Friday, April 1, 2011

भारत में जाति की उत्पत्ति और उसका सच

मै सबसे पहले यह बता दूं की दुनिया में किसी भी समाज, व्यवस्था और धर्म का निर्माण किसी भी ईश्वर, अल्लाह या गॉड ने नहीं किया है. इससे साफ जाहिर होता है की जाति को भी ईश्वर ने नहीं बनाया है. दुनिया की सभी व्यवस्थाओं को मनुष्य ने बनाया है. यानि जाति की व्यवस्था को भी मनुष्य ने ही बनाया है. भारत में जाति की उत्पत्ति आर्यों के आगमन के बाद हुई. प्रत्येक कार्य और व्यवस्था के पीछे एक कारण और सम्बन्ध होता है. ऐसा ही सम्बन्ध जाति और उसकी व्यवस्था के पीछे है.

जाति व्यवस्था को आर्यों ने बनाया. यहाँ एक सवाल यह उठता है की आर्यों ने जाति व्यवस्था बनाई क्यों? और आर्य हैं कौन? यह सभी जानतें है की आर्य मध्य एशिया से भारत में आएं. आर्यों का मुख्य काम युद्ध और लूट-पाट करना था. आर्य बहुत ही हिंसक प्रवृत्ति के थे और युद्ध करने में बहुत माहिर थे. युद्ध का सारा साजो सामान हमेशा साथ रखते थे. अपने लूट-पाट के क्रम में ही आर्य भारत आए. उस समय भारत सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत समृद्ध था. इस समृद्धि का कारण भारतीय मूलनिवासियों की मेहनत थी. भारतीय मूलनिवासी बहुत मेहनती थे. अपनी मेहनत और उत्पादन क्षमता के बल पर ही उन्होंने सिन्धु घाटी सभ्यता जैसी महान सभ्यता विकसित की थी. कृषि कार्य के साथ-साथ अन्य व्यावसायिक काम भी भारत के मूलनिवासी करते थे. मूलनिवासी बेहद शांतिप्रिय, अहिंसक और स्वाभिमानी जीवन यापन करते थे. ये लोग काफी बहादुर और विलक्षण शारीरिक शक्ति वाले थे. बुद्धि में भी ये काफी विलक्षण थे. अपनी इस सारी खासियत के बावजूद ये अहिंसक थे और हथियारों आदि से दूर रहते थे. आर्यों ने भारत आगमन के साथ ही यहाँ के निवासियों को लूटा और इनके साथ मार-काट की. आर्यों ने उनके घर-द्वार, व्यापारिक प्रतिष्ठान, गाँव और शहर सब जला दिया. यहाँ के निवासियों के धार्मिक, सांस्कृतिक प्रतीकों को तोड़कर उनके स्थान पर अपने धार्मिक, सांस्कृतिक प्रतीक स्थापित कर दिया. मूलनिवासियों के उत्पादन के सभी साधनों पर अपना कब्जा जमा लिया. काम तो मूलनिवासी ही करते थे लेकिन जो उत्पादन होता था, उस पर अधिकार आर्यों का होता था.

