Tuesday, August 9, 2011

पहला जनजातिय सामुदायिक रेडियो शुरू

पश्चिमी मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा क्षेत्र में बसी 'भील' जनजाति के पास अब अपना रेडियो स्टेशन होने जा रहा है. यह रेडियो स्टेशन इस जनजाति की ठेठ बोली में बात करेगा, उसके सरोकारों को समझेगा और उसकी संस्कृति के तराने सुनाएगा. भाबरा रेडियो स्टेशन से हर रोज दो घंटे का कार्यक्रम प्रसारित किया जाएगा. इन कार्यक्रमों को स्थानीय स्तर पर जनजातीय समुदाय ही तैयार करेगा और इन्हें रेडियो स्टेशन के 20 किलोमीट के दायरे में सुना जा सकेगा. भाबरा रेडियो स्टेशन दुनिया का पहला जनजातीय सामुदायिक रेडियो केंद्र होगा, जिसे यह समुदाय खुद चलाएगा.
पिछड़े इलाकों में बसे आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा में लाने और उनकी संस्कृति को अगली पीढ़ियों के लिए बचाए रखने के लिए 110 स्थानों को सामुदायिक रेडियो स्टेशन खोलने के लिए चिन्हित किया गया है. उनके अनुसार, भाबरा रेडियो स्टेशन से इस अभियान की शुरूआत होगी, जिसमें राज्य सरकार का आदिम जाति कल्याण विभाग मदद कर रहा हैं. भाबरा, वह स्थान है, जहां महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आजाद का बचपन बीता. राज्य में जनजातियों के सामुदायिक रेडियो स्टेशन शुरू करने के अभियान की अगुआई सरकारी उपक्रम 'वन्या' कर रहा है. 'वन्या' के प्रबंध संचालक और संस्कृति विभाग के संयुक्त सचिव श्रीराम तिवारी के अनुसार, राज्य के 110 आदिवासी बहुल इलाकों में सामुदायिक रेडियो स्टेशन शुरू करने का संकल्प लिया है, ताकि इस समुदाय में सूचनाओं के अभाव को दूर किया जा सके. उनके अनुसार, रेडियो जैसा सस्ता और सुलभ माध्यम पिछड़े इलाकों में बसे आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा में लौटाने के लिए बेहद कारगर साबित हो सकता है.

साभारः शिल्पकार टाइम्स

कौन सुनेगा चकमा जनजाति का दर्द

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालथनहॉला द्वारा बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले स्थानीय चकमा समुदाय के लोगों को कहे गए अपशब्द के बाद अल्पसंख्यक चकमा और ब्रू समाज में आक्रोश साफ नजर आ रहा है. यह घटना उस समय की है, जब छात्र संगठन जिराइल पॉल द्वारा आइजॉल के वणप्पा हॉल में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मिजोरम के चकमा और ब्रू जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के लिए मिजो में नॉकसक वाई छेहो और टूइकूक जैसे अपशब्दों का प्रयोग किया गया. नॉकशक का शाब्दिक अर्थ मूर्ख, वाई छेहो का अर्थ बिना काम के और टूइकूक का गंदी नाली का कीड़ा है. इस घटना के बाद लगभग एक दर्जन चकमा और ब्रू छात्र और सामाजिक संगठनों ने मुख्यमंत्री के इस वक्तव्य का जमकर विरोध किया है. सामाजिक संगठनों का कहना था कि समाज के पिछड़े, अल्पसंख्यक समाज के लोगों को आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी सरकार की होती है. लेकिन सरकार के मुखिया ही इस तरह के गैर जिम्मेवार किस्म के वक्तव्य देंगे तो उनके मातहतों से क्या उम्मीद की जा सकती है?
मिजोरम में चकमा और ब्रू जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के साथ भेदभाव आम सी बात हो गई है. इसकी एक वजह यह है कि चकमा समाज के लोग अहिंसा प्रिय हैं. इस बात को मिजो समाज के लोग भी जानते हैं कि बौद्ध धर्म में विश्वास रखने वाले चकमा समाज के लोग हिंसा में विश्वास नहीं रखते हैं. चकमा ऑटोनॉमस डेवलपमेन्ट काउंसिल में मिजोरम के तीन जिले आते हैं, लुंगलई, लुंगतलई और मामिट. ये तीनों जिले बोर्डर एरिया डेवलपमेन्ट प्रोग्राम के अंदर आते हैं. मामिट एवं लुगतलई मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेन्ट प्लान के अंतर्गत आते हैं. बैकवर्ड रिजन ग्राट फंड की योजना लुंगतलई का नाम है. विभिन्न योजनाओं से बहुत सारा पैसा चकमा ऑटोनॉमस डेवलपमेन्ट काउंसिल के नाम पर आता है. इन सबके बावजूद दिलचस्प यह है कि देश सबसे पिछड़े इलाकों में ऑटोनॉमस काउंसिल का क्षेत्र भी शामिल है. राज्य के मुख्यमंत्री ने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘क्रिश्चिनियटी ना सिर्फ मिजोरम के समाज में परिवर्तन का द्योतक रहा है बल्कि हमारे बीच में प्रौढ़ शिक्षा की अवधारणा वहीं से आई है. हम तो सौ फीसदी साक्षरता की दर पाने की उम्मीद रखते हैं लेकिन दक्षिण मिजोरम के दो जिलों की वजह से हमारा यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा.’ उनका इशारा शायद बातों ही बातों में मारा (सिआहा) और लुंगलेई की तरफ था. यह दो जिले मारा और चकमा समुदायों के गढ़ माने जाते हैं. राज्य के इन दोनों अल्पसंख्यक समुदायों के अपना-अपना स्वायत जिला परिषद है. यदि राज्य में इन दो अल्पसंख्यक समुदायों के बीच शिक्षा की ये दुर्दशा है तो इसके लिए दोषी राज्य सरकार ही है. चूंकि जिलों के बीच में विकास के मद में पैसा बांटने में ही ऊपर से ही भेदभाव बरता जाएगा तो निश्चित तौर पर एक खास समाज पिछे छूट ही जाएगा. मिजोरम की स्थिति को देखकर लगता है कि योजना के साथ अल्पसंख्यक चकमा, ब्रू और मारा समाज के लोगों को पिछड़ेपन का शिकार बनाया गया है.
मिजोरम चकमा डेवलपमेन्ट फोरम से जुड़े पारितोष चकमा कहते हैं, मिजो समाज के लोगों को समझना चाहिए कि जिस तरह दिल्ली-मुम्बई में अपने साथ भेदभाव की बात वे लगातार उठाते रहे हैं, कम से कम इस आधार पर उन्हें हम अल्पसंख्यकों की तकलीफ को समझना चाहिए. यदि वे हमारी तकलीफ को नजरअंदाज करते हैं तो उन्हें क्या हक है कि दूसरे प्रदेशों में अपने साथ होने वाले भेदभाव की बात को वे विभिन्न मंचों से उठाएं?
परितोष अपनी बात में उडि़सा और गुजरात की घटना को जोड़ना नहीं भूलते, बकौल पारितोष कंधमाल (उडि़सा) में जिस तरह क्रिश्चियन अल्पसंख्यकों के साथ बूरा बर्ताव हुआ और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ जिस तरह का व्यवहार गोधरा (गुजरात) में हुआ, उसके बाद अल्पसंख्यक समाज के लोग चुप नहीं बैठे. उन्होंने उसके खिलाफ आवाज उठाई है. उसी तरह मिजोरम में चकमा समाज के लोगों के साथ भेदभाव किया जा रहा है तो समाज के लोगों को एक स्वर में विरोध के साथ सामने आना चाहिए.
देश की स्वतंत्रता की दुहाई हम लाख दे लें लेकिन आज भी इस तरह के साम्राज्यवादी सोच वाले मुख्यमंत्री हमारे देश में हैं. जो सार्वजनिक मंचों पर खड़े होकर इस तरह का विद्वेशपूर्ण भाषण दे सकते हैं. मिजोरम के मुख्यमंत्री का यह भाषण निन्दनीय है. दुख की बात यह है कि इस घटना को एक महीना गुजरने के बाद भी किसी केन्द्रिय स्तर के नेता ने इस बात को तवज्जों तक नहीं दिया. जबकि भारत के अंदर पूर्वोत्तर का क्षेत्र कितना संवेदनशील है यह किसी से छुपा नहीं है. लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों की बात जब भी दिल्ली में की जाती है लोगों के बीच कुछ इस तरह की प्रतिक्रिया होती है मानों किसी दूसरे देश की बात हो रही हो. यहां यह बात विश्वसनीय नहीं है कि इतनी बड़ी घटना की जानकारी देश के गृह मंत्रालय को नहीं होगी. लेकिन उनकी तरफ से इस घटना का संज्ञान लेकर कोई कार्यवाही की गई हो, इसकी जानकारी नहीं मिलती है. वैसे अब चकमा समाज की नई पीढ़ी अपने समाज के लोगों पर वर्षों से हो रहे भेदभाव के खिलाफ चुप रहने को तैयार नहीं है. वह सवाल उठाने लगी है. मिजोरम जो देश में पढ़े लिखे लोगों के राज्य तौर पर पहचाना जाता है, 2011 के गणना के अनुसार जहां शिक्षा 91.58 प्रतिशत है. देश का सबसे अधिक पढ़ा लिखा जिला सर्चिप (98.76 प्रतिशत) और दूसरा जिला आईजॉल (98.50 प्रतिशत) मिजोरम में ही हैं. उसके बावजूदर चकमा समाज के 72 प्रतिशत गांवों में कोई मध्य विद्यालय नहीं है और 96 प्रतिशत से भी अधिक ऐसे गांव हैं, जहां उच्च विद्यालय नहीं है.
मिजोरम सरकार में चकमा मंत्री निहार कान्ति चकमा अपने सरकार का बचाव करते हुए इस संबंध में सारा दोष चकमा समाज पर ही डाल देते हैं. मंत्री श्री चकमा के अनुसार हमारे चकमा समाज में शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है. जिसकी वजह हमारे समाज में जागरुकता की कमी और सुविधाओं का अभाव है. मंत्रीजी सरकार के बचाव मे चाहें जो कहें लेकिन सच्चाई यह है कि बेहद चालाकी के साथ मिजोरम में विकास की बयार चकमा समाज के लोगों के बीच पहुंचने ही नहीं दी गई. आज बेहद समझदारी के साथ उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों से दूर किया जा रहा है. दूसरी तरफ उनकी जमीनों पर भी अलग-अलग बहाने से कब्जा किया जा रहा है. चकमा समाज के लोग सरकारी नौकरी में प्रवेश ना पा सकें इसलिए मिजो भाषा को सरकारी नौकरियों के लिए अनिवार्य किया गया. जबकि चकमा उसी समाज के नागरिक हैं. उनके पास अपनी भाषा और लिपी है फिर उनपर एक और भाषा का बोझ अनिवार्य करना कितना उचित है? उदाहरण के तौर पर पिछले साल छह दिसम्बर को मिजोरम में प्राथमिक और मध्य विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाने वाले शिक्षकों की बहाली के लिए हुए परीक्षा में पचास फीसदी सवाल मिजो में पूछे गए. इसका अर्थ तो यही निकलता है कि मिजो छोड़कर दूसरे समाज के लोगों को परीक्षा से बाहर रखने का यह सरल रास्ता सरकार ने निकाला है. उन्हें जमीन से बेदखल करने के लिए भी सरकार के पास कई परियोजनाएं हैं. ममिट में डम्पा टाइगर रिजर्व के विस्तार में 227 चकमा परिवार प्रभावित हो रहे हैं.
गौरतलब है कि इस टाइगर रिजर्व में वर्तमान में कुल जमा छह शेर ही हैं. स्वास्थ सेवा की बात करें तो चकमा बहुल गांवों में उसकी हालत बेहद खराब है. लुंगलेई जिले में मलेरिया जैसे रोग की वजह से आधा दर्जन बच्चों की मौत हो जाने के बाद चिकित्सा सेवा वहां पहुंचती है. उस वक्त उस छोटे से गांव में लगभग पांच दर्जन लोग थे, जिन्हें स्वास्थ सेवाओं की जरुरत थी. चकमा समाज के लोग अब इस बात को जानना चाहते हैं कि क्या उन्हें लगातार सिर्फ अत्याचार के खिलाफ अहिंसा के साथ खड़े होने की सजा मिल रही है. मिजोरम में शांति व्यवस्था बनाए रखने की सजा मिल रही है. यदि नहीं तो उनके विकास के लिए मिजोरम सरकार के पास क्या योजनाएं हैं?

सरोकार.नेट से साभार
लेखक- आशीष कुमार अंशु

Sushant Meshram setting up 30 bed hospital Ambedkar Institute of Medical Science

As a child, whenever he fell ill, good healthcare would eludeSushant Meshram. "I couldn't receive good treatment as I was poor and a dalit," he says. Today, as a sleep physician in Nagpur, the 41-year-old does his bit to ensure those two attributes are not the basis for denial of treatment.
At the second floor of Neeti Gaurav Complex, near Ramdaspeth in Nagpur, a dozen kids are queued up to consult Meshram, whose board announces him as Central India's only certified sleep physician. When he was their age, though, he was working. At the tender age of 12, Meshram would pack small boxes in a plastics factory in Nagpur and earn Rs 5 per day. His family needed that money as his father was a worker in the ordnance factory and mother a maid.
Despite their poverty, Meshram and his siblings received a good education. Meshram went to a Kendriya Vidyalaya in Nagpur, where most of his classmates were from upper castes. But neither poverty nor the caste-based differences deterred him in his studies. Meshram always came first or second, and topped 90%; even in medical college, he was an accomplished student, and he went on to do a fellowship from the prestigious John Hopkins Medical University in the US. While studying medicine in Nagpur, he recalls incidents of discrimination from upper-caste teachers. He failed a semester in third year after a tiff with a professor. "We argued over a pathology slide project and I was later declared failed. I was not supposed to raise my voice."

CLINIC TO HOSPITAL
Those days of hardship led him to another decision, one that is now a business plan. Meshram is looking beyond his clinic, which is currently a Rs 10 lakh venture. He is setting up a 30-bed, multi-specialty hospital in Nagpur, for Rs 10 crore:Ambedkar Institute of Medical Science.
Spread over 7,000 sq ft, the hospital is expected to open in December. Four doctors, one of them being Meshram, are the primary stakeholders; plus, there are a few investors. The venture has secured bank loans of Rs 5 crore for the construction and equipment, and 10 doctors have signed up. Meshram wants to take this chain to Raipur, Mumbai, Pune and Aurangabad as well.
In order to be stay affordable to those who need it the most, the hospital will cross-subsidise services. Those who have the ability to pay will be charged extra, while the poor will either not pay or pay a minimal amount. "One engine pulls along various classes of bogies - be it general, sleeper or air-conditioned - to reach the same destination," says Meshram.
"Our hospital will serve all classes of people with equality." The stakeholder-doctors are also finalising plans for a medical college, and are talking to the government on land and policy issues.

