दलित महिला सरपंचों को आदेशों को मानने से भी ये साफ मुकर जाते हैं.
लगातार इस तरह की शिकायत आने के बाद अब ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग ने अब ऐसे ग्राम सेवकों व पंचायत प्रतिनिधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा की है. इस संबंध में तत्काल एक सर्कुलर जारी करते हुए सभी जिला परिषद के सीईओ को महिला सरपंचों की शिकायतों पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं. राज्य की 9177 ग्राम पंचायत में से लगभग 734 पंचायतों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. जिला परिषद विभाग के उपशासन सचिव ने यह माना है कि अधिकतर ग्राम पंचायतों में नव निर्वाचित दलित महिला सरपंचों को ग्राम सेवकों व पंचायत समिति की ओर से केन्द्र व राज्य सरकार की ग्रामीण विकास योजनाओं की जानकारी नहीं दी जा रही है. साथ ही ये सदस्य महिला सरपंचों के आदेशों का पालन भी नहीं करते हैं. महिला के सरपंच होने के कारण ग्रामसेवकों द्वारा उनके विभिन्न आदेशों की अनदेखी भी की जाती है. ऐसे में उपशासन सचिव ने दलित महिला सरपंचों को योजनाओं की समय पर लिखित में जानकारी देने के आदेश दिया हैं.

रेप नहीं कर पाएं तो जिंदा जला दिया

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में कुछ गुंडों ने बारहवीं क्लास की एक दलित छात्रा को जिंदा जला दिया. ठीक एक दिन पहले ही आरोपियों ने छात्रा से बलात्कार करने की कोशिश की थी, इसमें विफल रहने के बाद उन्होंने उसे जला दिया. गंभीर रूप से झुलसी छात्रा को सीतापुर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया. उसकी हालत नाजुक बनी हुई है. घटना 2 अगस्त की है. लड़की को जलाने वाले सभी आरोपी फरार हैं. जहां घटना घटी है वो लखनऊ कमिश्नरी के सीतापुर जिला स्थित थाना रामकोट क्षेत्र का जुहरी गांव है. घटना को तब अंजाम दिया गया जब लड़की अपने घर में सो रही थी. चार लोग अचानक उसके घर में घुस आए. लड़की के पिता मोल्हू जब तक कुछ समझते इन लोगों ने मिट्टी का तेल डालकर सोती ममता को जलाकर मारने का प्रयास किया. वहीं राजस्थान के अलवर जिले में घटी एक घटना में बलात्कार के बाद लड़की की हत्या कर दी गई. पिछले हफ्ते घटी इस घटना में आरोपियों ने लड़की को अपहरण कर लिया था. इसके बाद उसके साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी और उसे जिला अस्पताल के बाहर फेंककर फरार हो गए.

पहला जनजातिय सामुदायिक रेडियो शुरू

पश्चिमी मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा क्षेत्र में बसी 'भील' जनजाति के पास अब अपना रेडियो स्टेशन होने जा रहा है. यह रेडियो स्टेशन इस जनजाति की ठेठ बोली में बात करेगा, उसके सरोकारों को समझेगा और उसकी संस्कृति के तराने सुनाएगा. भाबरा रेडियो स्टेशन से हर रोज दो घंटे का कार्यक्रम प्रसारित किया जाएगा. इन कार्यक्रमों को स्थानीय स्तर पर जनजातीय समुदाय ही तैयार करेगा और इन्हें रेडियो स्टेशन के 20 किलोमीट के दायरे में सुना जा सकेगा. भाबरा रेडियो स्टेशन दुनिया का पहला जनजातीय सामुदायिक रेडियो केंद्र होगा, जिसे यह समुदाय खुद चलाएगा.
पिछड़े इलाकों में बसे आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा में लाने और उनकी संस्कृति को अगली पीढ़ियों के लिए बचाए रखने के लिए 110 स्थानों को सामुदायिक रेडियो स्टेशन खोलने के लिए चिन्हित किया गया है. उनके अनुसार, भाबरा रेडियो स्टेशन से इस अभियान की शुरूआत होगी, जिसमें राज्य सरकार का आदिम जाति कल्याण विभाग मदद कर रहा हैं. भाबरा, वह स्थान है, जहां महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आजाद का बचपन बीता. राज्य में जनजातियों के सामुदायिक रेडियो स्टेशन शुरू करने के अभियान की अगुआई सरकारी उपक्रम 'वन्या' कर रहा है. 'वन्या' के प्रबंध संचालक और संस्कृति विभाग के संयुक्त सचिव श्रीराम तिवारी के अनुसार, राज्य के 110 आदिवासी बहुल इलाकों में सामुदायिक रेडियो स्टेशन शुरू करने का संकल्प लिया है, ताकि इस समुदाय में सूचनाओं के अभाव को दूर किया जा सके. उनके अनुसार, रेडियो जैसा सस्ता और सुलभ माध्यम पिछड़े इलाकों में बसे आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा में लौटाने के लिए बेहद कारगर साबित हो सकता है.