धीरे-धीरे आर्यों का कब्जा यहां के समाज पर बढ़ता गया और वो मूलनिवासियों को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य करने की कोशिश करने लगे. बावजूद इसके मूलनिवासियो ने गुलामी स्वीकार नहीं की. बिना हथियार वो जब तक लड़ सकते थे, तब तक आर्यों से बहादुरी से लड़े. लेकिन अंततः आर्यों के हथियारों के सामने मूलनिवासियों को उनसे हारना पड़ा. आर्यों ने बलपूर्वक बड़ी क्रूरता और निर्ममता से मूलनिवासियों का दमन किया. दुनिया के इतिहास में जब भी कहीं कोई युद्ध या लूट-पाट होती है तो उसका सबसे पहला और आसान निशाना स्त्रियाँ होती हैं, इस युद्ध में भी ऐसा ही हुआ. आर्यों के दमन का सबसे ज्यादा खामियाजा मूलनिवासियों कि स्त्रियों को भुगातना पड़ा. आर्यों के क्रूर दमन से परास्त होने के बाद कुछ मूलनिवासी जंगलों में भाग गए. उन्होंने अपनी सभ्यता और संस्कृति को गुफाओं और कंदराओं में बचाए रखा. इन्हीं को आज ‘आदिवासी’ कहा जाता है. यह गलत रूप से प्रचारित किया जाता है कि आदिवासी हमेशा से जंगलों में रहते थे. असल में ऐसा नहीं है. आदिवासी हमेशा से जंगलों में नहीं रहते थे. बल्कि उन्हें अपनी सुविकसित संस्कृति से बहुत प्यार था, जिसे उन्होंने आर्यों से बचाने के लिए जंगलों में शरण ली थी. बाद में आर्यों ने झूठा प्रचार करके उन्हें हमेशा से जंगल में रहने वाला प्रचारित कर दिया और उनकी बस्तियों और संपत्ति पर कब्जा कर लिया था. जो मूलनिवासी भाग कर जंगल नही गए, उनसे घृणित से घृणित अमानवीय काम करवाए गए. मरे हुए जानवरों को रस्सी से बांधकर और उन्हें खींचकर बस्ती से बाहर ले जाना फिर उनकी खाल निकालना, आर्यों के घरों का मल-मूत्र साफ करना तथा उसे हाथ से टोकरी में भरकर सिर में रखकर बाहर फेंकना आदि काम मूलनिवासियों से आर्य करवाते थे. मूलनिवासी इन घृणित कामों से काफी परेशान थे. इसके खिलाफ मूलनिवासी संगठित होकर विद्रोह करने लगे. हालाँकि आर्यों कि लूट-पाट एवं मार-काट से सभी बिखर गए थे, फिर भी समय-समय पर संगठत होकर वे अपनी जीवटता और बहादुरी से आर्यों को चुनौती देते रहते थे.

इसके परिणामस्वरुप आर्यों और अनार्यों (मूलनिवासियों) के कई भयंकर युद्ध हुए. मूलनिवासियों के इस तरह के बार-बार संगठित विद्रोह से आर्य परेशान हो गए. तत्पश्चात आर्य इससे निपटने के लिए दूसरा उपाय ढूंढ़ने लगे. उत्पादन स्रोतों और साधनों पर हमेशा अपना कब्ज़ा बनाये रखने को लेकर वो षड्यंत्र करने लगे. इसके लिए आर्यों ने रणनीति के तहत मनगढंत धर्म, वेद, शास्त्र और पुराणों की रचना की. इन शास्त्रों में आर्यों ने यहाँ के मूलनिवासियों को अछूत, राक्षस, अमंगल और उनके दर्शन तक को अशुभ बता दिया. धर्म शास्त्रों में आर्यों का सबसे पहला वेद ‘ऋगुवेद’ है, जिसके 'पुरुष सूक्त' में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है. इसमें समाज व्यवस्था को चार वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में बांटा गया. पुरुष सूक्त में वर्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा नाम के मिथक (झूठ) के शरीर से हुई बताई गई. इसमें कहा गया कि ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मणों की, भुजाओं से क्षत्रियों की, पेट से वैश्यों की तथा पैर से शूद्रों की उत्पत्ति हुई है. इस व्यवस्था में सबके काम बांटे गए. आर्यों ने बड़ी होशियारी से अपने लिए वो काम निर्धारित किए, जिनसे वो समाज में प्रत्येक स्तर पर सबसे ऊंचाई पर बने रहें और उन्हें कोई काम न करना पड़े. आर्यों ने इस व्यवस्था के पक्ष में यह तर्क दिया कि चूंकि ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ है इसलिए ब्राह्मण का काम ज्ञान हासिल करना और उपदेश देना है. उपदेश से उनका मतलब सबको सिर्फ आदेश देने से था. क्षत्रिय का काम रक्षा करना, वैश्य का काम व्यवसाय करना तथा शूद्रों का काम इन सबकी सेवा करना था. क्योंकि इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से हुई है. इस प्रकार आर्यों ने शूद्रों को पीढ़ी दर पीढ़ी सिर्फ नौकर बनाये रखने के लिए वर्ण व्यवस्था बना लिया.