Courtesy: ET

मिर्चपुर पर फैसले से दलित आशंकित

हरियाणा के बहुचर्चित मिर्चपुर प्रकरण में आगामी 20 अगस्त को फैसला सुनाया जाएगा. मामले की सुनवाई कर रही रोहिणी की विशेष अदालत 97 आरोपियों के बारे में अपना फैसला सुनाएगी. फैसले की घड़ी नजदीक आता देख बचाव पक्ष में छटपटाहट बढ़ गई है. वह इस पूरे मामले को जातिगत विवाद की बजाए सामुदायिक विवाद बताने में जुटा हैं. साथ ही कई और बातों को सामने रखकर मामले को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. तो इधर सवर्णों द्वारा जलाकर मार डाले गए मृतक ताराचंद की पत्नी कमला सहित तमाम पीड़ितों ने सुरक्षा की गुहार लगाई है.
कमला देवी अपने बेटे अमर लाल, रवींद्र व प्रदीप के साथ हिसार के एसपी से मिली और परिवार की सुरक्षा की मांग की. एसपी से की शिकायत में कमला ने कहा कि अदालत के फैसले को देखते हुए उनकी जान को खतरा बढ़ गया है. उन्होंने खुद को मिली सुरक्षा को और बढ़ाने की मांग की. इधर, 20 अगस्त को अदालत के निर्णय को देखते हुए मिर्चपुर के ग्रामीणों ने तंवर फार्महाउस में एक बैठक का आयोजन किया. इसमें आशंका जताई गई कि फैसले के बाद गांव में तनाव बढ़ सकता है. एक जाति विशेष को निशाना बनाया जा सकता है. इससे पहले भी इस प्रकार की कई घटनाएं हो चुकी हैं. गवाहों को भी निशाना बनाया जा सकता है. आशंका जताई गई कि हमलावरों को प्रदेश सरकार की मूक सहमति हासिल है. बैठक में यह निर्णय लिया गया कि 6 अगस्त से हिसार लोकसभा क्षेत्र के सभी गांवों का दौरा कर प्रदेश सरकार की दलित विरोधी नीति से लोगों को अवगत करवाया जाएगा.

ऊंचाई छूती सरोज की 'कल्पना'

बात इसी साल जनवरी महीने की है. दलित उद्यमियों द्वारा आयोजित एक पार्टी में काले सूट पहने उद्यमियों से घिरे चंद्रभान प्रसाद ने पूछा, ‘अगले साल कौन हेलीकॉप्टर खरीदने जा रहा है?’ भीड़ में से जिस शख़्स को आगे किया गया उसने अपना हाथ ऊपर उठा रखा था और वह एक काली चमकीली साड़ी पहने थी तथा उनके गले में रूबी और हीरा जडि़त एक भारी हार था. वह हाथ कल्पना सरोज का था. वहां मौजूद ज्यादातर लोग इस बात से सहमत थे कि कमानी ट्यूब्स की अध्यक्ष कल्पना सरोज वहां उपस्थित सबसे सफल उद्यमी हैं.
बाद में एक बातचीत में सुश्री सरोज ने बताया कि उनकी कुल संपत्ति पांच बिलियन रुपए (लगभग 112 मिलियन डॉलर) की है. दलित बिजनेस चैंबर और योजना आयोग के बीच सोमवार को होनेवाली बैठक के पहले यह सम्मेलन आयोजित किया गया था. वर्ण-व्यवस्था के सबसे निचले स्तर में आनेवाले समुदाय के लोगों ने कहा कि उदार आर्थिक नीति से उन्हें लाभ मिला है. उन्होंने कहा कि इसके जरिए भारत के समाजवादी युग तथा इसकी सरकारी नौकरियों की तुलना में उनकी प्रतिभाओं तथा योग्यताओं को कहीं अधिक अवसर प्राप्त हुए हैं. शायद सुश्री सरोज की तरह इस आंदोलन का कोई और प्रतीक नहीं हो सकता है. उनके पति समीर सरोज का कहना है कि ‘मुख्य बात यह जानने की है कि यह महिला नौवीं पास हैं और प्रतिदिन दो रुपए कमाया करती थीं.’ श्री समीर पहले निर्माण कार्यों के लिए बालू की आपूर्ति करनेवाली कंपनी चलाया करते थे, और अब वे अपनी पत्नी के लिए काम करते हैं.
सुश्री सरोज ने 1980 के दशक के मध्य में महाराष्ट्र के अकोला से मुंबई आने की एक उल्लेखनीय यात्रा का वर्णन किया. यह भारत द्वारा अपनी अर्थ-व्यवस्था को उदार बनाने के दौर से शायद पांच साल पहले की बात है. अकोला में, उनकी शादी 12 साल की उम्र में कर दी गयी और 14 साल की उम्र में उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा. उनकी शादी टिक नहीं पायी. उनके पिता के पुलिस अधिकारी के पद से निलंबन के बाद उन्हें किशोर वय में ही काम करना पड़ा. मुंबई में, दर्जी का काम करके वे रोजाना दो रुपए (लगभग .05 अमेरिकी सेंट) कमाया करती थीं. उनकी कमाई बढ़ने पर पर उन्होंने अपनी सुविधा के लिए सिलाई मशीन ले ली. बाद में, बैंक ऋण लेकर वे एक फर्नीचर की दूकान चलाने लगीं. जैसा कि भारत के नवधनिकों के साथ हुआ करता है, रियल एस्टेट ने उनके जीवन में एक बड़ा मौका प्रदान किया.
1997 में, उन्होंने शहर में एक जमीन खरीदी. जिद्दी किरायेदार तथा संभावित कानूनी समस्याओं के कारण यह संपत्ति उन्हें सस्ते में मिल गयी. सुश्री सरोज ने कहा, ‘मैं लोगों को जानती थी. मैंने सोचा कि मैं यह काम कर सकती हूं… मेरे अंदर ऐसी ताकत है.’ तब तक उन्हें मुंबई में एक दशक से अधिक समय हो चुका था. सुश्री सरोज ने कहा कि वे अपनी इमारत से संबंधित फाइलों का पीछा एक सरकारी दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक करती रहीं, जब तक कि किराये दार का मामला सलट न गया. उन्होंने अंतत: उस जमीन पर एक इमारत खड़ी की (उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े हीरे के नाम पर इसका नाम कोहिनूर प्लाजा रखा).
वे कहती हैं कि इस बीच उन्हें स्थानीय माफिया की ओर से धमकियां मिलने लगीं, जो संपत्ति के व्यवसाय में किसी बाहरी व्यक्ति के हस्तक्षेप से नाखुश थे. उन्होंने बताया कि इमारत का प्लान के पास हो जाने के बाद एक व्यक्ति ने आकर उन्हें चेतावनी दी कि उनके खात्मे के लिए 500,000 रूपए (11,363 डॉलर) की सुपारी दे दी गयी है और बेहतर है कि वे शहर छोड़ कर चली जाएं. सुश्री सरोज ने कहा कि उस व्यक्ति ने कहा कि, ‘तुम जहां से आयी हो, वहां जमीन पानी मांगती है, लेकिन यहां मुंबई में जमीन ख़ून मांगती हैं.’ वे पुलिस स्टेशन गयीं और उन्होंने इस धमकी की शिकायत दर्ज करायी. पुलिस ने गुंडे को गिरफ्तार कर लिया. उस गुंडे का नाम उन्होंने उस व्यक्ति से जान लिया था जिसने उन्हें उक्त ‘सुपारी’ के बारे में बताया था. उन्होंने कहा, ‘बाद में मामला सुलझ गया.’ 2000 में उन्होंने कोहिनूर प्लाजा बेच दिया और उससे प्राप्त रकम को दूसरे भूमि सौदे में लगा दिया. सुश्री सरोज ने कहा कि इससे उनकी छवि ऐसी महिला की बन गयी जो मुंबई में जटिल समस्याओं को सुलझाने में लोगों की मदद कर सकती है.
2006 में, धातु का ट्यूब बनानेवाली कंपनी कमानी ट्यूब की कमान संभाली (वे पहले इसके बोर्ड में शामिल थीं), जिस पर 1.1 बिलियन रुपए का कर्ज था और जो दिवालिया होने के कगार पर थी. वे कहती हैं कि उन्हें उम्मीद है कि अगले साल तक यह कारखाना सारे कर्ज चुका देगा. उनकी एक चीनी मिल भी है. सुश्री सरोज अपनी सफलता के लिए अपनी धुन को श्रेय देती हैं. वे कहती हैं कि एक बार जब उन्होंने कोई काम करने की ठान लिया तो वे उसे पूरा नहीं कर सकतीं, यह बात मानने को वे तैयार नहीं हैं. उन्होंने कहा, ‘बहुत सारे रास्ते हैं, अगर कोई एक रास्ता काम न आएं तो मैं दूसरा रास्ता तलाशती हूं. अगर उससे भी बात न बने तो मै उसके अन्य विकल्प के बारे में सोचती हूं.’ वे फिलहाल बैलार्ड एस्टेट पर काम कर रही हैं, जिसके आसपास के दफ़्तरों में भारत के सबसे धनी व्यक्ति मुकेश अंबानी का रिलायंस हाउस भी है.
इस बीच उन्होंने अपने छोटे भाई और बहन की शादी के खर्च भी उठाये और दोनों को एक-एक अपार्टमेंट उपहार में दिया. अपनी बेटी को होटल प्रबंधन की पढ़ाई के लिए लंदन और अपने बेटे को पायलट के प्रशिक्षण के लिए जर्मनी भेजा. जहां तक हेलीकॉप्टर का सवाल है, सुश्री सरोज का कहना है कि वे इस साल एक हेलीकॉप्टर और एक विमान खरीदना चाहती हैं, लेकिन अपने निजी इस्तेमाल के लिए नहीं (वे कहती हैं, कम से कम शुरूआत में नहीं). अपने बेटे के विदेश में जाकर प्रशिक्षण लेने के तथ्य का जिक्र करते हुए वे कहती हैं कि वे जिस जिले में पली-बढ़ी हैं, वहां दलित मसीहा डॉ बी. आर. अंबेडकर के नाम के हवाईअड्डे में अरबों डॉलर के उड्डयन हब बानये जाने की योजना है, वहीं एक पायलट प्रशिक्षण स्कूल खोलना चाहती हैं.
साभारः इंडिया रियल टाइम

Monday, August 8, 2011

'जय भीम' बोलना बंद करें दलित- अनिल चमडिया

बिहार के एक मरवाड़ी परिवार में जन्में अनिल चमडिया के पिता चाहते थे कि उनका बेटा चार्टेड अकाउंटेंट बने. लेकिन चमडिया की किस्मत चुपचाप उनके लिए एक अलग राह तैयार कर रही थी. गैरबराबरी से लड़ाई की राह. समय का चक्र घूमता गया और चमडिया ने एक दिन खुद को इस राह पर खड़ा पाया. सन 1991, जुलाई की बात है, जब ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’, पटना ने उनके बारे में एक आर्टिकल लिखा. शीर्षक था ‘No Armchair Journalist’.
दो दशक बाद भी इस स्थिति में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है. आज भी वह आपको दिल्ली और देश के कई हिस्सों में उसी शिद्दत से अपनी बात कहते मिल जाएंगे. दलित न होते हुए भी जिन कुछ खास लोगों ने दलित हित की आवाज को मजबूती से उठाया है, अनिल चमडिया उनमें प्रमुख हैं. तकरीबन तीन दशक पहले उन्होंने लेखन और एक्टिविज्म के जरिए गैरबराबरी का जो विरोध शुरू किया था. वह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. इस लड़ाई में अतिसक्रियता के कारण उन्हें कई बार विरोध का भी सामना करना पड़ा. समाज का एक तबका उनपर स्वार्थवश दलित राग अलापने का आरोप तक लगाता है. लेकिन चमडिया इन सबसे बेपरवाह, बिना विचलित हुए अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं. वर्तमान समय में दलित आंदोलन, राजनीतिक व्यवस्था, राजनीति में दलितों की स्थिति और अंबेडकर सहित तमाम मुद्दों पर दलितमत.कॉम के आपके मित्र अशोक दास ने उनसे बातचीत की. www.dalitmat.com से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

आपका जन्म कहां हुआ, किस परिवार में, शिक्षा-दीक्षा कहां हुई?
- बिहार में सासाराम एक शहर है, मेरा जन्म वहां हुआ. जन्म का साल 1962 है और तिथि शायद 27 अक्तूबर है. ‘शायद’ इसलिए क्योंकि मेरे जन्म का कोई ऐसा लिखित प्रमाण नहीं है. मेरा परिवार एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार था. हालांकि अब स्थिति अच्छी हो गई है. मेरी पढ़ाई-लिखाई थोड़ी डिस्टर्ब रही. गुरुद्वारा का एक स्कूल था, हम वहीं पर जाते थे. भारती मंदिर स्कूल का नाम था. सातवी तक हम यहीं पढ़े. मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं शहर से बाहर जाकर पढ़ूं लेकिन उसी समय उनको दिल का दौरा पड़ गया. उस जमाने में यह बहुत बड़ी बीमारी थी. घर में सबसे बड़े हम ही थे, तो शहर जाना नहीं हो पाया. मेरी हाई स्कूलींग जो है, वो नहीं हो पाई. आठवीं की परीक्षा प्राइवेट दी. नौवीं में जरूर एक साल के लिए पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की. फिर मैनें बोर्ड की परीक्षा (तब ग्यारवीं में होती थी) दी. हालांकि हम अपने शहर में बहुत अधिक दिनों तक नहीं रहे. शुरू से ही विषय कार्मस था. 82 में ग्रेजुएशन पास करने के तुरंत बाद मेरा लिखना शुरू हो गया था. आपको पता होगा, तब बिहार में आरक्षण को लेकर काफी लड़ाई चल रही थी. तब हम कॉलेज में थे. हमने उसमें भागीदारी की. उसे लीड किया. हालांकि 74 के आंदोलन में भी हिस्सा लिया था. उम्र छोटी थी लेकिन मुझे याद है हमलोग स्टेशन पर चले आए थे, गाड़ियां रोकी थी. उसी समय एक राजनीतिक रुझान बनना शुरू हो गया था. लेकिन 82 के बाद हम शहर में नहीं रह पाएं. फिर पटना चले आएं. यहां कुछ दिनों तक सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़े रहे, फिर समाज में बुनियादी परिवर्तन की राजनीति से जुड़े रहे. तो ये सब काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा. लेकिन लेखन और एक्टिविज्म ये शुरू से साथ-साथ चलता रहा.