साभारः शिल्पकार टाइम्स

कौन सुनेगा चकमा जनजाति का दर्द

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालथनहॉला द्वारा बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले स्थानीय चकमा समुदाय के लोगों को कहे गए अपशब्द के बाद अल्पसंख्यक चकमा और ब्रू समाज में आक्रोश साफ नजर आ रहा है. यह घटना उस समय की है, जब छात्र संगठन जिराइल पॉल द्वारा आइजॉल के वणप्पा हॉल में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मिजोरम के चकमा और ब्रू जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के लिए मिजो में नॉकसक वाई छेहो और टूइकूक जैसे अपशब्दों का प्रयोग किया गया. नॉकशक का शाब्दिक अर्थ मूर्ख, वाई छेहो का अर्थ बिना काम के और टूइकूक का गंदी नाली का कीड़ा है. इस घटना के बाद लगभग एक दर्जन चकमा और ब्रू छात्र और सामाजिक संगठनों ने मुख्यमंत्री के इस वक्तव्य का जमकर विरोध किया है. सामाजिक संगठनों का कहना था कि समाज के पिछड़े, अल्पसंख्यक समाज के लोगों को आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी सरकार की होती है. लेकिन सरकार के मुखिया ही इस तरह के गैर जिम्मेवार किस्म के वक्तव्य देंगे तो उनके मातहतों से क्या उम्मीद की जा सकती है?
मिजोरम में चकमा और ब्रू जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के साथ भेदभाव आम सी बात हो गई है. इसकी एक वजह यह है कि चकमा समाज के लोग अहिंसा प्रिय हैं. इस बात को मिजो समाज के लोग भी जानते हैं कि बौद्ध धर्म में विश्वास रखने वाले चकमा समाज के लोग हिंसा में विश्वास नहीं रखते हैं. चकमा ऑटोनॉमस डेवलपमेन्ट काउंसिल में मिजोरम के तीन जिले आते हैं, लुंगलई, लुंगतलई और मामिट. ये तीनों जिले बोर्डर एरिया डेवलपमेन्ट प्रोग्राम के अंदर आते हैं. मामिट एवं लुगतलई मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेन्ट प्लान के अंतर्गत आते हैं. बैकवर्ड रिजन ग्राट फंड की योजना लुंगतलई का नाम है. विभिन्न योजनाओं से बहुत सारा पैसा चकमा ऑटोनॉमस डेवलपमेन्ट काउंसिल के नाम पर आता है. इन सबके बावजूद दिलचस्प यह है कि देश सबसे पिछड़े इलाकों में ऑटोनॉमस काउंसिल का क्षेत्र भी शामिल है. राज्य के मुख्यमंत्री ने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘क्रिश्चिनियटी ना सिर्फ मिजोरम के समाज में परिवर्तन का द्योतक रहा है बल्कि हमारे बीच में प्रौढ़ शिक्षा की अवधारणा वहीं से आई है. हम तो सौ फीसदी साक्षरता की दर पाने की उम्मीद रखते हैं लेकिन दक्षिण मिजोरम के दो जिलों की वजह से हमारा यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा.’ उनका इशारा शायद बातों ही बातों में मारा (सिआहा) और लुंगलेई की तरफ था. यह दो जिले मारा और चकमा समुदायों के गढ़ माने जाते हैं. राज्य के इन दोनों अल्पसंख्यक समुदायों के अपना-अपना स्वायत जिला परिषद है. यदि राज्य में इन दो अल्पसंख्यक समुदायों के बीच शिक्षा की ये दुर्दशा है तो इसके लिए दोषी राज्य सरकार ही है. चूंकि जिलों के बीच में विकास के मद में पैसा बांटने में ही ऊपर से ही भेदभाव बरता जाएगा तो निश्चित तौर पर एक खास समाज पिछे छूट ही जाएगा. मिजोरम की स्थिति को देखकर लगता है कि योजना के साथ अल्पसंख्यक चकमा, ब्रू और मारा समाज के लोगों को पिछड़ेपन का शिकार बनाया गया है.
मिजोरम चकमा डेवलपमेन्ट फोरम से जुड़े पारितोष चकमा कहते हैं, मिजो समाज के लोगों को समझना चाहिए कि जिस तरह दिल्ली-मुम्बई में अपने साथ भेदभाव की बात वे लगातार उठाते रहे हैं, कम से कम इस आधार पर उन्हें हम अल्पसंख्यकों की तकलीफ को समझना चाहिए. यदि वे हमारी तकलीफ को नजरअंदाज करते हैं तो उन्हें क्या हक है कि दूसरे प्रदेशों में अपने साथ होने वाले भेदभाव की बात को वे विभिन्न मंचों से उठाएं?
परितोष अपनी बात में उडि़सा और गुजरात की घटना को जोड़ना नहीं भूलते, बकौल पारितोष कंधमाल (उडि़सा) में जिस तरह क्रिश्चियन अल्पसंख्यकों के साथ बूरा बर्ताव हुआ और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ जिस तरह का व्यवहार गोधरा (गुजरात) में हुआ, उसके बाद अल्पसंख्यक समाज के लोग चुप नहीं बैठे. उन्होंने उसके खिलाफ आवाज उठाई है. उसी तरह मिजोरम में चकमा समाज के लोगों के साथ भेदभाव किया जा रहा है तो समाज के लोगों को एक स्वर में विरोध के साथ सामने आना चाहिए.
देश की स्वतंत्रता की दुहाई हम लाख दे लें लेकिन आज भी इस तरह के साम्राज्यवादी सोच वाले मुख्यमंत्री हमारे देश में हैं. जो सार्वजनिक मंचों पर खड़े होकर इस तरह का विद्वेशपूर्ण भाषण दे सकते हैं. मिजोरम के मुख्यमंत्री का यह भाषण निन्दनीय है. दुख की बात यह है कि इस घटना को एक महीना गुजरने के बाद भी किसी केन्द्रिय स्तर के नेता ने इस बात को तवज्जों तक नहीं दिया. जबकि भारत के अंदर पूर्वोत्तर का क्षेत्र कितना संवेदनशील है यह किसी से छुपा नहीं है. लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों की बात जब भी दिल्ली में की जाती है लोगों के बीच कुछ इस तरह की प्रतिक्रिया होती है मानों किसी दूसरे देश की बात हो रही हो. यहां यह बात विश्वसनीय नहीं है कि इतनी बड़ी घटना की जानकारी देश के गृह मंत्रालय को नहीं होगी. लेकिन उनकी तरफ से इस घटना का संज्ञान लेकर कोई कार्यवाही की गई हो, इसकी जानकारी नहीं मिलती है. वैसे अब चकमा समाज की नई पीढ़ी अपने समाज के लोगों पर वर्षों से हो रहे भेदभाव के खिलाफ चुप रहने को तैयार नहीं है. वह सवाल उठाने लगी है. मिजोरम जो देश में