इस प्रकार आर्यों ने अपने आपको सत्ता और शीर्ष पर बनाए रखने के लिए अपने हक में एक उर्ध्वाधर (खड़ी) समाज व्यवस्था का निर्माण किया. समाज संचालन और उसमें अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए समाज के प्रत्येक महत्वपूर्ण संस्थान जैसे शिक्षा और व्यवस्था पर अपने अधिकार को कानूनी जामा पहना कर अपना अधिकार कर लिया. वर्ण व्यवस्था को स्थाई और सर्वमान्य बनाने के लिए आर्यों ने झूठा प्रचार किया कि वेदों कि रचना ईश्वर ने की है और ये वर्ण व्यवस्था भी ईश्वर ने बनाई है. इसलिए इसको बदला नहीं जा सकता है. जो इसे बदलने की कोशिश करेगा भगवान उसको दंड देंगे तथा वह मरने के बाद नरक में जाएगा. आयों ने प्रचार किया की जो इस इश्वरीकृत व्यवस्था को मानेगा वह स्वर्ग में जाएगा. इस प्रकार मूलनिवासियो को ईश्वर, स्वर्ग और नरक का लोभ एवं भय दिखाकर अमानवीय एवं भेदभावपूर्ण वर्ण व्यवस्था को मानने के लिए बाध्य किया गया. मूलनिवासी अनार्यों ने इस अन्यायपूर्ण सामाजिक विधान को मानने से इंकार कर दिया. तत्पश्चात वर्ण व्यवस्था मृतप्राय हो गई और आर्यों की शक्ति और प्रभाव कमजोर होने लगा.

अपनी कमजोर स्थिति को देखकर मनु नाम के आर्य ने 'मनुस्मृति' नामक एक और सामाजिक विधान की रचना की. इस विधान में वर्ण व्यवस्था की श्रेणीबद्धता को बनाए रखते हुए एक कदम और आगे बढ़कर वर्ण में जाति और गोत्र की व्यवस्था बनाई. यानि मनु ने एक वर्ण के अन्दर अनेक जातियां बनाई और गोत्र के आधार पर उनमे उनमे उच्च से निम्न का पदानुक्रम निर्धारित किया गया, जिससे जातियों के भीतर उच्च और नीच की भावना का जन्म हुआ. मनु ने यह बताया कि चार वर्णों में से किसी भी वर्ण कि कोई भी जाति अपने से नीचे वर्ण कि जाति में कोई रक्त सम्बन्ध यानि शादी विवाह नहीं करेंगे अन्यथा वह अपवित्र और अशुद्ध हो जाएगा. सिर्फ समान वर्ण वाले ही आपस में रोटी-बेटी का रिश्ता कर सकते हैं . लेकिन मनु ने यहां भी चलाकी दिखलाई. उसने इस नियम को ब्राह्मणों के लिए लागू नहीं किया. ब्राह्मणों को इसकी छूट दी गई कि एक निम्न गोत्र का ब्राह्मण उच्च गोत्र के ब्राह्मण के यहाँ रोटी-बेटी का रिश्ता कर सकता था. इस तरह ब्राह्मणों की आपस में सामूहिक एकता बनी रही. यही नियम क्षत्रिय वर्ण में भी लागू रखा गया, जिससे क्षत्रिय भी एकजुट रहें. वैश्य में यह नियम लागू नहीं हुआ, जिसका परिणाम यह हुआ कि ये आपस में एकजुट नहीं हो सके और उच्च-नीच की भावना के कारण बिखरते रहे.