अपने नाम के साथ ‘चमडिया’ कब जोड़ा, इसकी क्या वजह थी?
- जोड़ा नहीं, चमडिया तो हमारे परिवार में लोग लगाते हैं. इसकी क्या वजह थी हमें नहीं मालूम. यहां हम एक बात कोट कर सकते हैं, ‘प्रभाष जोशी एक संपादक थे जनसत्ता के, काफी मशहूर. उन्होंने एक बार हमारे एक दोस्त हैं शेखर जो कि अभी पटना में हैं और काफी अच्छे कहानीकार माने जाते हैं. तो राजेंद्र भवन में एक कार्यक्रम चल रहा था. शायद किसी किताब का विमोचन था. प्रभाष जोशी भी आए थे. उन्होंने हमारे दोस्त से पूछा कि आप जानते हैं कि आपके मित्र अनिल चमडिया,‘चमडिया’क्यों लगाते हैं? हमारे दोस्त ने कहा कि मुझे कभी पूछने की जरूरत महसूस नहीं हुई. तब प्रभाष जोशी ने हमारे दोस्त को बताया कि इनके जो पूर्वज थे वो चमड़े का कारोबार करते थे. इसकी वजह से ये लोग अपनी टाइटिल चमड़िया लगाते हैं. ’वो खुद को राजस्थान का मानते थे और हालांकि मैं जानता नहीं लेकिन मेरा परिवार भी शायद वहां से आया होगा. क्योंकि एक बार मैं इंटरनेट पर सर्च कर रहा था कि चमड़िया टाइटिल कहां-कहां कौन लिखता है. तो कुछ क्रिश्चियन नाम जैसा देखा, पाकिस्तान के कुछ मुस्लिम नाम जैसा देखा, गुजरात में देखा. तो कई तरह के और जगह के लोग इस टाइटिल का इस्तेमाल करते थे.

यानि यह टाइटिल आपके साथ शुरू से रहा?
- हां, शुरू से रहा. इसके चलते हमें परेशानियां भी होती थी. क्योंकि जिस शहर में हमलोग थे वो बहुत छोटा शहर था. हमारे कॉलेज में भी लोग हमको बड़ी अजीब तरीके से पुकारते थे. चमड़ी-चमड़ी ही कहते थे, चमड़िया कोई नहीं कहता था. बहरहाल हमने कभी इसके जड़ में जाने की जरूरत इसलिए महसूस नहीं की क्योंकि टाइटिल स्थाई नहीं होते हैं. टाइटिल बदलते रहते हैं. जैसे हमारे ही परिवार में अब एक फर्क आ गया. मेरे भाई ड़ लिखते हैं, हम ड लिखते हैं. तो इसमे मैं कभी डीप में नहीं गया कि क्या कारण हैं. मैं केवल इतना जानता हूं कि इस परिवार में पैदा हुआ हूं, यह टाइटिल मिला है और इसे लेकर चलना है.

आपके दलितवादी होने की वजह क्या थी. आप खुद को कब से दलितवादी मानने लगे?
- समाज में दलित क्या हैं? वह उत्पीड़न के शिकार हैं, गैरबराबरी के शिकार हैं और इसका कोई वैज्ञानिक कारण नहीं है. कोई तर्क नहीं है कि ऐसा क्यों? तो एक तरह से यह एक अन्याय का स्वरूप है. मैं यह मानता हूं कि बुनियादी तौर पर मनुष्य अन्याय विरोधी होता है. जब भी वो असमानता और गैरबराबरी देखता है तो उसकी मनोवस्था विचलित होती है. वह परेशान होता है. व्यवस्था विरोधी उसकी चेतना होती है. होता यह है कि आपके भीतर वो जो चेतना होती है, उसे विस्फोट करने का मौका मिल जाता है. अब पता नहीं यह संयोग रहा या फिर क्या था कि बचपन से ही हमारे भीतर भी यह चेतना थी. स्कूलों में भी मेरी लड़ाई कई स्तरों पर होती थी. तो आपका जो यह प्रश्न है कि दलितवादी मैं कब से हुआ तो मैं इसकी कोई तिथि नहीं बता सकता. कोई फेज नहीं बता सकता. और मैं यह समझता हूं कि कोई भी व्यक्ति जो चेतना संपन्न है और वह यह क्लेम करता है कि मैं दलितवादी हूं तो वह शुरुआती दिनों से ही जबसे वह होश संभालता है, उसके अंदर वह चेतना होती है. अगर वह चेतना नहीं होगी तो अचानक कोई दलितवादी नहीं हो जाएगा. हां, अगर कोई अपने को इंपोज करना चाहे कि आज अवसर है और हमें इसका फायदा उठाना है. इसके लिए हमें खुद को दलितवादी बनाना है तो हो सकता है. लेकिन वास्तव में जो छटपटाहट होती है, वह अचानक नहीं होती.

यानि ऐसे लोग भी हैं, जो मौका देखकर दलितवादी बन गए.
- अब देखिए, हमारे समाज में अवसरवादिता तो हैं ही. हम आपको बता सकते हैं कि जो ये अपने को कम्यूनिस्ट और वामपंथी कहते हैं इसका बड़ा हिस्सा (जोड़ देकर) अवसरवादी है. क्योंकि मैने देखा है अपने कई मित्रों को की उन्हें लेक्चररशिप चाहिए होती है तो वह‘लाल सलाम’कहने लगते हैं और उस आयडोलॉजी में नौकरी है. हमने कई ऐसे वकीलों को देखा कि जब उन्हें प्रैक्टिस शुरू करनी है और केस चाहिए तो उन्होंने‘लाल सलाम’कहना और कामरेड कहना शुरु कर दिया. लेकिन वास्तव में उनका जो चरित्र था वो अवसरवादिता का था. तो मैं यह मानता हूं कि दलित के संदर्भ में यह जो उभार आया है, खासतौर से 90 के बाद से आपको बहुत सारे लोग यह कहने वाले मिल जाएंगे कि मैं दलितवादी हूं, समाजिक न्याय का पक्षधर हूं. लेकिन मैं सवाल ये करता हूं कि जो लोग आज अपने आप को ऐसा कहते हैं, उनका इतिहास उठाकर देखा जाए कि वो 78 में क्या थे? और 78 से पहले उनकी क्या भूमिका थी? इसको देखने की जरूरत है. तब जाकर सही आकलन हो पाएगा कि बुनियादी रूप से यह आदमी क्या है.
(कुछ नाम बताएंगे आप, मैं बीच में टोकता हूं)
नहीं, नाम नहीं बताऊंगा मैं क्योंकि यह उनको सर्टिफिकेट देने जैसा मामला है. इसको एक ट्रेंड के रूप में देखना चाहिए. इसलिए आप देखिए कि आज बहुत सारे लोग जो वामपंथी हैं.खुद को वामपंथी कहने से बचते हैं. वामपंथ को गाली देते हुए मिलते हैं. क्योंकि उनका एक अवसर था. उसमें उन्होंने लाभ उठा लिया. जहां तक खुद को दलितवादी होने का दावा है तो ऐसे इलाकों में जाकर कहिए जहां अब भी काफी चुनौतियां हैं. वहां जाकर कहिए कि मैं दलितवदी हूं. अगर दलितवादी होने की कसौटी हम यह बनाएं कि इसके चलते आप क्या खोते हैं, तो इसका दावा करने वाले लोगों ने खोया नहीं है बल्कि पाया ही है. जैसे कई सारे लोग कहते हैं कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं. तो अगर खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने से हमें लाभ मिल रहा है. तो आपको उस लाभ को उठाने में क्या है.

जैसा आपने अवसरवादी दलितवादी और वामपंथ के बारे में कहा. तो आप पर भी यही आरोप लगता है. समाज का एक तबका है जो यह कहता है कि अनिल चमडिया दलित नहीं हैं. और स्वार्थवश दलितवादी बनते हैं. इन आरोपों के बारे में क्या कहेंगे?
- जो सवाल खड़ा करता है, उसे करने दीजिए. देखिए मेरा कोई लाभ नहीं है. कोई हित नहीं है. पहली बात कि अगर कोई आरोप लगाता है तो मुझे इसकी कोई चिंता नहीं है. मान लिजिए मेरा पूरा जीवन है और आप ही बताइए कि मैने कभी यह कह कर लाभ उठाया है कि मैं दलितवादी हूं, मुझे लाभ दो. कहीं कोई पद हासिल किया है. कोई पैसा लिया है. कोई एक उदाहरण बताए हमको. मैं तो कह रहा हूं कि मेरा अपना कोई इंट्रेस्ट नहीं है. जो स्वार्थी किस्म के लोग होंगे, अवसरवादी किस्म के लोग होंगे जो दलित-दलित कर के अपना हित पूरा करना चाहते होंगे. वो भइया मुझे कठघरे में खड़ा करें. बात साफ है. क्योंकि उनके पास वही कार्ड है. उसी के साथ वो खेलेंगे. जैसे आपने पूछा कि मैं दलितवादी हूं तो मैने कहा कि हूं. मैं दलितों के हितों की बात करता हूं. उनके हितों की लड़ाई लड़ता हूं. लेकिन हम इसका कोई प्रोजेक्ट नहीं बनातें. यह मेरे प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं है कि मैं दलितवादी हूं और मुझे कोई प्रोजेक्ट मिल जाए. कहीं विज्ञापन मिल जाए. ये मेरा काम नहीं है. हमारे भीतर ये बात है. हमारे भीतर एक छटपटाहट है, एक बेचैनी है तो हम इसे व्यक्त करते हैं. अब किसी दूसरे को परेशानी होती है तो हो, उसकी मुझे चिंता नहीं है. और ऐसे बहुत सारे लोग हैं. गैरदलितों में भी बहुत सारे लोग परेशान होते हैं. चिंता करते हैं. यह एक लड़ाई है. लड़ाई है कि हम सवाल खड़े करेंगे तो आप मुझे कठघरे में खड़ा करेंगे. क्योंकि आपके पास सवालों का जवाब नहीं है. न आपके पास सवाल हैं. तो आप मुझे दूसरे तरह से कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करेंगे. मैं किसी के बारे में नहीं कहता. मैं कहता हूं कि सबकी अपनी-अपनी भूमिका है. सभी अपना-अपना काम कर रहे हैं. लेकिन बहुत सारे लोग जिन पर जब सवाल खड़े होने लगेंगे तो आप पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाने लगेंगे. क्योंकि वह वैचारिक रूप से खोखले इंसान हैं. उनके पास विचार नहीं है. उनके पास एक लंबी योजना नहीं है समाज को बदलने की.
आप मान लिजिए की अनिल चमड़िया दलितवादी नहीं है, दलित नहीं है. कुछ नहीं है. आप कीजिए ना काम, आपको कौन कुछ कह रहा है. अनिल चमड़िया कहां आपको डिस्टर्ब करने आ रहे हैं. अनिल चमड़िया ने आपको कभी डिस्टर्ब किया हो, सीधे कोई सवाल उठाया हो कि आपको इतने लाख की परियोजना मिल गई. आपने इतना कमा लिया. ये तो हम कभी कहने नहीं जाते थे. तो लोगों के कहने की मैं चिंता नहीं करता.

तमाम पार्टियां दलित हित का दम भरती हैं. आजादी के बाद तमाम पार्टियां सत्ता में आई, लेकिन दलितों की स्थिति सुधारने के लिए किसी ने मिशन की तरह काम नहीं किया. चाहे वो कांग्रेस हो, भाजपा या फिर वामपंथ.
- देखिए दो तरह के ट्रेंड रहे हैं. अगर आप शुरुआती दिनों में देखें तो एक बाबा साहब रहे तो दूसरे बाबूजी (जगजीवन राम). दो धारा रहे. एक धारा जो है वो कहता है कि आप अपने
मंदिर खोलो, अपने यहां ब्राह्मण पैदा करो. एक धारा जो है वह कहता है कि ब्रह्मणवाद खत्म करो. तो दो तरह की धाराएं हमें दलित राजनीति में देखने को मिलती हैं. अब सवाल यह उठता है कि जो राजनीतिक पार्टियां हैं, वो क्या कहती हैं? उनके शब्द और भाव क्या हैं? उनका शब्द और भाव यह होता है कि आप दलितों का कल्याण करिए. दलितों को थोड़ा ऊपर उठाने का भाव होता है. दलित नेतृत्व करे, यह भाव किसी का नहीं होता है. वह भाव जब भी पैदा हुआ, वह कांशीराम में ही पैदा हुआ. वह मायावती ने ही पैदा किया. तो इन दोनों भावों को समझने की जरूरत है. दलितों की स्थिति क्यों ज्यों की त्यों बनी हुई है, अगर उन कारणों को समझें तो इन भावों को समझ सकते हैं. तो यह तो हर राजनीतिक पार्टियां कहती हैं कि दलितों का कल्याण हो. लेकिन जो राजनीतिक नेतृत्व है, समाज में बैठे हुए जो लोग हैं. उनकी मानसिकता अगर दलित विरोधी और पिछड़ा विरोधी है तो यह कैसे हो पाएगा. यह कभी संभव नहीं होगा.

आप खुद को वामपंथी विचारधारा का मानते हैं?
- मैने कहा न कि कई उतार-चढ़ाव रहे जीवन में. और मैं यह समझता हूं कि भारतीय समाज में जिस तरह के अन्याय की स्थिति है उसमें यदि आप किसी को वामपंथी कह देते हैं तो आप उसकी लड़ाई की एक दिशा की ओर इंगित कर देते हैं. वामपंथी मतलब आप आर्थिक गैरबराबरी को खत्म करने पर जोड़ देते हैं. आप समाजिक गैरबराबरी को इग्नोर करते हैं. मेरा यह कहना है कि भारतीय समाज में वो वामपंथ नहीं हो सकता, जो दुनिया के अन्य देशों में है. यह अलग है भी. आप जब क्यूबा में जाएंगे यह आपको अलग मिलेगा, नेपाल में अलग मिलेगा, सोवियत संघ में अलग था, चाइना में अलग मिलेगा. मार्क्सवाद कहीं से यह नहीं कहता है कि समाजिक स्तर पर गैरबराबरी की जो स्थितियां हैं, उसे सेकेंड्री मानें. तो जहां तक मेरी बात है, वामपंथ को जिस तरीके से परिभाषित किया जाता है, उस रूप में मैं वामपंथी नहीं हूं. हां, लेकिन मैं यह मानता हूं कि समाज में गैरबराबरी की लड़ाई का जो आधुनिकतम राजनीतिक दर्शन सामने आया है वह वामपंथ में है.