पढ़े लिखे लोगों के राज्य तौर पर पहचाना जाता है, 2011 के गणना के अनुसार जहां शिक्षा 91.58 प्रतिशत है. देश का सबसे अधिक पढ़ा लिखा जिला सर्चिप (98.76 प्रतिशत) और दूसरा जिला आईजॉल (98.50 प्रतिशत) मिजोरम में ही हैं. उसके बावजूदर चकमा समाज के 72 प्रतिशत गांवों में कोई मध्य विद्यालय नहीं है और 96 प्रतिशत से भी अधिक ऐसे गांव हैं, जहां उच्च विद्यालय नहीं है.
मिजोरम सरकार में चकमा मंत्री निहार कान्ति चकमा अपने सरकार का बचाव करते हुए इस संबंध में सारा दोष चकमा समाज पर ही डाल देते हैं. मंत्री श्री चकमा के अनुसार हमारे चकमा समाज में शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है. जिसकी वजह हमारे समाज में जागरुकता की कमी और सुविधाओं का अभाव है. मंत्रीजी सरकार के बचाव मे चाहें जो कहें लेकिन सच्चाई यह है कि बेहद चालाकी के साथ मिजोरम में विकास की बयार चकमा समाज के लोगों के बीच पहुंचने ही नहीं दी गई. आज बेहद समझदारी के साथ उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों से दूर किया जा रहा है. दूसरी तरफ उनकी जमीनों पर भी अलग-अलग बहाने से कब्जा किया जा रहा है. चकमा समाज के लोग सरकारी नौकरी में प्रवेश ना पा सकें इसलिए मिजो भाषा को सरकारी नौकरियों के लिए अनिवार्य किया गया. जबकि चकमा उसी समाज के नागरिक हैं. उनके पास अपनी भाषा और लिपी है फिर उनपर एक और भाषा का बोझ अनिवार्य करना कितना उचित है? उदाहरण के तौर पर पिछले साल छह दिसम्बर को मिजोरम में प्राथमिक और मध्य विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाने वाले शिक्षकों की बहाली के लिए हुए परीक्षा में पचास फीसदी सवाल मिजो में पूछे गए. इसका अर्थ तो यही निकलता है कि मिजो छोड़कर दूसरे समाज के लोगों को परीक्षा से बाहर रखने का यह सरल रास्ता सरकार ने निकाला है. उन्हें जमीन से बेदखल करने के लिए भी सरकार के पास कई परियोजनाएं हैं. ममिट में डम्पा टाइगर रिजर्व के विस्तार में 227 चकमा परिवार प्रभावित हो रहे हैं.
गौरतलब है कि इस टाइगर रिजर्व में वर्तमान में कुल जमा छह शेर ही हैं. स्वास्थ सेवा की बात करें तो चकमा बहुल गांवों में उसकी हालत बेहद खराब है. लुंगलेई जिले में मलेरिया जैसे रोग की वजह से आधा दर्जन बच्चों की मौत हो जाने के बाद चिकित्सा सेवा वहां पहुंचती है. उस वक्त उस छोटे से गांव में लगभग पांच दर्जन लोग थे, जिन्हें स्वास्थ सेवाओं की जरुरत थी. चकमा समाज के लोग अब इस बात को जानना चाहते हैं कि क्या उन्हें लगातार सिर्फ अत्याचार के खिलाफ अहिंसा के साथ खड़े होने की सजा मिल रही है. मिजोरम में शांति व्यवस्था बनाए रखने की सजा मिल रही है. यदि नहीं तो उनके विकास के लिए मिजोरम सरकार के पास क्या योजनाएं हैं?