ऋगुवैदिक वर्ण व्यवस्था में जिसमें सभी मूलनिवासियों को रखा गया था. इसलिए उनमे सामुदिक भावना थी. वो अक्सर संगठित होकर आर्यों की वर्ण व्यवस्था और अमानवीय शोषण का विरोध करते रहते थे. मनु ने मूलनिवासियों की संगठन शक्ति को कमजोर करने के लिए नई चाल चली. उसने मनुस्मृति नामक वर्ण व्यवस्था के नए विधान में शूद्र वर्ण को जातीय पदानुक्रम के साथ-साथ दो जातीय समुदायों में बाँट दिया. शूद्र, समाज की सीढ़ी नुमा वर्ण व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर था इसलिए इस वर्ण की जातियों को अछूत भी कहा गया था. ऋगुवैदिक वर्ण व्यवस्था में तो इनसे जबरदस्ती गंदे और अमानवीय काम करवाए जाते थे इसलिए इनको अन्य वर्णों के लोग छूते नहीं थे अर्थात वहां पर कर्म के कारण मूलनिवासियों की स्थिति निम्न थी लेकिन आर्यों ने इस स्थति को स्थिरता प्रदान करने के किए शास्त्रों में पुनर्जन्म के सिद्धांत की रचना की और मनु ने सभी मूलनिवासियों को जिन्हें आर्यों ने अछूत बनाया था को कमजोर, अछूत और गुलाम बनाए रखने के लिए वर्ण व्यवस्था को जाति व्यवस्था में बदल दिया. इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आर्यों ने समय-समय पर झूठे और आधारहीन धर्मंशास्त्र लिखें. आर्य भारत में मुग़लों के आने के बाद अपने आपको हिन्दू कहने लगे थे ताकि इससे उनके भारतीय मूलनिवासी होने का बोध हो. इस तरह भारत में जाति पैदा करने का श्रेय वर्तमान हिन्दुओं के पुरखों को जाता है. मनु की जाति व्यवस्था में जातियों की जनन क्षमता इतनी अधिक है कि आज जातियों की संख्या हजारों में पहुँच गई है और जाति का यह रोग भारत की सीमाएं लांघकर अमेरिका और ब्रिटेन तक पहुँच गया है.
Written by अरुण कुमार प्रियम
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लेखक दिल्ली विश्व विद्यालय में पीएचडी (शोध) के छात्र हैं और दलितों से जुड़े विषयों पर अक्सर लिखते रहते हैं. आप उनसे संपर्क करने के लिए उन्हें akpriyam@gmail.com पर मेल कर सकते हैं या उनके मोबाइल नंबर 09560713852 पर फोन कर सकते हैं.
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41 comments:

  1. जाति की उत्पत्ति और उसका सच
    Bahut hi sunder lekh

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  2. महोदय,
    आपका कहना कि // यह सभी जानतें है की आर्य मध्य एशिया से भारत में आएं// गलत है | इसके अलावा भी आपने सब अपने मन से जो चाहा लिख दिया | कृपया तथ्य विस्तार से देकर लिखें |
    इन Links को पढें एवं फिर से रिसर्च करें
    1. http://www.dnaindia.com/india/1623744/report-new-research-debunks-aryan-invasion-theory
    2. http://indiatoday.intoday.in/story/indians-are-not-descendants-of-aryans-study/1/163645.html
    3.http://www.uwf.edu/lgoel/documents/AMythofAryanInvasionsofIndia.pdf
    4. http://www.pravakta.com/aryans-were-the-original-inhabitants-of-india
    5.http://hindi.webdunia.com/religion-sanatandharma-article/%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A3-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA-1100614081_1.htm

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    1. ओ सभी आर्यो की है।
      उसमे हम विस्वास नही कर सकते

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  3. कृपया इसे भी देखें
    http://www.hitxp.com/articles/history/myth-aryan-invasion-theory/

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  4. एस० पी० मालिक के पुस्तक इन्डियन सिविलाईजेशन :दी फर्मेटीव पीरीएड में पृष्ठ 59 ,के अनुसार जाति व्यवस्था का आरम्भ आर्यों के आगमन से पूर्व हड़प्पा कालीन संस्कृति में ही हो चूका था |

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  5. एकदम सही कहा,, में पूरी तरह से सहमत हु....की आर्य विदेशी थे .... लुटेरे थे.... सभी धर्म ग्रंथ जूते.... Watch a Movie Teesari azadi.....and Sudra the Rising..

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    1. arya log videshi the, yah ek galat theory h, jo angrejo ne banai h taki bhartiyo ka atma-visvas kasjor pare.

      arya log sudh log hote h, jo kewal bharat varsh(aaj ka iran irak arab sahit bharat chin ke kuch bhag aadi) me hi rahte the, arya jati bharat se hi janami h.

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  6. यह जिस चुतिए का लेख है उसने कहाँ से पढा, इस हरामी को सबसे पहले अपने बाप पर रिसर्च करना चाहिए,की उसके अंदर इतनी विद्ववता कैसे आई इसे पैदा करने मे किन किन जातियों का योगदान है

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    1. किसी की बात का प्रतिउत्तर देने में भी विनम्रता होनी चाहिए। तुम्हारी उग्रता बताती है कि ये सब सच है और अगर नहीं है तो अपनी बात सबूतों के साथ रखो और बहस करो।