आपने अभी जो कहा उसमें एक द्वंद सा नहीं है कि आप खुद को वामपंथी तो मानते हैं लेकिन एक खास रूप में नहीं मानते. इसका मतलब क्या है?
- मैने तो आपसे कहा कि दुनिया के तमाम देशों में जो वामपंथी हैं, वह देश की सामाजिक-आर्थिक स्थित के अनुरुप मार्क्सवाद को ढ़ालने का काम करते हैं. तो मैने कहा कि अगर हमारे यहां वामपंथ की ये परिभाषा है कि वामपंथी होने का मतलब केवल आर्थिक गैरबराबरी की लड़ाई लड़ने वाला राजनीतिक कार्यकर्ता है, तो उस अर्थ में हम वामपंथी नहीं है. उसके साथ ही मैं यह भी कह रहा हूं कि गैरबराबरी की लड़ाई लड़ने का जो आधुनिकतम राजनीतिक दर्शन है वह मार्क्सवाद में है. आप मार्क्सवाद की अवहेलना नहीं कर सकते. आप देखेंगे कि हमारे देश में दलित और पिछड़े समाज के जो नेता निकले, जो लड़ाई लड़ी. उनके जो शब्दकोष हैं वह मार्क्सवाद से निकले हैं. लालू यादव कहते हैं कि लांग मार्च करेंगे. और आप अगर उस समय के आंदोलन के भीतर जाकर देखिएगा तो आपको मार्क्सवाद की छाप मिलेगी. क्योंकि जो बुनियादी दर्शन है गैरबराबरी के खिलाफ, इसके खिलाफ जहां भी लड़ाई होगी इसमें उसकी छाप मिलेगी.

वामपंथ के मुताबिक दलित समस्या का समाधान क्या है. वामपंथी दलों ने दलितों के हित के लिए अब तक क्या किया है?
- महाराष्ट्र के इलाके को छोड़कर देश के दूसरे हिस्सों में दलितों के हितों की राजनीतिक चेतना का विकास जितना वामपंथी दलों ने किया है, उतना दूसरे लोगों ने नहीं किया है. हमको ये फर्क करना पड़ेगा कि लड़ाई का जो आपका उद्देश्य है वो क्या है? वामपंथी जो यहां लड़ाई लड़ते रहे हैं वो बुनियादी परिवर्तन की लड़ाई लड़ते रहे हैं. उनमें जो उनके साथ सबसेज्यादा लड़ने वाले लोग रहे हैं वो दलित रहे हैं. क्योंकि उनमें मुक्ति की आकांक्षा थी. केवल सरकार बनाने की लड़ाई नहीं लड़ते रहे हैं इसलिए उस तरह की लड़ाई में आपको फर्क यह दिखाई देगा कि वहां राजनीतिक कार्यकर्ता तो निकले लेकिन सत्ता में नहीं पहुंचे. उन्होंने जमीनी स्तर पर भेदभाव की लड़ाई लड़ी. मेरे कई मित्र बताते हैं जैसे भोजपुर के इलाके में दलित खाट पर नहीं बैठ सकते थे. उनके लिए कम्यूनिस्ट पार्टी के लोग लड़े. लेकिन उन्होंने उन्हें सत्ता में जगह नहीं दी. तो लड़ाई को इतने सपाट तरीके से नहीं देख सकते. क्योंकि वो हर स्तर पर उत्पीड़न का शिकार है. तो जाहिर सी बात है कि आप एक स्तर पर आगे बढ़ाने की बात करते हैं तो दूसरे स्तर पर रह जाता है. जैसे आज उत्तर प्रदेश में मायावती सत्ता में हैं लेकिन क्या वहां दलितों के साथ भेदभाव की स्थिति नहीं है. लेकिन हम फिर भी इसे भी प्रोत्साहित करते हैं. हम मानते हैं कि दलित नेतृत्व होना चाहिए. लेकिन फिर भी मानते हैं कि भेदभाव की स्थिति बनी हुई है. यही बात कम्यूनिस्ट पार्टियों में भी है. यहां भी दो तरह की धारा देखने को मिल रही है. एक राजनीतिक रूप से चेतना संपन्न है. दूसरी तरफ आप उनकी शिकायत कर सकते हैं कि उन्होंने आपको नेतृत्व में आने का मौका नहीं दिया. बाबा साहब के आंदोलन से लेकर वामपंथ और कांशी राम जी के आंदोलन तक सारे आंदोलनों की अपनी एक बड़ी भूमिका रही है. और आप हर आंदोलन पर सवाल उठा सकते हैं. तो आपको अगर राजनीतिक लाभ उठाना है तब तो यह अलग बात है. लेकिन समाज का एक बौद्धिक सदस्य होने के नाते जो लोग उन्हें इस स्थिति से निकालने के बारे में सोचते हैं वो ऐसा नहीं सोचते कि उन्होंने ऐसा किया, ऐसा नहीं किया.

दलितों के समाज में आगे आने के बाद जातीय उत्पीड़न का रूप भी बदला है. अब यह प्रत्यक्ष न होकर इसने दूसरा रूप ले लिया है? इसकी वजह क्या है?
- वो आएगी ही. देखिए एक बात जान लिजिए. जब ढ़ांचागत परिवर्तन होगा तो उत्पीड़न का रूप भी बदलेगा. जैसे ढ़ांचागत परिवर्तन यह हुआ है कि अब आपको स्कूल में पढ़ने को मिल रहा है. तो अब उत्पीड़न का तरीका बदलेगा. पहले उत्पीड़न का तरीका यह था कि आपको स्कूल में नहीं आना है. अब जब उन्होंने आपको अंदर आने दे दिया तो उनके मन में जो यह बात फिट है कि आप छोटे हैं तो वह स्कूल के भीतर किसी न किसी रूप में तो काम करेगा ही. वह खत्म नहीं होगा. बस उसका रूप सूक्ष्म हो जाएगा. आपसे बात करते हुए मैं एक महत्वपूर्ण बात करने जा रहा हूं.
मैं इधर दलित समाज द्वारा आयोजित कई कार्यक्रमों में गया. मैं वहां यह बात बार-बार कह रहा हूं कि आप‘जय भीम’बोलना बंद करिए. जय भीम क्यों बोलते हैं? आप इसका अर्थ बताइए. यह कहां से निकला?‘जय’का पूरा एक ढ़ांचा है. आप कहते हो कि हम‘भीम’को जय कर रहे हैं. यानि भीम की जय कर के आप उन्हें एक ढ़ांचे में जगह दिलाने की कोशिश कर रहे हैं. मैं कहता हूं कि आप जय भीम नहीं कहें. आपके समाज की जो अवस्था है, उसमें अभी जय की जरूरत नहीं है. उसमें अभी जागो कि जरूरत है. हम‘जय भीम-जागो भीम’क्यों नहीं बोल सकते. क्योंकि यह हमारा माइंडसेट बना हुआ है. एक बोलता है जय श्रीराम, हम बोलते है जय भीम. तो आप पूरे स्ट्रक्चर को सुरक्षित रखते हैं. आप केवल नाम को ले जाकर के वहां फिट कर देते हैं. ढ़ांचा वही रहता है. तो जय के ढ़ांचे को तोड़ने की जरूरत है. अभी इस समाज को जय की जरूरत नहीं है. जय, विजय, पराजय गैर-बराबरी के समाज का संबोधन है. हम तो अन्याय से पीड़ित है. हमारे समाज में बड़ा हिस्सा अभी भी उसी अवस्था में है. उसे जगाने की जरूरत है. दलित का हर बच्चा भीम है, उसमें यह भाव कैसे पैदा करें. तो उसे हम बोलें कि जागो भीम दूसरा बोले की बोले कि बोलो भीम. ये समाज के पूरे ढ़ांचे को चेंज करेगा. अभी हमारी जो लड़ाई की दिशा है वो ठीक दिशा नहीं है. वो ढ़ांचे को तोड़ने की दिशा नहीं है. वह इसमें अकोमडेट (accommodate) करने की दिशा है.

'जय भीम' दलितों के लिए एक मंत्र बन गया है. आप जो यह कह रहे हैं कि दलित जय भीम बोलना बंद करें तो क्या वो इस स्थिति को स्वीकार करेंगे?
- देखिए मैं तो कह रहा हूं कि इस पर विचार करें. जय भीम क्यों बोलते हैं, यहां से सोचना शुरू करें. हमारा हाल यह है कि हम इतने ज्यादा उत्पीड़न की स्थिति में रहे हैं कि जरा सा भी सुख देने वाला कोई भी विकल्प हम अपना लेते हैं. तो जय भीम क्यों बोला जाता है. आप इसके विस्तार का काल देखिए. तो मैं आपके उस सवाल का जवाब दे रहा था कि आप कह रहे हैं कि स्ट्रक्चर चेंज नहीं करेंगे तो आपकी स्थिति में ज्यादा परिवर्तन होने नहीं जा रहा है. साफ सी बात है. हां, क्षणिक सुख मिलेगा. लेकिन ये जो लड़ाई है वो क्षणिक लड़ाई नहीं है. आप पर जो गैरबराबरी थोपी गई है वो क्षणिक नहीं है. वह एक योजना का हिस्सा है. और वो वर्षों पुरानी, बहुत दूरदर्शी किसी शासक द्वारा रची है. तो मैं मानता हूं कि अगर आपको गैरबराबरी को खत्म करना है तो आपको तात्कालिक सुख, संतोष की लड़ाई से निकलना होगा.

आप मीडिया से लगातार जुड़े रहे हैं. मीडिया में दलितों को लेकर जो एक भेदभाव है. उसे आप कैसे देखते हैं?
- मैं आपसे पहले भी कह चुका हूं कि यह पूरा मामला स्ट्रक्चर का है. बहुत सारे लोग कहते हैं कि दलित मीडिया खड़ा हो. लेकिन ये हो नहीं पाया है. (मैं बीच में टोकता हूं)

तो क्या दलित मीडिया खड़ा होना चाहिए. आप इसके पक्ष में हैं?या फिर इसी सिस्टम में दलितों को जगह मिलनी चाहिए?
मैं इतने सपाट तरीके से चीजों को देखता नहीं हूं. मान लिजिए की अगर दलित मीडिया है तो वो फिर दलित मीडिया हो गया. हम कह रहे हैं कि एक मीडिया ऐसा हो जो समाज की गैरबराबरी को दिखाए. दलित मीडिया का क्या मतलब हुआ, केवल दलितों की बात करने वाला. तो मान लिजिए की ऐसा कोई मीडिया खड़ा हो भी गया तो मुझे नहीं लगता कि वो ज्यादा कामयाब होगा. हां, दलित समाज के भीतर एक-दूसरे तक पहुंचने के लिए आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन पूरे समाज को एडजस्ट करने के लिए वो काम नहीं करेगा. तो मैं ये मानता हूं कि केवल दलित मीडिया से काम नहीं चलेगा. क्योंकि पूरे समाज को संबोधित करने के लिए, उसकी वस्तुस्थिति जाहिर करने के लिए उसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
जैसे यूपी में इन दिनों एक भाषा इस्तेमाल की जा रही है. दलित मुख्यमंत्री के राज में दलितों के खिलाफ उत्पीड़न. आप इसकी बारीकी को समझिए कि कैसे वो दलित के उत्पीड़न के लिए दलित को ही कठघरे में खड़ा कर रहा है. आप इसको सोचिए. मायावती दलित नहीं भी हैं और हैं भी. वह सरकार की मुख्यमंत्री हैं. प्रदेश चला रही हैं तो वो पूरे समाज की हैं. लेकिन आप उनको संबोधित कर रहे हैं केवल दलित. और खासतौर पर वहां कर रहे हैं जहां दलित उत्पीड़न की शिकायत है. तो आप क्या कर रहे हैं कि आप वहां सरकार को बचा रहे हैं. सरकार के ढ़ांचे को बचा रहे हैं और दलित को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. यानि की उनका दलित होना इस विफलता का परिचायक है. बहुत सूक्ष्म तरीके से ऐसी सांस्कृतिक लड़ाई होती है. बड़ी बारीक लड़ाई है. और अगर हम इस बारीकी को समझने की समझ विकसित नहीं कर पाते हैं तो हम क्या करते हैं कि जो भी चीजें (नारा) आती हैं, हम उसमें बह जाते हैं. तो मुझे लगता है कि हमें उस बहने वाली स्थिति से निकलना होगा.

मीडिया में तमाम बड़े नाम हुए हैं. जैसे प्रभाष जोशी, उदयन शर्मा, एसपी सिंह. उन्हें काफी अच्छा माना जाता है. उनके जमाने में क्या दलित मुद्दों को जगह मिल पाती थी. उन्होंने इस ओर ध्यान दिया था.
- नहीं, कोई ध्यान नहीं दिया था. इन लोगों का कभी भी इससे कंसर्न विषय नहीं रहा. मैं मानता हूं कि भारतीय मीडिया में अभी तक कोई भी ऐसा मीडिया लीडर नहीं निकला है जो इस सवाल को बहुत गंभीरता से लेता हो. मीडिया मे दलितों के खिलाफ खबरों के आने का जो ट्रेंड है, वो जो शुरू में था वही अब है. दलितों के बारे में जो खबर आती है वो तब आती है जब दलित उत्पीड़न की बड़ी घटना हो जाती है. वह इसलिए आती है क्योंकि आप उसे इग्नोर नहीं कर सकते हैं. मैं नहीं समझता हूं कि किसी ने बहुत सचेत होकर कोई कोशिश की है कि मीडिया में जो दलितों के खिलाफ या तमाम तरह की गैरबराबरी के खिलाफ खबरों को ज्यादा से ज्यादा जगह मिल पाए. और इस गैरबराबरी से निकलने की अवस्था बने. ऐसा भी नहीं है कि दलित समाज के जिन बच्चों की पत्रकारिता में रुचि है और जो इसमें आना चाहते हों, इनलोगों ने उनकी मदद की हो.