सरोकार.नेट से साभार
लेखक- आशीष कुमार अंशु

Sushant Meshram setting up 30 bed hospital Ambedkar Institute of Medical Science

As a child, whenever he fell ill, good healthcare would eludeSushant Meshram. "I couldn't receive good treatment as I was poor and a dalit," he says. Today, as a sleep physician in Nagpur, the 41-year-old does his bit to ensure those two attributes are not the basis for denial of treatment.
At the second floor of Neeti Gaurav Complex, near Ramdaspeth in Nagpur, a dozen kids are queued up to consult Meshram, whose board announces him as Central India's only certified sleep physician. When he was their age, though, he was working. At the tender age of 12, Meshram would pack small boxes in a plastics factory in Nagpur and earn Rs 5 per day. His family needed that money as his father was a worker in the ordnance factory and mother a maid.
Despite their poverty, Meshram and his siblings received a good education. Meshram went to a Kendriya Vidyalaya in Nagpur, where most of his classmates were from upper castes. But neither poverty nor the caste-based differences deterred him in his studies. Meshram always came first or second, and topped 90%; even in medical college, he was an accomplished student, and he went on to do a fellowship from the prestigious John Hopkins Medical University in the US. While studying medicine in Nagpur, he recalls incidents of discrimination from upper-caste teachers. He failed a semester in third year after a tiff with a professor. "We argued over a pathology slide project and I was later declared failed. I was not supposed to raise my voice."

CLINIC TO HOSPITAL
Those days of hardship led him to another decision, one that is now a business plan. Meshram is looking beyond his clinic, which is currently a Rs 10 lakh venture. He is setting up a 30-bed, multi-specialty hospital in Nagpur, for Rs 10 crore:Ambedkar Institute of Medical Science.
Spread over 7,000 sq ft, the hospital is expected to open in December. Four doctors, one of them being Meshram, are the primary stakeholders; plus, there are a few investors. The venture has secured bank loans of Rs 5 crore for the construction and equipment, and 10 doctors have signed up. Meshram wants to take this chain to Raipur, Mumbai, Pune and Aurangabad as well.
In order to be stay affordable to those who need it the most, the hospital will cross-subsidise services. Those who have the ability to pay will be charged extra, while the poor will either not pay or pay a minimal amount. "One engine pulls along various classes of bogies - be it general, sleeper or air-conditioned - to reach the same destination," says Meshram.
"Our hospital will serve all classes of people with equality." The stakeholder-doctors are also finalising plans for a medical college, and are talking to the government on land and policy issues.

Courtesy: ET

मिर्चपुर पर फैसले से दलित आशंकित

हरियाणा के बहुचर्चित मिर्चपुर प्रकरण में आगामी 20 अगस्त को फैसला सुनाया जाएगा. मामले की सुनवाई कर रही रोहिणी की विशेष अदालत 97 आरोपियों के बारे में अपना फैसला सुनाएगी. फैसले की घड़ी नजदीक आता देख बचाव पक्ष में छटपटाहट बढ़ गई है. वह इस पूरे मामले को जातिगत विवाद की बजाए सामुदायिक विवाद बताने में जुटा हैं. साथ ही कई और बातों को सामने रखकर मामले को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. तो इधर सवर्णों द्वारा जलाकर मार डाले गए मृतक ताराचंद की पत्नी कमला सहित तमाम पीड़ितों ने सुरक्षा की गुहार लगाई है.
कमला देवी अपने बेटे अमर लाल, रवींद्र व प्रदीप के साथ हिसार के एसपी से मिली और परिवार की सुरक्षा की मांग की. एसपी से की शिकायत में कमला ने कहा कि अदालत के फैसले को देखते हुए उनकी जान को खतरा बढ़ गया है. उन्होंने खुद को मिली सुरक्षा को और बढ़ाने की मांग की. इधर, 20 अगस्त को अदालत के निर्णय को देखते हुए मिर्चपुर के ग्रामीणों ने तंवर फार्महाउस में एक बैठक का आयोजन किया. इसमें आशंका जताई गई कि फैसले के बाद गांव में तनाव बढ़ सकता है. एक जाति विशेष को निशाना बनाया जा सकता है. इससे पहले भी इस प्रकार की कई घटनाएं हो चुकी हैं. गवाहों को भी निशाना बनाया जा सकता है. आशंका जताई गई कि हमलावरों को प्रदेश सरकार की मूक सहमति हासिल है. बैठक में यह निर्णय लिया गया कि 6 अगस्त से हिसार लोकसभा क्षेत्र के सभी गांवों का दौरा कर प्रदेश सरकार की दलित विरोधी नीति से लोगों को अवगत करवाया जाएगा.