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    2. आर्यों की सच्चाई एवं बास्तविकता जानकर सच को झूटा बताने बाले, अपशव्दों का उपयोग करने बाले सज्जन मर्यादा मे रहकर अपनी बात रखो माना कि तुम भारत मे 10% लोग कूट नीति मे माहिर हो तभी तो 90% लोग मूर्ख बने बैठे है । राजनीति के लोग केवल वोट बैंक कि राजनीति के लिए ही SC/ST/OBC का उपयोग कर रहे हो ।
      याद रखो कि हमारी माँ, बेटी , बहन एवं बहुओं नारी को भारतरत्न डॉ भीम राव अंबेडकर जी द्वारा रचित संबिधान ने समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, संपत्ति का अधिकार देकर जो सम्मान दिया है जबकि आप लोग कहते थे यह : -
      ''ढोल गवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी''
      लेकिन देश के सच्चे सपूत एवं महिला एवं पिछड़ो SC/ST/OBC के तारण हार भारत रत्न डॉ बाबासाहव भीम राव अंबेडकर जी ने इस कहावत एवं दोहे को झुटलाते हुये सभी के हितों को ध्यान मे रख संबिधान वनाया है । यदि हमारी मटाए एवं बहनो को सच्चाई मालूम पड़ जाय तो वीएच खुद कहेंगी कि इन आर्यों ने तो हमे केवल गुलाम बना रखा था अव हम देश मे सम्मान से जी रहे है उसमे देश के पिछड़ों के देव तुल्य अंबेडकर जी है ।

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    3. सोच बदलो साथियों जातिवाद खत्म करो और देश मे केवल भारतीयता जाती मान रहो एंसा मेरा मानना है ।
      हम सभी भारत वासी है- जय हिन्द जय भारत जय भारतीयता

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    4. तुम्हारी पीड़ा बता रही है कि यह सत्य है हमे अंग्रेजो मुसलमानो ने नही हिन्दू ब्राम्हण आर्यो ने रुलाया है।हमे इंसान ही नही समझते ही।
      सच्चा दलित आदिवासी कभी भी खुद को हिन्दू नही मानेगा कयोकि अत्याचार की पीड़ा आज भी हमे देखने को मिलती है।
      लोग मूर्ख नही है जो तुम्हारे काल्पनिक ईश्वर को माने।
      और सुन लो जो तुम्हारे ईश्वर ने इंसानो में भेदभाव किआ उस ईश्वर का कोई अस्तित्व नही है।
      पर्दाफास हो गया है तुम्हारा

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  7. वर्ण व्यवस्था ही अधोगती का मूल कारण है,

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  8. वर्ण व्यवस्था ही अधोगती का मूल कारण है,

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    1. लेख हैं या मजाक, आपकी तरह मैं भी एक दलित हूँ, पर आपके कथनों पर यकीन करने वाली कोई बात नहीं है ।
      एक तरफ आर्यों को विदेशी मानते है, दुसरी तरफ सिन्धु सभ्यता का जिक्र भी करते हैं तथा कहते है कि आर्यों के आगमन के पहले ये सभ्यता विकसित थी तो फिर आप बताइये कि खनन मे मिले तमाम देवी देवताओं के मूर्तियां कैसे पाई गई जिसकी पूजा आर्य अभी तक कर रहे हैं ?
      आर्य कोई विदेशी नहीं है व दलित भी कोई अनार्य नहीं है। व वेदों में जातिवाद के विषय में केवल कर्म विवरण बताई गई हैं, वो भी सिर्फ चार वर्गों में, कि कौन सा कार्य करने वालों को क्या नाम दिया जाए। इसके बाद जितने भी ग्रंथ है सभी मुगल व अंग्रेजों द्वारा अपभ्रंश किया हुआ है, वेद सुरक्षित रह गया क्योंकि ये देव संस्कृत यानी जटिल भाषा में लिखा हुआ था।
      जब इस जातिवाद पर आप शोध कर रहे हो तो इसे जारी रखे, आपको पता चलेगा की प्रचिन इतिहास में वर्ण गुरुकुलों में छात्रों के योग्यता के अनुसार प्रदान की जाती थी, तथा वर्ण बदलते की स्वतंत्रता भी थी परन्तु इसके लिए सम्बन्धित कर्म में पारन्गत होने के सबित के रूप में साक्षात्कार देना होता था,। इस बात के कई सबुत भी है, जैसे चन्द्रगुप्त मौर्य जो छति्य नहीं थे फिर भी चाणक्य ने इसकी योग्यता पहचान उसे क्षत्रिय वर्ण प्रदान किया।
      अब रही मूल निवासियों की बात तो मैं आपको बता दूँ की अमेरिका में एक जनजाति पाईं जाती हैं जिसके गुण सूत्र जाँच करने के बाद वैज्ञानिकों इन्हें भारत के कुछ आदिवासियों के वंशज होने की बात कही है, अब आप ही बताइये की ऐसे लोगों को कैसे एक स्थान विशेष का मूलनिवासी कहा जा सकता है।