संविधान में हमें आरक्षण का लाभ मिला है लेकिन कई जगहों पर यह नहीं दिया जाता. जैसे आपने ही एक आरटीआई डाली थी, जिसमें निकल कर आया था कि लोकसभा चैनल में दलित नहीं हैं. जबकि वो भी सरकारी चैनल है. क्या यह संविधान का उल्लंघन नहीं है?
- बिल्कुल है. जब से यह चैनल शुरू हुआ उसके पहले ही यह नियम बन गया कि हम कन्सलटेंट के रूप मे किसी को भी भर्ती कर सकते हैं. उसमें आरक्षण का कोई लेना-देना नहीं है. अब उन्होंने एक रास्ता निकाला कि आरक्षण के सिद्धांत को कैसे दरकिनार कर दें. तो इसके लिए एक अलग रास्ता निकाला गया. लोकसभा में देश का सारा कानून बनता है. यहीं यह नियम बना कि दलितों के लिए नौकरियों में शिक्षा में आरक्षण होगा और उसी के संस्थान में आरक्षण लागू नहीं है. संपादकीय के 107 लोगों के ढ़ांचे में मेरी जानकारी में एक भी लोग नहीं हैं. और अगर वो यह सोचते हैं कि बिना आरक्षण लागू किए इस व्यवस्था में कोई आदिवासी आ जाएगा, कोई दलित आ जाएगा तो यह ऐसे ही हैं, जैसे कोई यह कहता है कि बिना आरक्षण के कोई लोकसभा में पहुंच जाएगा. इतने सालों बाद भी इसके बारे में नहीं सोचा जा सकता. आप सोचिए कि इस पर किसी ने सवाल नहीं उठाया. ठीक इसी तरह मैने प्रधानमंत्री कार्यालय पर सवाल उठाया था. वहां पूरी वर्ण व्यवस्था को प्रदर्शित करने वाली तस्वीरें लगी हैं. कि किसको ब्राह्मण कहते हैं, किसको क्षत्रिय कहते हैं, किसको वैश्व और किसको शूद्र कहते हैं. हमने इस बारे में आरटीआई डाला, संसद में सवाल करवाया लेकिन यह जवाब नहीं आया कि वो क्यो?
यह 1932 से लगी है. जब से अंग्रेज थे तब से. उस आफिस में हर दल के लोग जाते हैं. कई दलों की सरकार रह चुकी है. उसमें तमाम दलित लोग रह चुके हैं. मुझे हैरानी होती है कि किसी ने उस पर सवाल नहीं उठाया. आपने खुद को एकोमोडेट करने की जो मानसिकता बना रखी है इसमें यही होगा. ऐसे में आप रिलेक्स हो जाते हैं. जो अकोमोडेट हो जाते हैं उनको फिर समाज में परिवर्तन की लड़ाई से कोई मतलब नहीं रहता.
आज जो लोकसभा की स्पीकर हैं वो दलित परिवार से आती हैं. बाबू जगजीवन राम की बेटी हैं लेकिन उनके राज में भी यह व्यवस्था चलती जा रही है. मेरा यह मानना है कि अगर स्ट्रक्चर में आप केवल अपनी जगह बनाएंगे और स्ट्रक्चर गैरबराबरी का है. तो आप मान कर चलिए कि गैरबराबरी किसी ना किसी रूप में बनी रहेगी. उसका रूप बदल जाएगा.

यही चीजें शिक्षण संस्थाओं में भी देखने को आ रही हैं. पिछले दिनों मे तमाम आरटीआई में यह निकल कर आया है कि दलितों और पिछड़ों के लिए निर्धारित सीटों को भरने में तमाम तरह की धांधली हो रही है?
- मैं तो कह रहा हूं कि आपके हाथ से आरक्षण जा रहा है. अब जो राजनीतिक नेतृत्व तैयार किया गया है वो आरक्षण के मुद्दे को उठाकर जोखिम लेने की स्थिति मे नहीं है. आप सोचिए ना कि आरक्षण को लागू हुए देश में कितने साल हो गए. मैने तो आरटीआई के माध्यम से कई जानकारियां निकाली थीं. इसमें सामने आया था कि भारत सरकार में एक भी सेक्रेट्री दलित नहीं था. ग्रुप‘ए’के अधिकारी भी रेयर ही थे. शिक्षण संस्थाओं मे भी यही हाल है. एम्स में भी लड़ाई लड़ी गई है. इसमें महत्वपूर्ण यह है कि आरक्षण की स्थिति को खत्म करने के जो प्रयास हो रहे हैं वो दलित और पिछड़े के नेतृत्व में किया जा रहा है. यह ज्यादा खतरनाक बात है.

आप पत्रकारिता संस्थानों में पढ़ाते रहे हैं, वहां के अनुभवों को बताइए?
- आईआईएमसी के हिंदी विभाग में 3 साल तक पढ़ाया. 2-3 साल दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ा रहा. वर्धा में कई वर्षों से जाता रहा हूं. फिर वहां प्रोफेसर के रूप मे नियुक्त भी हुआ था. अब भी कई संस्थानों से जुड़ा हूं. लेकिन पढ़ाने के बीच में दुविधा की स्थिति भी होती है कि हम छात्रों को किसके लिए तैयार कर रहे हैं? क्या हम मीडिया आर्गनाइजेशन के लिए कर्मचारी तैयार कर रह हैं, या फिर समाज के लिए पत्रकार तैयार कर रहे हैं. आखिर हम मीडिया आर्गेनाइजेशन के लिए कर्मचारी तैयार क्यों करें? यह दुविधा है.

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में रहने के दौरान वहां के कुलपति वीएन राय से आपका विवाद काफी सुर्खियों मे रहा था. विवाद की वजह क्या थी. क्या अब वो सारा विवाद खत्म हो गया?
- व्यक्तिगत विवाद नहीं था. हर संस्थान का लीडर चाहता है कि संस्थान उसके मुताबिक चले. कोई आजादी देता है, कोई नहीं देता. झगड़ा यहीं होता है. वर्धा में जो कुलपति हैं, वो पुलिस बैकग्राउंड के हैं. उनका जीवन आदेश देने-लेने में गुजरा है. मेरा जीवन स्वतंत्र रहा है. तो मूलतः यही अंतरविरोध था. फिर धीरे-धीरे विवाद का विषय बनता चला गया. उन्होंने ही आमंत्रित किया था. अप्वाइंट किया था. इंटरव्यूह के वक्त ही मैने साफ कहा था कि मैं दिल्ली छोड़कर आ रहा हूं तो मेरी एक योजना है. मैने उसे सामने रखा था. लेकिन जब उसे लागू करने लगा तो दिक्कत आने लगी. फिर ईसी (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) ने फैसला किया कि मुझे हटाना है. एकतरफा फैसला था. फिलहाल नागपुर हाई कोर्ट में केस चल रहा है.

लोकसभा में दलित-आदिवासी समुदाय से 120 सांसद हैं. लेकिन मिर्चपुर जैसा बड़ा कांड होने के बावजूद संसद में वह प्रमुखता से नहीं उठ पाया. इसकी क्या वजह है?
- संसद ही क्यों, जितना शोर-शराबा संसद के बाहर होना चाहिए था, वहां भी नहीं हो पाया. इस पर अध्ययन होना चाहिए कि मिर्चपुर जैसे बड़े कांड के बावजूद भी आंदोलन की शक्लक्यों नहीं बन पाई. इस घटना के बाद पूरा सरकारी तंत्र जागरूक हो गया था. भावी प्रधानमंत्री कहा जाने वाला शख्स भी वहां पहुंच गया था. मुआवजे की घोषणा हुई. अधिकारी गिरफ्तार किए गए. मेरा सवाल है कि क्या आंदोलन इसी तरह की मांगों के लिए होते हैं? आंदोलन का उद्देश्य क्या बस ऐसी मांगों को पूरा करवाना होता है? या फिर आंदोलन का उद्देश्य इस तरह की घटनाओं को रोकना होता है. तो आंदोलन का उद्देश्य उस उद्देश्य तक नहीं पहुंचा है, जहां इसे पहुंचना चाहिए था.
दलित समाज का बड़ा हिस्सा सत्ता में है. लाखों लोग अच्छी नौकरी में है. सबकुछ है लेकिन आप एक बड़ा आंदोलन की स्थिति खड़ी नहीं कर पा रहे हैं. खैरलांजी, मोहाना, दुलीना जैसे आंदोलन की स्थिति खड़ी नहीं कर सके. दलित उत्पीड़न विरोधी जो राजनीतिक धारा है, उस पूरी धारा का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए.

क्या आप दलित आंदोलन के वर्तमान रुख और तेजी से संतुष्ट हैं?
- बिल्कुल नहीं हूं. संतुष्ट तब होते, जब सब ठीक होता, दुरुस्त होता. आंदोलन का विस्तार होता रहता है. अभी जड़ता की स्थिति है. अगर इसे तोड़ा नहीं गया तो लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहेगी.

वर्तमान में दलित आंदोलन में किन नई बातों को शामिल किए जाने की और पुरानी बातों को छोड़ने की जरूरत है?
- आंदोलन में जो एक बात दिखाई दे रही है कि यह शहरी हिस्से, मध्यवर्ग और शिक्षित लोगों तक ही सिमटती जा रही है. यह बड़ा खतरा है. हम कभी यह नहीं सुनते कि जो आरक्षण नहीं मिलने की शिकायत करते हैं वो देश के खेत मजदूरों की भी बात करते हैं. खेत मजदूरों की सर्वाधिक आबादी दलितों की ही है. आंकड़ें उपलब्ध है कि 20 रुपये रोज पर 76 फीसदी लोग गुजारा करते हैं, आप उनमें दलितों की संख्या का अंदाजा लगा लिजिए. इसके मुकाबले इनकी चिंता कितनी होती है, उसे साफ तौर पर देख सकते हैं. आंदोलन की भाषा को सबसे पहले चेक करने की जरूरत है. आरक्षण समाज को मिलता है, व्यक्ति को नहीं. आरक्षण के जरिए व्यक्ति सरकारी संस्थाओं में समाज का प्रतिनिधित्व करता है. जब तक वह इस स्थिति को महसूस नहीं करेगा कि वह अकेला व्यक्ति नहीं बल्कि अपने समाज का प्रतिनिधि है, वह अपने आप को जिम्मेदार नहीं बना सकता है.

उत्तर प्रदेश के अलावा और कहीं सशक्त नेतृत्व उभर कर क्यों नहीं आ पाया?
- उत्तर प्रदेश में जो आंदोलन की स्थिति बनी है, उसमें कांशी राम जी का आंदोलन लंबे समय तक चला. उसी की वजह से दलित चेतना जागी. कांशी राम जी का आंदोलन पूरे प्रदेश में दलित चेतना का प्रतिनिधित्व करता था. यूपी ब्राह्मणवाद का केंद्र रहा है. लोगों की चेतना में यह लंबे समय से था. इसमें इतनी आक्रमकता थी कि‘इनको मारो जूते चार’की बात कही गई. कांशीराम जी ने इस बात को समझा की जब तक इस आवाज में अभिव्यक्त नहीं करेंगे, गुस्से को उभार नहीं पाएंगे. कांशी राम ने लोगों की सोच के साथ तालमेल बैठा लिया. इसलिए यूपी में सफलता मिली. यह बिहार में नहीं मिलती. पंजाब में नहीं मिल सकती थी, जहां के कांशीराम खुद थे.

मायावती, रामविलास पासवान, प्रकाश आंबेडकर, उदित राज और रामदास अठावले जैसे प्रमुख दलित नेताओं की राजनीति को आप कैसे देखते हैं? इनका भविष्य क्या है?
- ये सारे लोग सत्ता से जुड़े लोग हैं. अब अगर आप मायावती से आंदोलन करने की उम्मीद करेंगे तो यह मुश्किल है. कांशी राम ने कभी भी मुख्यमंत्री बनने की नहीं सोची. आप (मेरी ओर इशारा करते हुए) जिन तमाम लोगों के नाम ले रहे हैं, उन्हें सत्ता सुख मिल गया है. ये आंदोलन नहीं कर सकते. हां, यह सत्ता के अंतरविरोधों को उभार कर जातीय गठबंधन के अनुरूप सत्ता में जगह बना लेंगे. ये कोई बदलाव, कोई आंदोलन नहीं कर सकते.

दलित-आदिवासी हित के लिए तमाम एनजीओ काम कर रहे हैं. क्या आप उनकी कार्यप्रणाली को ठीक मानते हैं, क्या वो ईमानदार हैं?
- हमेशा विकल्प का चुनाव बहुत सोच-समझ कर किया जाना चाहिए. तात्कालिक हित और दूरगामी हित के बीच के फर्क को समझना चाहिए. जो एनजीओ हैं, वो राजनीतिक तौर पर बुनियादी परिवर्तन का हथियार नहीं हो सकता है. इसलिए किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ के काम से यह दिखता तो है कि वह आपके हित की बात कर रहा है,लेकिनउससे कोई बुनियादी फर्क नहीं आ पाता है. जैसे वह शिक्षा की बात तो करेगा लेकिन जिस सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति के कारण से शिक्षा नहीं मिल पा रही है, उसकी बात नहीं करेगा. तो जो एनजीओ काम कर रहे हैं, मुझे नहीं लगता कि उन्होंने बहुत उल्लेखनीय काम कर दिया है. या फिर जो दलितों के ऐसे आंदोलन को मजबूत कर रहा हो जो बुनियादी ढ़ांचे को तोड़ने की बात करता है.

अगर आपको दलितों की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक दशा सुधारने की छूट दी जाए तो आप क्या करेंगे?
- मुझे काम करने की छूट मिली हुई है. जो कारण मेरी समझ में आता है उसे लोगों के सामने रखता हूं. और भी बहुत सारी चीजें जो उनपर थोपी गई है, उसे सामने लाता हूं.

चंद्रभान प्रसाद, प्रो. तुलसी राम, डा. विवेक कुमार और श्योराज सिंह बेचैन जैसे तमाम दलित चिंतक, लेखक और विचारक दलितों की आवाज को हर मोर्चे पर उठाते रहते हैं. इनके विचारों से आप कितने सहमत हैं?
- सबके अपने-अपने विचार हैं, अपना-अपना नजरिया है. सब महत्वपूर्ण लोग हैं और सबका योगदान हैं. बराबरी के चिंतन और गैरबराबरी के खिलाफ लड़ाई को इन तमाम लोगों के विचारों ने नया आयाम दिया है.