ऊंचाई छूती सरोज की 'कल्पना'

बात इसी साल जनवरी महीने की है. दलित उद्यमियों द्वारा आयोजित एक पार्टी में काले सूट पहने उद्यमियों से घिरे चंद्रभान प्रसाद ने पूछा, ‘अगले साल कौन हेलीकॉप्टर खरीदने जा रहा है?’ भीड़ में से जिस शख़्स को आगे किया गया उसने अपना हाथ ऊपर उठा रखा था और वह एक काली चमकीली साड़ी पहने थी तथा उनके गले में रूबी और हीरा जडि़त एक भारी हार था. वह हाथ कल्पना सरोज का था. वहां मौजूद ज्यादातर लोग इस बात से सहमत थे कि कमानी ट्यूब्स की अध्यक्ष कल्पना सरोज वहां उपस्थित सबसे सफल उद्यमी हैं.
बाद में एक बातचीत में सुश्री सरोज ने बताया कि उनकी कुल संपत्ति पांच बिलियन रुपए (लगभग 112 मिलियन डॉलर) की है. दलित बिजनेस चैंबर और योजना आयोग के बीच सोमवार को होनेवाली बैठक के पहले यह सम्मेलन आयोजित किया गया था. वर्ण-व्यवस्था के सबसे निचले स्तर में आनेवाले समुदाय के लोगों ने कहा कि उदार आर्थिक नीति से उन्हें लाभ मिला है. उन्होंने कहा कि इसके जरिए भारत के समाजवादी युग तथा इसकी सरकारी नौकरियों की तुलना में उनकी प्रतिभाओं तथा योग्यताओं को कहीं अधिक अवसर प्राप्त हुए हैं. शायद सुश्री सरोज की तरह इस आंदोलन का कोई और प्रतीक नहीं हो सकता है. उनके पति समीर सरोज का कहना है कि ‘मुख्य बात यह जानने की है कि यह महिला नौवीं पास हैं और प्रतिदिन दो रुपए कमाया करती थीं.’ श्री समीर पहले निर्माण कार्यों के लिए बालू की आपूर्ति करनेवाली कंपनी चलाया करते थे, और अब वे अपनी पत्नी के लिए काम करते हैं.
सुश्री सरोज ने 1980 के दशक के मध्य में महाराष्ट्र के अकोला से मुंबई आने की एक उल्लेखनीय यात्रा का वर्णन किया. यह भारत द्वारा अपनी अर्थ-व्यवस्था को उदार बनाने के दौर से शायद पांच साल पहले की बात है. अकोला में, उनकी शादी 12 साल की उम्र में कर दी गयी और 14 साल की उम्र में उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा. उनकी शादी टिक नहीं पायी. उनके पिता के पुलिस अधिकारी के पद से निलंबन के बाद उन्हें किशोर वय में ही काम करना पड़ा. मुंबई में, दर्जी का काम करके वे रोजाना दो रुपए (लगभग .05 अमेरिकी सेंट) कमाया करती थीं. उनकी कमाई बढ़ने पर पर उन्होंने अपनी सुविधा के लिए सिलाई मशीन ले ली. बाद में, बैंक ऋण लेकर वे एक फर्नीचर की दूकान चलाने लगीं. जैसा कि भारत के नवधनिकों के साथ हुआ करता है, रियल एस्टेट ने उनके जीवन में एक बड़ा मौका प्रदान किया.
1997 में, उन्होंने शहर में एक जमीन खरीदी. जिद्दी किरायेदार तथा संभावित कानूनी समस्याओं के कारण यह संपत्ति उन्हें सस्ते में मिल गयी. सुश्री सरोज ने कहा, ‘मैं लोगों को जानती थी. मैंने सोचा कि मैं यह काम कर सकती हूं… मेरे अंदर ऐसी ताकत है.’ तब तक उन्हें मुंबई में एक दशक से अधिक समय हो चुका था. सुश्री सरोज ने कहा कि वे अपनी इमारत से संबंधित फाइलों का पीछा एक सरकारी दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक करती रहीं, जब तक कि किराये दार का मामला सलट न गया. उन्होंने अंतत: उस जमीन पर एक इमारत खड़ी की (उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े हीरे के नाम पर इसका नाम कोहिनूर प्लाजा रखा).