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    2. आप दलित नही है आप शर्मा है।
      औऱ सिंधुघाटी को छोड़िये जो दलित है उन्हें पता है।
      क्योकि आज भी उसके साक्ष्य देखने को मिलता है।
      छुआछूत के बारे में सुने होंगे और कौन करता है छुआछूत जानते भी होंगे

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  11. ये जरूर किसी मुल्ले की चाल है ,,,वही बेचारे दलितों को भडकाते हैं वेदों में ऊं नीच को कर्म से जोडा गया है जन्म से नहीं जैसे बाल्मीकी ने रामायण लिखी जो दलित थे ;;राम ने शबरी के झुठे बेर खाये जो दलित थी ,,,अरब से आये मुल्ले दलितों को बहका कर अपने में मिला लेते है जो बहकावे में नहीं आते उन्हे मार काट देते है याद रखो सबसे अच्छा सबसे सच्चा और सबसे महान वैदिक धर्म है ,,,,और रही ऊँच नीच की बात वो किस धर्म में नही है या किस देश मे नहीं है ये सदा रही है सदा रहेगी,,,और इंसान ऊँचा नीचा कर्म से होता है जन्म से नहींं उदाहरण के तौर पर आज भी कितने ही दलित बडी पोस्टों पर है अपने कर्मो के दम पर ,,,वैदीक ज्ञान ही सबसे महान है उसमें ही जीवन को बारीकी से समझाया गया है इसलिए भारत इतना खुशहाल था मुल्लो के आने से पहले ,,,मुस्लिम धर्म मे समानता और भाई चारा सिर्फ बोलने की बात मुस्लिम देशो की दुर्गती देखो सब समझ आ जायेगा

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    1. Walmeke kes jat se ata tha

      Aur kon th






















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    2. Walmeke kes jat se ata tha