आप दलित हित की बात करते हैं, आप बाबा साहेब को कैसे देखते हैं?
- उनके विचारो से मेरी बिल्कुल सहमति हैं. दरअसल बाबा साहेब की जो पूरी चिंतन प्रणाली है, उसकी तमाम लोग अपने तरीके से व्याख्या करते हैं. जैसे बाबा साहब कहते हैं किशिक्षित बनों, संगठित बनों, संघर्ष करो. हर कोई यह नारा लगाता है. मैं इसमें बाबा साहब की एक बात जोड़ता हूं कि बाबा साहेब जैसे ही यह कहते हैं कि मुझे पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया, तो उनका यह कथन, पहले वाले कथन के मायने बदल देता है. उनके लिए शिक्षित होने का मतलब खुद के लिए और अपने बच्चों के लिए शिक्षित होना नहीं है. या फिर बस स्कूली शिक्षा भर नहीं है. शिक्षा का मतलब यहां बदल जाता है.
जैसे मेरे एक मित्र हैं- अनंत तिलतुमरे. बाबा साहेब के परिवार के हैं. जिस तरह से वो बाबा साहेब के विचारों को प्रस्तुत करते हैं, आप बाबा साहेब के विचारों के अलावा किसी और के विचारों से सहमत नहीं हो सकते. तो महत्वपूर्ण यह है कि आप उन्हें कैसे प्रस्तुत करते हैं. मैं बाबा साहब का दिया संदेश पसंद करता हूं. उनका प्रभाव महसूस करता हूं और उनका सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का जो कारण है, वो हमें सोचने की गति देता है.

आपके जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव किसका रहा?
- आपके जीवन पर किसी एक व्यक्ति का प्रभाव नहीं होता. मैं इसका पक्षधर भी नहीं हूं. परिवर्तन की हर धारा को, बराबरी का समाज बनाने की सभी धाराओं को करीब से देखने की कोशिश करता हूं. जिसका साकारात्मक पक्ष महसूस करता हूं, उसे लेकर आगे बढ़ता हूं. तो किसी व्यक्ति से प्रभावित हूं, ऐसा नहीं कह सकता. खुद को आधुनिकतम राजनीतिक विचारधारा से जोड़ पाता हूं. लोकतंत्र और बराबरी से जोड़ पाता हूं.

अपने दोस्तों और दुश्मनों के बारे में बताइए?
- कोई दुश्मन नहीं है. व्यक्ति के रूप में किसी को दुश्मन नहीं मानता हूं. जिन्होंने मेरे ऊपर गोली चलाई, अपहरण करने की कोशिश की, उन्हें भी नहीं. हां, विचारधारा को दुश्मन मानता हूं. जो प्रतिक्रियावादी धारा है वह मेरे दुश्मन की तरह है.

गोली चलाई, अपहरण की कोशिश? कब की घटना है यह? जरा विस्तार से बताइए.
- सब कॉलेज के दिनों की बात है. उन दिनों आरक्षण समर्थक थे तो क्लास रूम की बजाए बाहर होते थे. उस दौरान कुछ लड़कों के साथ झगड़ा हुआ था. मेरे ऊपर गोली चलाई गई, मेरे अपहरण की कोशिश हुई.

क्या कोई ऐसी घटना है जिसने आपके जीवन को प्रभावित किया?
- दो लोगों की बातों ने काफी प्रभावित किया. एक केशव शास्त्री थे. लीडर थे. लोहियावादी थे. उनका एक किस्सा बड़ी प्रभावित करता था. एक दिन उन्होंने पूछा कि कभी किसी नदी के किनारे गए हो? मैने कहा- हां, गया हूं. उन्होंने कहा कि क्या कभी गौर किया है कि पहाड़ से नदी की ओर जो धारा निकलती है, वह कई बड़े पेड़ों को उस धारा में बहाकर ले आती है. लेकिन उस नदीं में जो छोटी मछली होती है वह धारा के विपरीत चलती है. इसका मतलब यह हुआ कि वह जीवित है. उसमें चेतना है. तो वह प्रदर्शित करती है कि धारा बहाकर नहीं ले जा सकती. उनके इस किस्से ने काफी प्रभावित किया.
एक दूसरी घटना जिसने मेरे विश्वास को बढ़ाया, वो घटना नौवीं कक्षा में घटी. मेरे सामने संकट था कि क्या करें. तब एक टीचर मिले. कुशवाहा जाति के थे. हम उन्हें मुंशी मास्टरकहते थे. (आज की बदलती बोली की ओर ध्यान दिलाकर कहते हैं, सर नहीं मास्टर कहते थे) उन्होंने नौंवी पास करने के बाद मुझसे कहा कि तुम 11वीं (तब बोर्ड) की परीक्षा दो. मैने कहा- मास्टर साहब यह कैसे होगा. उन्होंने भरोसा दिलाते हुए कहा कि अगर मैं आने वाले 4-6 महीने तक पढ़ाई करूंगा तो टॉप-10 में आ जाऊंगा. हालांकि ऐसा तो नहीं हुआ लेकिन उन्होंने मुझपर जो भरोसा दिखाया उसने मेरे भीतर आत्मविश्वास का एक ढ़ांचा खड़ा कर दिया.
आपके आत्मविश्वास को तोड़ना और बनाए रखना, यही पूरी लड़ाई है. खासकर एक दलित के भीतर यह मायने रखता है. अगर एक दलित को बार-बार यह कहा जाता है कि वह कुछ नहीं कर सकता तो उसके आत्मविश्वास का ढ़ांचा टूट जाता है. शासक यही काम करते हैं. तो सारी लड़ाई आत्मविश्वास को बनाए रखनी की है. तो ऐसे कई पात्र मेरे जीवन में आए हैं. वो सभी सामान्य थे. मेरे भीतर उन सभी का कंट्रीब्यूशन है. मुझे गढ़ने में उनकी बड़ी भूमिका है.

सर आपने इतना वक्त दिया, हमसे बात की धन्यवाद
धन्यवाद अशोक जी।

(दलित मुद्दों पर देश के पहले न्यूज पोर्टल www.dalitmat.com से साभार)

Tuesday, July 12, 2011

जेएनयू मे भी दबाए जाते हैं दलित

जेएनयू में मकान नंबर 105 ‘उत्तराखंड’ प्रो. आर. के काले का है. उनके दिल्ली प्रवास के दौरान यहीं मुलाकात हुई. प्रो. काले का जीवन संघर्ष अद्भुत है. वैसे तो संघर्ष का सामना हर दलित की नियति में है, लेकिन उन्होंने जिन संघर्षों से गुजरकर तमाम उपलब्धियां हासिल की, ऐसी स्थिति में अच्छे-अच्छे दम तोड़ देते. 7-8 साल की उम्र में जब मां-बाप, बच्चों को जबरन स्कूल भेजते हैं, प्रो. काले ने पढ़ाई के लिए घर छोड़ दिया था.
13 साल की उम्र में जब वार्डन की खिलाफत के कारण हॉस्टल से निकाले गए और सर पर छत ना थी, तीन महीने तक मंदिर, स्टेशन और अस्पताल के वेटिंग रूम में रातें गुजारी. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और तमाम झंझावतों से जूझते हुए आगे बढ़ते रहे. कैंसर की रोकथाम के लिए किए गए रिसर्च के कारण ‘इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ की ओर से 1996 में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है. जब ‘सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात’ के लिए पहले कुलपति की तलाश हो रही थी तो उनको जेएनयू से बुलावा भेजकर यह जिम्मेदारी सौंपी गई. कुलपति प्रो. काले से उनके जीवन संघर्ष, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में दलितों की स्थिति और सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात को लेकर योजनाओं के बारे में ‘दलित मत’ के आपके मित्र अशोक दास ने उनसे लंबी बातचीत की. इस दौरान भी जेएनयू के ऊपर से रह-रह कर गुजरने वाले विमानों के शोर उनकी बातों को दबाने की कोशिश करते रहे लेकिन उनके हौसले के आगे उन्हें भी हार मानना पड़ी. पेश है बातचीत के अंश ........

महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से निकल कर कुलपति पद तक के अपने सफर को आप कैसे देखते हैं?
- जब इस सफर को याद करता हूं तो सबसे पहले अपनी गरीबी याद आती है. आप तो जानते हैं कि गांव से निकलने वाले लोग कितने गरीब होते हैं. इस गरीबी में भी जो जाति है वो ज्यादा मायने रखती है. बहुत छोटा सा गांव था. मां-बाप मजदूर थे. खेती-बाड़ी कुछ नहीं थी. तो गुजारा बस जैसे-तैसे होता था. मराठी में एक कहावत कहते हैं कि ‘हाथ पे पेट’ होना. यानि की जब कमाना है, तभी खाना है. कुछ ऐसा ही हाल था. महाराष्ट्रा मे शिक्षा के प्रसार का दौर था. बाबा साहेब के कारण यह पूरे प्रदेश में खूब फैल रहा था. लेकिन बीड जिले का मेरा जो इलाका था, वो काफी पिछड़ा था. वहां अंबेडकर के शिक्षा का संदेश देर से पहुंचा. मेरे नाना कारपेंटर थे जिस कारण उनका लोगों में उठना-बैठना था. वहां एक पुलिस स्टेशन था. वहां पर निजाम के मुसलमान आया करते थे. उनसे मेरे नाना का संपर्क होता था. उनसे बातचीत से उनको पता चला कि शिक्षा का बहुत महत्व है. हालांकि वो बहुत ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रहें लेकिन उन्होंने मेरी नानी से कहा था कि हमें हमारे बच्चों को पढ़ाना है. नानी ने मेरी मां को पढ़ाया. फिर मुझे शिक्षा का मैसेज मेरी मां के माध्यम से मिला. तब तक बाबा साहब का भी प्रचार-प्रसार काफी फैलने लगा था.
जब मैं तीसरी में था तो हमारे गांव के टीचर गुजर गए. कई दिनों तक उनके बदले में कोई दूसरा टीचर नहीं आया. हमारे स्कूल का प्रशासन जरा दूरी पर मौजूद एक स्कूल के अंडर में आता था. हम कुछ दोस्त हर सप्ताह वहां जाकर अपने स्कूल में शिक्षक को भेजने के लिए कहने लगे. हमने उन्हें बताया कि हमें पढ़ने मे दिक्कत हो रही है. समय बर्बाद हो रहा है. तब पढ़ाई में मेरा मन लगने लगा था. तीन-चार सप्ताह लगातार जाने के बाद जब मैं फिर दूसरे स्कूल के शिक्षक के पास पहुंचा तो उन्होंने पूछा कि क्या तुम पढ़ने के लिए इस स्कूल में नहीं आ सकते. मुझे पढ़ना था तो फिर मैने हामी भर दी. मैने घर आकर मां से कहा कि मुझे दूसरे गांव जाना है. टीचर ने बुलाया है. वहीं पढ़ना है. कुछ दिन बाद मैं उन शिक्षक के पास पहुंच गया. हालांकि कहां रहना है, क्या खाना है, मुझे इसकी तनिक भी जानकारी नहीं थी. मैं सीधे स्कूल मे उन शिक्षक के पास धमक गया. शाम को स्कूल खत्म हुआ तो वह मुझे अपने घर ले आएं. उनका नाम श्रीरंग सावले था. वो भी दलित थे. उन्होंने मुझे दो साल तक अपने पास रखा. जब मैं चौथी में पास हो गया तो उन्होंने मुझे जिले में जाकर पढ़ने की सलाह दी. तब हरिजन शिक्षा सेवा संघ वाले अपना हॉस्टल चलाते थे. सरकारी ग्रांट पर. मैं वहां चला गया. दो साल तक रहा. तीसरे साल मुझे हॉस्टल से निकाल दिया गया. कहा गया कि मैं गुंडा हूं, पढ़ाई नहीं करता. जबकि मैं पढ़ाई में बहुत आगे था और क्लास का मॉनीटर भी था. लेकिन हर कदम पर संघर्ष करते हुए मैने अपनी पढ़ाई जारी रखी. एक-एक कदम बढ़ाते हुए जेएनयू पहुंचा. दो दशक तक यहां विभिन्न रूपों में सक्रिय रहा. फिर सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात की जिम्मेदारी मिली. तो इस तरह जिंदगी काफी संघर्ष भरी रही.

आपको हॉस्टल से क्यों निकाल दिया गया. इसके बाद की आपकी पढ़ाई कैसे जारी रह पाई?
असल में मामला यह था कि वहां के वार्डन बहुत बदमाश थे. वे साल में एक-दो महीने के लिए हॉस्टल बंद कर देते थे. तब सबको हॉस्टल छोड़कर जाना पड़ता था. इस तरह वह दो महीने में खर्च होने वाले पैसे बचा लेते थे. ऐसे ही एक बार हॉस्टल बंद हुआ तो हम तमाम लड़के कलेक्टर के घर शिकायत लेकर पहुंचे. हमने बताया कि वार्डन करप्ट है. इसके बाद कलेक्टर ने एक दिन हमारे स्कूल में औचक निरीक्षण (surprise visit) किया. इत्तेफाक से मैं उस दिन स्कूल नहीं गया था. हालांकि मैने प्रिंसिपल से छुट्टी ले रखी थी. लेकिन बावजूद इसके, वार्डन ने पांच और लड़कों के साथ मुझे हॉस्टल से निकाल दिया. मैं हैरान रह गया कि आखिर मुझे कैसे निकाला जा सकता है. क्योंकि मेरी हाजिरी भी पूरी होती थी और मैं पढ़ने में भी काफी बेहतर था. यह मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. मुझे हॉस्टल छोड़ना पड़ा. यहां तक कि मेरा बस्ता भी वहां किसी के पास नहीं रखने दिया गया. तब मैने बस्ते से अपना नाम हटाकर एक दोस्त के पास रखा.
रहने का कोई ठिकाना नहीं था. जान-पहचान का कोई था नहीं, जिससे मदद मांगू. जेब में पैसे भी नहीं थे. तब मैने एक हनुमान मंदिर में शरण ली. तब मैं सातवीं में था. कोई 13-14 साल उम्र थी मेरी. मंदिर में बैठे-बैठे मैं सोच रहा था कि अब क्या किया जाए. मेरे पास कुछ भी नहीं था. दिन तो स्कूल में कट जाता, दिक्कत रात की थी. तकरीबन तीन-चार महीने तक मैं कभी बस स्टैंड, कभी हॉस्पिटल तो कभी मंदिर में सोता रहा. पुलिस वाले रात को परेशान करते तो कोई बहाना बनाना पड़ता. मैं बहुत परेशान था लेकिन मैने मन ही मन तय कर लिया था कि मैं इन लोगों से लड़ूंगा. वार्डन साल के बीस रुपये लेते थे. हॉस्टल एडमिशन चार्ज जो नियमानुसार वापस होना चाहिए था. मेरे तीन साल के 60 रुपये हो गए थे. मैने इसी मुद्दे को लेकर लड़ने का फैसला किया. हमने वार्डन से कहा कि हमारे पैसे लौटा दो. इसी दौरान मैने अंदर-अंदर यह भी मन बना लिया था कि मैं आगे की पढ़ाई के लिए औरंगाबाद जाऊंगा. इसी बीच वार्डन से हम छात्रों की लड़ाई हो गई. खिंचतान में हमारे कपड़े फट गए. हम सभी छात्र इसी हालत में सीईओ के पास चले गए. सीईओ ने हमें ही डांटना शुरू कर दिया कि तुम लोग पढ़ते नहीं हो हंगामा करते हो. मैने विरोध किया. तब मेरे पास मेरी मार्क्स शीट थी. मैने उन्हें दिखाया. मेरे नंबर देखकर वो भौचक रह गए. उन्होंने हमें भेज दिया और मामले को देखने का आश्वासन दिया. कुछ दिनों बाद वार्डन को सस्पेंड कर दिया गया. फिर मैंने अपने एक दोस्त से पांच रुपये उधार लिया और आगे की पढ़ाई के लिए औरंगाबाद चला आया.