वे कहती हैं कि इस बीच उन्हें स्थानीय माफिया की ओर से धमकियां मिलने लगीं, जो संपत्ति के व्यवसाय में किसी बाहरी व्यक्ति के हस्तक्षेप से नाखुश थे. उन्होंने बताया कि इमारत का प्लान के पास हो जाने के बाद एक व्यक्ति ने आकर उन्हें चेतावनी दी कि उनके खात्मे के लिए 500,000 रूपए (11,363 डॉलर) की सुपारी दे दी गयी है और बेहतर है कि वे शहर छोड़ कर चली जाएं. सुश्री सरोज ने कहा कि उस व्यक्ति ने कहा कि, ‘तुम जहां से आयी हो, वहां जमीन पानी मांगती है, लेकिन यहां मुंबई में जमीन ख़ून मांगती हैं.’ वे पुलिस स्टेशन गयीं और उन्होंने इस धमकी की शिकायत दर्ज करायी. पुलिस ने गुंडे को गिरफ्तार कर लिया. उस गुंडे का नाम उन्होंने उस व्यक्ति से जान लिया था जिसने उन्हें उक्त ‘सुपारी’ के बारे में बताया था. उन्होंने कहा, ‘बाद में मामला सुलझ गया.’ 2000 में उन्होंने कोहिनूर प्लाजा बेच दिया और उससे प्राप्त रकम को दूसरे भूमि सौदे में लगा दिया. सुश्री सरोज ने कहा कि इससे उनकी छवि ऐसी महिला की बन गयी जो मुंबई में जटिल समस्याओं को सुलझाने में लोगों की मदद कर सकती है.
2006 में, धातु का ट्यूब बनानेवाली कंपनी कमानी ट्यूब की कमान संभाली (वे पहले इसके बोर्ड में शामिल थीं), जिस पर 1.1 बिलियन रुपए का कर्ज था और जो दिवालिया होने के कगार पर थी. वे कहती हैं कि उन्हें उम्मीद है कि अगले साल तक यह कारखाना सारे कर्ज चुका देगा. उनकी एक चीनी मिल भी है. सुश्री सरोज अपनी सफलता के लिए अपनी धुन को श्रेय देती हैं. वे कहती हैं कि एक बार जब उन्होंने कोई काम करने की ठान लिया तो वे उसे पूरा नहीं कर सकतीं, यह बात मानने को वे तैयार नहीं हैं. उन्होंने कहा, ‘बहुत सारे रास्ते हैं, अगर कोई एक रास्ता काम न आएं तो मैं दूसरा रास्ता तलाशती हूं. अगर उससे भी बात न बने तो मै उसके अन्य विकल्प के बारे में सोचती हूं.’ वे फिलहाल बैलार्ड एस्टेट पर काम कर रही हैं, जिसके आसपास के दफ़्तरों में भारत के सबसे धनी व्यक्ति मुकेश अंबानी का रिलायंस हाउस भी है.
इस बीच उन्होंने अपने छोटे भाई और बहन की शादी के खर्च भी उठाये और दोनों को एक-एक अपार्टमेंट उपहार में दिया. अपनी बेटी को होटल प्रबंधन की पढ़ाई के लिए लंदन और अपने बेटे को पायलट के प्रशिक्षण के लिए जर्मनी भेजा. जहां तक हेलीकॉप्टर का सवाल है, सुश्री सरोज का कहना है कि वे इस साल एक हेलीकॉप्टर और एक विमान खरीदना चाहती हैं, लेकिन अपने निजी इस्तेमाल के लिए नहीं (वे कहती हैं, कम से कम शुरूआत में नहीं). अपने बेटे के विदेश में जाकर प्रशिक्षण लेने के तथ्य का जिक्र करते हुए वे कहती हैं कि वे जिस जिले में पली-बढ़ी हैं, वहां दलित मसीहा डॉ बी. आर. अंबेडकर के नाम के हवाईअड्डे में अरबों डॉलर के उड्डयन हब बानये जाने की योजना है, वहीं एक पायलट प्रशिक्षण स्कूल खोलना चाहती हैं.
साभारः इंडिया रियल टाइम