मराठवाड़ा विश्वविद्यायल के नामांतरण को लेकर काफी आंदोलन हुआ था. क्या उस आंदोलन में आपकी कोई भूमिका थी?
नहीं, तब मैं दिल्ली में था. मैने 1976 में औरंगाबाद छोड़ दिया था. तो मैने प्रत्यक्ष संघर्ष को तो नहीं देखा लेकिन मुझे हर बात की खबर मिलती रहती थी कि वहां किस तरह आंदोलन को दबाने के लिए लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है.

विज्ञान की दुनिया एक अलग दुनिया होती है, आप उसी से जुड़े रहे हैं. वहां से निकल कर एक विश्वविद्यालय के प्रशासन को संभालने में दिक्कत नहीं हुई?
-ऐसा नहीं है कि साइंस की दुनिया लोगों से अलग है. बल्कि विज्ञान की दुनिया तो लोगों के और करीब है. हमलोग सोशल मूवमेंट से आए हुए लोग हैं. हमेशा सोसाइटी में रहे हैं. महाराष्ट्र में जितने भी सोशल मूवमेंट हुए हैं, प्रत्यक्ष या फिर अप्रत्यक्ष रूप से मैं हमेशा उसका हिस्सा रहा हूं.

आपके जीवन में सबसे ज्यादा निराशा का वक्त कौन सा रहा?
- देखिए, वैसे तो पूरा जीवन ही निराशा भरा रहा है. दलित समुदाय से जुड़े होने के कारण जीवन में तमाम वक्त पर निराशा का सामना करना पड़ता है. आपको हर स्टेज पर अग्नि परीक्षा देनी होती है. ऐसा कोई दिन नहीं होता है, जब सिस्टम आपको अग्निपरीक्षा देने के लिए मजबूर नहीं करता.

मतलब आप यह कहना चाहते हैं कि आपको हर मौके पर भेदभाव का सामना करना पड़ा. जेएनयू में भी आपके साथ भेदभाव हुआ?
- बिल्कुल. जेएनयू कोई अलग थोड़े ही है. ऐसा थोड़े ही है कि जेएनयू में दलितों को दबाया नहीं जाता. बस हर जगह का अपना तरीका होता है. आप आईएएस में देख लिजिए. आप राजनीति में देख लिजिए. दलितों को हमेशा सोशल जस्टिस मिनिस्ट्री ही क्यों दी जाती है. उनको होम मिनिस्ट्री क्यों नहीं दी जाती है. कोई अपवाद आ गया तो बात अलग है. जहांतक जेएनयू की बात है तो यह अन्य जगहों से ठीक है. लेकिन यहां भी दिक्कते हैं. जैसे जेएनयू के एडमिशन टेस्ट में मुझे अच्छे नंबर मिले थे लेकिन मुझे आखिरी में रखा गया. मेरा स्कोर अच्छा रहा लेकिन मुझे जितना अच्छा सुपरवाइजर मिलना चाहिए, नहीं मिला. जब हम टीचर बने तो हमें जल्दी लैब नहीं मिली. तो ऐसा नहीं है कि यहां भेदभाव नहीं होता. जैसे मैं आपको जेएनयू की एक घटना बताता हूं. तब 77 के बाद चर्चा हो रही थी कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा. तीन नाम थे. जगजीवन राम और मोरार जी के साथ एक-दो और लोगों का नाम आ रहा था. ज्यादातर लोगों का मानना था कि जगजीवन राम सबसे बेहतर हैं लेकिन वहीं जेएनयू के एक तेजतर्रात स्टूडेंट का कहना था कि जगजीवन राम को हम प्रधानमंत्री के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं, वो 'चमार' हैं. यह पेरियार के सामने रात के वक्त की चर्चा थी. तो लोगों का मेंटल सेटअप हरेक जगह आ जाता है. तो किसी न किसी रूप में लोगों का यह एटिट्यूड सामने आ जाता है. जैसे अगर आप आईएएस बनेंगे तो आपको कहीं दूर फेंक देंगे. पॉलिटिक्स में हैं तो अच्छी मिनिस्ट्री नहीं देंगे. तो यह हर क्षेत्र में है.

आपने अभी जातिवाद की बात की थी हर जगह ऐसा होता है. लेकिन जेएनयू के बारे में माना जाता है कि अच्छी जगह है, बड़ी जगह है, लोग पढ़े-लिखे समझदार हैं. लेकिन जब आपको यहां भी भेदभाव का सामना करना पड़ा तो वह आपके लिए कैसी स्थिति थी?
- मैं इसको लेकर कभी निराश नहीं हुआ. मुझे पता था कि यह समाज की सच्चाई है और मुझे इसका सामना करना है. हालांकि जेएनयू में अच्छे लोग भी बहुत हैं जो चीजों को समझते हैं. जैसे रमेश राव (लाइफ साइंस) जी मेरे सुपरवाइजर थे. वो बहुत अच्छे व्यक्ति थे. वाइस चांसलर मिस्टर नायडूमा, वो भी बहुत अच्छे थे. तो जो मैं राव साहब की बात कर रहा था, वो हमेशा हौंसला बढ़ाते थे. कहते थे कि पढ़ना चाहिए. अच्छा करना है. तो मेरे कहने का मतलब है कि दोनों तरह के लोग हैं.

अपने संघर्ष के दिनों को आप कैसे याद करते हैं?
- संघर्ष से मुझे कभी परहेज नहीं रहा. ना ही शिकायत रही. बल्कि मैने हमेशा सोचा कि मुझे खुद को साबित करना है. मुझे लोगों को दिखाना है कि जैसा वो हमारे बारे में सोचते हैं कि हम कुछ कर नहीं सकते, तो उनकी सोच गलत है.

हर किसी की जिंदगी में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो उनकी मदद करते हैं, उन्हें प्रभावित करते हैं. आपकी जिंदगी में यह रोल किसका था?
- सबसे पहले बाबा साहेब, फिर मां-बाप, प्रो. रमेश राव, इसके बाद मेरी पत्नी रेखा हैं. वो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में साइंटिस्ट हैं. वो हमेशा मेरे पीछे रही हैं. मेरे बचपन के शिक्षक सावले साहब हैं, जिन्होंने मुझे दो साल तक अपने साथ रखा. जेएनयू के वातावरण का भी अपना अहम रोल है. मैने जो पहले कहा वह एक अलग पहलू है लेकिन जेएनयू एक ऐसी जगह है जहां आदमी खुद भी सीख सकता है और प्रेरणा ले सकता है. दूसरे लोगों की सफलता और असफलता से भी सीखने की कोशिश करता हूं.

आप जेएनयू में वार्डन भी रहे, चीफ प्राक्टर रहे, डीन रहे, कुलपति की अनुपस्थिति में यह पद भी संभाला. तकरीबन दो दशक में आपने युवा वर्ग को करीब से देखा है. इस वक्त में आपने युवा को कितना बदलते देखा है?
- मैं 76 से यूथ के साथ हूं. उन्हें देख रहा हूं. तब उनमें सोशल वैल्यू था. उनमें अपने लिए करते-करते सोसाइटी के लिए भी काम करने की इच्छा रहती थी. वो समाज का दुख समझते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. उनमें बदलाव आ रहा है. वह खुद में केंद्रित होते जा रहे हैं. ज्ञान को भी बहुत महत्व नहीं दे रहे हैं. वह तेज भागना चाहते हैं लेकिन खुद का रास्ता नहीं बना रहे हैं. तो ऐसा है. बाकी सोसाइटी बदलती है तो हर जगह बदलाव आता है. अब आप जेएनयू को ही देखिए. कितनी प्रोग्रेसिव यूनिवर्सिटी है लेकिन रिजर्वेशन पर यहां भी हंगामा हुआ. तो सोशल कमिटमेंट कम हो गया है.

कैंसर एंड रेडिएशन बॉयलोजी पर आपका काफी रिसर्च रहा है. अपनी प्रतिभा से आपने समाज को बहुत कुछ दिया है. आपका काम किस तरह का था?
- मेरा एमएससी न्यूक्लियर कमेस्ट्री में था. इसके चलते मुझे रेडिएशन की केमेस्ट्री के बारे में पता था. लेकिन बायलोजिकल इफेक्ट पता नहीं था. मुझे इसमें इंट्रेस्ट था कि बायलोजिकल इफेक्ट देखना चाहिए. बाद में नागाशाकी का देखा जो काफी विध्वंसक था. तो बायलोजिकल इफेक्ट देखने की इच्छा थी. इसलिए मैं यहां आया. हमने इस पर काम किया कि रेडिएशन से जो डैमेज होता है, वह किस तरह का होता है. इसको कैसे कम किया जा सकता है या फिर इससे कैसे बचा जा सकता है. जिस रेडिएशन से कैंसर पैदा होता है, उसका ट्रिटमेंट भी उसी से होता है. जैसे नार्मल सेल कैंसर बन जाती है. फिर कैंसर को रेडिएशन देकर kill (खत्म) भी किया जा सकता है. ये दोनों अलग-अलग हैं. मुझे इसके बारे में जानने में काफी दिलचस्पी थी. तो मैने दोनों चीजें देखी कि रेडिएशन का बॉयलोजिकल इफेक्ट क्या है और रेडिएशन से क्या किया जा सकता है. उसमें कुछ बहुत नुकसान है. इसे कम कर के कैसे फायदेमंद किया जा सकता है. इसके बारे में मैने नया सुझाव दिया था जिसके लिए मुझे नेशनल अवार्ड मिला था. 96 में आईसीएमआर अवार्ड था. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च. तो मैने रेडिएशन का मैकेनिज्म जानने की कोशिश की थी कि कैसे यह रेडिएशन कैंसर पैदा भी करता है और खत्म भी करता है.

आपने जो काम किया क्या उसका लोगों को कोई फायदा मिल पाया. क्या वो आगे बढ़ पाया?
- हमारा काम तो लेबोरेटरी वर्क होता है. हर चीज के बारे में विश्व स्तर पर रिसर्च होता है. जैसे कैंसर में जितना एक महीने में शोधपत्र छपता है, अगर बैठ कर पढ़ा जाए तो तीन महीने लग जाएंगे. तो ये बहुत बड़े पैमाने पर होता है. उसी में थोड़ा योगदान मेरा भी है. इसमें ऐसा होता है कि जो रिसर्च हो चुकी होती है, उससे आगे की चीजें ढ़ूंढ़ी जाती है. अभी कैंसर के इलाज में मरीज को काफी खर्च आता है. लेकिन रेडिएशन थेरेपी के तहत कम खर्च में कैंसर का इलाज किया जा सकता है.

अब तक आपके कितने शोध पत्र (रिसर्च पेपर) प्रकाशित हो चुके हैं?
- सौ पेपर प्रकाशित हो चुके हैं. केमेस्ट्री, कैंसर और रेडिएशन बॉयोलाजी पर.

जब भी किसी के हाथ में प्रशासन की बागडौर आती है. वो उसे अपने हिसाब से ढ़ालना चाहता है. आप सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात के पहले वाइस चांसलर (कुलपति) हैं. आप इसे किस तरीके से स्थापित करना चाहते हैं?
- कोई भी यूनिवर्सिटी सामाजिक बदलाव का हथियार है. मैं इसे ऐसे ही देखता हूं. यूनिवर्सिटी नेशनल डेवलपमेंट में अपना योगदान देते हैं. यहां अच्छे स्टूडेंट तैयार करना हमारी जिम्मेदारी है. उन्हें सोशल इक्वैलिटी की बात सिखाना. एक नए कल के लिए तैयार करने का काम होता है. एक नया कल्चर डेवलप करने की कोशिश कर रहे हैं. और इस मिशन के दौरान कोई छोटा-बड़ा नहीं है. मैं टीमवर्क के तहत काम करने पर भरोसा करता हूं. टीम में हर मेंबर का अपना रोल होता है. अगर हर कोई अपना काम नहीं करेगा तो टीम हार भी सकती है. चाहे वो चपरासी ही क्यों न हो, उसका भी एक रोल होता है.

आपने 3 मार्च 2009 को कुलपति का पद संभाला था. अब दो साल हो गए हैं. इन दो सालों में आपने क्या किया है. अभी वहां कितने स्टूडेंट हैं?
- मैने इसे तीन विषयों के साथ शुरू किया था. पहले साल में 25 विद्यार्थी थे. दूसरे साल सात और विषयों को शुरु किया. इस तरह फिलहाल दस कोर्स में 150 स्टूडेंट हो गए हैं. हम जल्दी ही 8-10 नए विषय शुरू करने जा रहे है. तो सारी संख्या मिलाकर तकरीबन 400 स्टूडेंट हो जाएंगे. मेरे लिए खुद कहना तो अच्छा नहीं होगा लेकिन हम अपने स्टूडेंट को क्वालिटी एजूकेशन दे रहे हैं. हमारा जोर रिसर्च पर काफी अधिक है. मैं यह गर्व से कह सकता हूं कि हमारी यूनिवर्सिटी देश की ऐसी पहली यूनिवर्सिटी है, जहां मैने ‘एम.ए इन सोशल मैनेजमेंट’ नाम का कोर्स शुरू किया है. अभी तक यह कोर्स किसी विश्वविद्यालय में नहीं है. जबकि आज के वक्त में इसकी बहुत जरूरत है. सरकार जो डीजीपी ग्रोथ की बात कह रही है और सोशल सेक्टर में इतना पैसा डाल रही है. लेकिन उसके पास इसके लिए प्लानिंग करना, पॉलिसी डिजायन करना और विश्लेषण के लिए उतने लोग नहीं है. इसको ध्यान में रखते हुए हमने एम.ए इन सोशल मैनेजमेंट का यह कोर्स शुरू किया है. यह पांच साल का कोर्स है. इसके कोर्स के लिए हम बारहवीं क्लास में दाखिला देते हैं. इसमें 40 फीसदी फील्ड वर्क है. जैसे नरेगा है, तो स्टूडेंट गांव में जाकर हर चीज को देखते हैं कि कैसे, क्या काम हो रहा है. इस दौरान वह गांव वालों के साथ ही रहते हैं. खाते-पीते हैं. यह कोर्स काफी पॉपुलर हो रहा है.

विश्वविद्यालय को लेकर आपकी भविष्य की क्या योजना है?
- सोशल कमिटमेंट के साथ मैं इसे सेंटर ऑफ एक्सिलेंस बनाना चाहता हूं. सामाजिक बराबरी के साथ मैं बेहतर शिक्षा में विश्वास करता हूं. हमें Quality Education देना है. Equity and Equality सिखाना है. ये चार-पांच बातें मैने तय की है.

आप शिक्षा के पेशे से जुड़े हैं. आप अपने स्टूडेंट को क्या मैसेज देते हैं
- मैं अपने स्टूडेंट से बहुत खुलकर बात करता हूं. मैं उन्हें कहता हूं कि पढ़ाई के बाद नौकरी तो ठीक है. अपने ग्रोथ के लिए यह जरूरी भी है. लेकिन मैं उन्हें हमेशा कहता हूं कि वो सोसाइटी के पार्ट हैं और उन्हें सोसाइटी से जो मिला है, उन्हें उसे वापस करना चाहिए. आप जहां रहो, जिस स्थिति में रहो, आपको चार लोगों का भला करना है. जैसे कोई शिक्षक है तो वह अच्छे स्टूडेंट तैयार करे. तो हमेशा जोर देता हूं कि सोसाइटी को पे-बैक करना जरूरी है.

सपना क्या है आपका?
- (पहले मना करते हैं कि कोई सपना नहीं है. दुबारा पूछने पर उनके चेहरे पर पीड़ा झलक जाती है) मैने ज्यादा सपने टूटते हुए देखे हैं. मैं अपने स्टूडेंट से भी कहता हूं कि आप सपने देखिए लेकिन यह भी याद रखिए की उसके टूटने की संभावना भी बहुत है. वैसे अपनी सोसाइटी के लिए ज्यादा से ज्यादा काम कर सकूं यही सपना है.

आप इतने गरीब परिवार से निकले. फिर कुलपति बनें. तो इतनी सारी सफलताओं के बावजूद वो कौन सी चीज है जो आपको आज भी बहुत परेशान करती है?
- कॉस्ट सिस्टम। लोगों का माइंटसेट अब भी चेंज नहीं रहा है. लोग कॉपीराइट समझते हैं. खुद को विशिष्ट समझते हैं. हमेशा रिजर्वेशन की बात कर के यह साबित करना चाहते हैं कि हमारे में मेरिट नहीं है. ये बातें मुझे बहुत परेशान करती हैं.

सदियों के संघर्ष के बाद आज दलित समाज आगे बढ़ना शुरू हुआ है. लोग अच्छे पदों पर पहुंचने लगे हैं. लेकिन इसके पीछे समाज के सालों का संघर्ष है. तो समाज के इस कर्ज को आप कैसे चुकाएंगे?
- सोसाइटी के कर्ज उतारने की बात है तो आप प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसके लिए काम करते हैं. जैसे अगर आप पढ़-लिख कर आगे बढ़ते हैं तो सोसाइटी के अन्य लोग भी यह
सोचते हैं कि उन्हें भी आगे बढ़ना है. आप जिस पद पर हैं, अगर आप अपनी ड्यूटी ठीक ढ़ंग से करते हैं तो कई लोगों को अपने आप फायदा हो जाता है. अगर कोई हमारे पास आकर सीधे मदद मांगता है तो भी हम उसका सही मार्गदर्शन करते हैं. तो हम तीन तरीके से समाज का कर्ज चुका सकते हैं. इनडायरेक्ट, पार्ट ऑफ द ड्यूटी और डिफरेंस ऑफ द ड्यूटी ये तीनों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है.आपका अतीत बहुत गरीबी का रहा है. मजदूर परिवार का रहा हैं. आप भूखे रहें, बिना छत रातें गुजारी.

फिर जब आपको सफलता मिली तो क्या आपके मां-बाप आपकी सफलता देख पाएं?
- दुर्भाग्य से जैसे ही सुख के दिन शुरू हुए, मां चल बसी. मां यह सब नहीं देख पाईं. पिताजी ने देखा लेकिन वो हमेशा गांव रहते थे. अपनी दुनिया में रहते थे. तो मैं कितना सफल हूं इस बात को वह समझ नहीं पाते थे लेकिन उन्हें इतना पता था कि मैं पढ़ा-लिखा हूं. उन्हें ये काफी अच्छा लगता था. वो खुश थे. (मां-बाप को याद करते हुए कहते हैं) उन्होंने मेरी पढ़ाई में कभी भी अपनी गरीबी आड़े नहीं आने दी. मुझसे कभी नहीं कहा कि पढ़ाई छोड़ दो और कोई काम पकड़ लो. तो उन्हें हमेशा अच्छा लगता था कि मैं पढ़ा-लिखा हूं. वो हमेशा दूसरों की मदद करने को कहते रहें.

आपने काफी विदेश दौरे भी किए हैं. घोर गरीबी से निकल कर विदेशों तक पहुंचने का अनुभव कैसा था?
- इसके दो-तीन तरह के अनुभव हैं. पहली बार ब्रिटेन गया. फिर कनाडा गया. जापान में भी गया. अमेरिका गया तो वहां देखा की वहां कि सोसाइटी में कोई छोटा-बड़ा नहीं है. हमारे यहां जब भी कोई एक आदमी दूसरे को देखता है तो यह सोचता है कि सामने वाला मुझसे बड़ा आदमी है या फिर छोटा आदमी है. हम एक-दूसरे से बातें नहीं करते. वहां ये सब नहीं होता. जर्मनी यात्रा की एक घटना याद आती है. मैं अकेले खड़ा था. बिना जान-पहचान के लोग खुद आकर गुड मार्निंग कहते थे. मुझे कहीं जाना था, तो कार स्टार्ट नहीं हो रही थी. वहां के प्रोफेसर लोगों ने खुद कार को धक्का दिया. तो मुझे वहां की मानवीयता बहुत पसंद आई थी. कोई इंसान छोटा-बड़ा नहीं था.
एक जगह कॉकटेल पार्टी में गया. वहां तमाम देशों के साइंटिस्ट थे. मैं अकेले खड़ा था. तभी एक साइंटिस्ट ने महसूस किया कि मैं अकेला हूं तो वो मेरे पास आ गया. जहां और लोग बैठे थे, वो मुझे वहां लेकर गया और फिर सबने मुझसे बातचीत शुरू कर दी. कनाडा का अनुभव अलग था. वहां के लोग सबके साथ घुलते-मिलते थे लेकिन वहां जो इंडियन लोग थे, जो बस गए थे. वो अपनी जाति के साथ गए हैं, अपनी भाषा के साथ गए हैं. जब तक उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती वो साथ नहीं आते. उदाहरण के लिए कई बार विदेशों में बसे लोगों को जब उनके बच्चों की शादियां करनी थी तो लोगों ने मुझसे कहा कि सर आप टीचर हैं, कोई अच्छा सा लड़का देख लिजिए. मैं पूछता था कि कैसा लड़का चाहिए तो उनकी सबसे पहली मांग होती थी कि लड़का या लड़की उनकी जाति का होना चाहिए. मतलब देश छोड़ने के बाद भी उनकी मानसिकता नहीं बदली. जहां तक भेदभाव की बात है तो अगर सवर्ण समुदाय का कोई व्यक्ति किसी दलित के साथ एक टेबल पर खाना खाता है, तो जातीय भेदभाव खत्म हो गया, ऐसा नहीं है. क्योंकि उनके दिमाग से यह बात नहीं निकलती. विदेशों में भी दलितों का गुरुद्वारा अलग है.

आपकी जिंदगी में सबसे खुशी का वक्त कौन सा था. सबसे ज्यादा दुख कब हुआ?
- मेरे लिए इसका जवाब देना मुश्किल होगा. फिर भी जहां तक दुख की बात है तो मैने पहले ही कहा कि दलितों को हर वक्त अग्निपरीक्षा देनी होती है. सामने वाले को जैसे ही आपकी जाति का पता चलेगा, वो आपकी प्रतिभा और योग्यता पर शक करना शुरू कर देगा. सबसे अधिक खुशी तब हुई थी जब मेरी बड़ी बेटी अमेरिका गई थी और उसने मुझे वहां से फोन किया. मुझे याद है, उसने फोन पर कहा था ‘’पापा मैं इस वक्त दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश से बोल रही हूं’’. ऐसे में गुजरा हुआ वक्त याद आ जाता है. कहां से शुरुआत की थी. बच्चे कहां पहुंच गए. तो मेरी जिंदगी ऐसी ही खट्टी-मिठ्ठी है.

अगर आपको यह अधिकार दे दिया जाए कि आपको कोई एक काम करने की पूरी छूट है, तो आप क्या बदलना चाहेंगे?
- तब मैं कॉस्ट सिस्टम को खत्म करना चाहूंगा. दलित समाज के लोगों के लिए तो यह अभिशाप है हीं, यह हमारे देश को भी पीछे ले जा रहा है. जब मैं उच्च शिक्षा की बात करता हूं तो मैं तीन देशों के उदाहरण देता हूं. अमेरिका, चीन और जापान. अमेरिका जब स्वतंत्र हो गया तो उसे आगे बढ़ने में कई साल लगें. लेकिन वो नंबर वन हो गया. इसमें उच्च शिक्षा का बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन है. पीएचडी की डिग्री लेने वाले पहले अमेरिकी नागरिक ने अमेरिकन यूनिवर्सिटी से डिग्री नहीं ली थी बल्कि उसने जर्मन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ली थी. अमेरिका ने पढ़ाई के मामले में जर्मनी का खूब फायदा लिया. अमेरिकी ने अपने कई विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी भेजा. हम और जापान साथ-साथ चलें. 1945 में वहां लड़ाई खत्म हो गई. हम 1947 में आजाद हुए. दोनों ने साथ-साथ अपने विकास की यात्रा शुरू की. हम कई मामलों में उनसे आगे थे. हमारे पास जमीन थी, उनके पास नहीं थी. हमारे पास प्रकृति का सहारा था, उनके पास वो भी नहीं था. जनसंख्या के मामले में भी हम साथ थे लेकिन जापान आज विकसित देश है. हम अभी यह सोच रहे हैं कि हम 2030 में बनेंगे तो 2040 में बनेंगे.
लेकिन आप यह सोचिए की भारत विकसित देश क्यों नहीं बना? जब हम इस बात का विश्लेषण करते हैं तो हम पाते हैं कि जापान ने अपनी जनसंख्या को अपनी संपत्ति के रूप में इस्तेमाल किया. भारत ने यह नहीं किया. भारत में पूरी जनसंख्या के केवल 10-11 फीसदी लोगों को ही उच्च शिक्षा हासिल है. जापान में यह प्रतिशत 70-80 है. यूरोप में उच्च शिक्षा का प्रतिशत 45-50 है. केनेडा और अमेरिका में 80-90 फीसदी लोग उच्च शिक्षा लेते हैं. एक तथ्य यह भी है कि भारत में जो 10-11 फीसदी लोग उच्च शिक्षा हासिल करते हैं, उनमें दलितों की संख्या कितनी है? देश की पूरी आबादी का 25 फीसदी एससी/एसटी है. इनका विकास नहीं हो रहा है. देश तभी आगे बढ़ेगा जब दलितों को भी शिक्षा दी जाएगी. उन्हें आगे बढ़ाया जाएगा. 16 से 24 साल की उम्र कॉलेज की होती है. हमारे देश में इस उम्र वर्ग के केवल 10.4 फीसदी बच्चे ही कॉलेज में हैं. अगर आईआईटी जैसी जगहों पर एससी/एसटी के छात्र चले भी जाते हैं तो लोग उन्हें बर्दास्त नहीं कर पातें और डुबा देते हैं.

एजूकेशन सिस्टम में दलितों के पीछे छूट जाने से देश को क्या नुकसान हो रहा है?
- कभी दुनिया भर में होने वाले रिसर्च में भारत 9 फीसदी योगदान करता था. आज यह घटकर 2.3 फीसदी रह गया है. सबसे मजेदार बात यह है कि CSIR और DST जैसी जगहों पर कोई रिजर्वेशन नहीं है. अब अगर देश मे यूज होने वाली टेक्नोलाजी की बात करें तो तकरीबन सभी टेक्नोलॉजी इंपोर्टेड (आयात) है. इनमें 50 फीसदी टेक्नोलॉजी ऐसी है, जिसमें कोई बदलाव किए बगैर ज्यों का त्यों इस्तेमाल किया जाता है. बाकी 45 फीसदी टेक्नोलॉजी थोड़े से बदलाव (कॉस्मेटिक चेंज) के साथ इस्तेमाल होती है. तो इस तरह 95 फीसदी तकनीक, जिसका हम इस्तेमाल करते हैं वो इंपोर्टेड है. यानि की हम सिर्फ पांच फीसदी टेक्नोलाजी प्रोड्यूस करते हैं. (सवाल उठाते हुए कहते हैं कि) आखिर हमारे देश की प्रतिभा क्या पैदा कर रही है? आईआईटी वाले skill labour हैं. ये सब अमेरिका चले जाते हैं और फिर वहीं बस जाते हैं. इससे दोहरा नुकसान हो रहा है. इनसे अच्छे तो भारत से मजदूरी करने के लिए मिडिल ईस्ट की ओर जाने वाले मजदूर हैं. वो जितना कमाते हैं, उसका 80 फीसदी डालर देश को भेजते हैं. यूरोप में एक मीलियन पर 5-6 हजार वैज्ञानिक हैं. भारत में यह आंकड़ा 140 का है. और यह हैं कौन? (सवाल उठा कर थोड़ा रुकते हैं, फिर कहते हैं) देश आगे कैसे बढ़ेगा. देश का हित और भविष्य दलितों के हित और भविष्य में है. जब तक दलितों का विकास नहीं होगा, भारत विकसित देश नहीं बन पाएगा.

सर आपने इतना वक्त दिया धन्यवाद.
- धन्यवाद अशोक दास जी, धन्यवाद दलित मत
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प्रो. आर.के काले 'सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात' के कुलपति हैं. यह इंटरव्यूह दलित मुद्दों और खबरों पर केंद्रित वेबसाइट www.dalitmat.com से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.'दलित मत' से संपर्क के लिए आप ashok.dalitmat@gmail.com पर मेल कर सकते हैं या फिर 09711666056 पर फोन कर सकते हैं.
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