      Aur kon th






















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  12. आप जानकार हैरान हो सकते हैं कि भारत में जिस जाति चमार बोला जाता है वो असल में चंवरवंश की क्षत्रिय जाति है। यह खुलासा डॉक्टर विजय सोनकर की पुस्तक – “हिन्दू चर्ममारी जाति:एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास” में हुआ है। इस किताब में डॉ सोनकर ने लिखा है कि – “विदेशी विद्वान् कर्नल टॉड द्वारा पुस्तक “राजस्थान का इतिहास” में चंवरवंश के बारे में बहुत विस्तार में लिखा गया है।” डॉ सोनकर बताते हैं कि – “इतना ही नहीं बल्कि महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस वंश का उल्लेख है। हिन्दू वर्ण व्यवस्था को क्रूर और भेद-भाव बनाने वाले हिन्दू नहीं, बल्कि विदेशी आक्रमणकारी थे!” जब भारत पर तुर्कियों का राज था, उस सदी में इस वंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था, उस समय उनके प्रतापी राजा थे चंवर सेन। इस राज परिवार के वैवाहिक सम्बन्ध बप्पा रावल के वंश के साथ थे। राणा सांगा और उनकी पत्नी झाली रानी ने संत रैदासजी जो कि चंवरवंश के थे, उनको मेवाड़ का राजगुरु बनाया था। वे चित्तोड़ के किले में बाकायदा प्रार्थना करते थे। इस तरह आज के समाज में जिन्हें चमार बुलाया जाता है, उनका इतिहास में कहीं भी उल्लेख नहीं है। डॉक्टर विजय सोनकर के अनुसार प्राचीनकाल में ना तो यह शब्द पाया जाता है, ना हीं इस नाम की कोई जाति है। ऋग्वेद में बुनकरों का उल्लेख तो है, पर वहाँ भी उन्हें चमार नहीं बल्कि तुतुवाय के नाम से सम्बोधित किया गया है। सोनकर कहते हैं कि चमार शब्द का उपयोग पहली बार सिकंदर लोदी ने किया था। ये वो समय था जब हिन्दू संत रविदास का चमत्कार बढ़ने लगा था अत: मुगल शासन घबरा गया। सिकंदर लोदी ने सदना कसाई को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा। वह जानता था कि यदि संत रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गई, स्वयं सदना कसाई शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सके और संत रविदास की भक्ति से प्रभावित होकर उनका भक्त यानी वैष्णव (हिन्दू) हो गए। उनका नाम सदना कसाई से रामदास हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए। जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी ने क्रोधित होकर इनके अनुयायियों को अपमानित करने के लिए पहली बार “चमार“ शब्द का उपयोग किया था। उन्होंने संत रविदास को कारावास में डाल दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जूती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया। उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए गए लेकिन उन्होंने कहा :- ”वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान, फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान। वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार, तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार॥” यातनायें सहने के पश्चात् भी वे अपने वैदिक धर्म पर अडिग रहे और अपने अनुयायियों को विधर्मी होने से बचा लिया। ऐसे थे हमारे महान संत रविदास जिन्होंने धर्म, देश रक्षार्थ सारा जीवन लगा दिया। शीघ्र ही चंवरवंश के वीरों ने दिल्ली को घेर लिया और सिकन्दर लोदी को संत को छोड़ना ही पड़ा। संत रविदास की मृत्यु चैत्र शुक्ल चतुर्दशी विक्रम संवत १५८४ रविवार के दिन चित्तौड़ में हुई। वे आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी स्मृति आज भी हमें उनके आदर्शो पर चलने हेतु प्रेरित करती है, आज भी उनका जीवन हमारे समाज के लिए प्रासंगिक है। हमें यह ध्यान रखना होगा की आज के छह सौ वर्ष पहले चमार जाती थी ही नहीं। इतने ज़ुल्म सहने के बाद भी इस वंश के हिन्दुओं ने धर्म और राष्ट्र हित को नहीं त्यागा, गलती हमारे भारतीय समाज में है। आज भारतीय अपने से ज्यादा भरोसा वामपंथियों और अंग्रेजों के लेखन पर करते हैं, उनके कहे झूठ के चलते बस आपस में ही लड़ते रहते हैं। हिन्दू समाज को ऐसे सलीमशाही जूतियाँ चाटने वाले इतिहासकारों और इनके द्वारा फैलाए गये वैमनस्य से अवगत होकर ऊपर उठाना चाहिए l सत्य तो यह है कि आज हिन्दू समाज अगर कायम है, तो उसमें बहुत बड़ा बलिदान इस वंश के वीरों का है। जिन्होंने नीचे काम करना स्वीकार किया, पर इस्लाम नहीं अपनाया। उस समय या तो आप इस्लाम को अपना सकते थे, या मौत को गले लगा सकते था, अपने जनपद/प्रदेश से भाग सकते थे, या फिर आप वो काम करने को हामी भर सकते थे जो अन्य लोग नहीं करना चाहते थे। चंवर वंश के इन वीरों ने पद्दलित होना स्वीकार किया, धर्म बचाने हेतु सुवर पलना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है। नोट :- हिन्दू समाज में छुआ-छूत, भेद-भाव, ऊँच-नीच का भाव था ही नहीं, ये सब कुरीतियाँ मुगल कालीन, अंग्रेज कालीन और भाड़े के वामपंथी व् हिन्दू विरोधी इतिहासकारों की देन है।

    Read more at: http://hindi.revoltpress.com/history/its-chanvar-the-great-kshatriyas-not-chamar/

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    1. Suji Baba आप बड़े महान ज्ञानी इतिहासकर हैं आपको हाथ जोड़कर नमस्कार आपका ज्ञान थोड़ा बड़ा दुआप को पता चल गया की आज के चमार पहले के छत्रिय यानी राजपूत हैं ओर छत्रियो को सूद्र मुगलो ने बनाया था आप के कहे अनुसार सूद्र वर्ण पहले हिन्दुओ में नहीं था आप को रामायण काल में लेकर चलते हैं जहाँ भगवान राम और लक्ष्मन वन में सबरी जोकि एक सूद्र स्त्री थी के जूठे बेर रामजी ने तो खालिये थे मगर लक्ष्मन जी ने नही खाये थे इस लेख से पता चलता हैं की सूद्र वर्ण हिन्दुओ में पहले से था और जीतने भी जुल्म और अत्याचार आप हम पर मुगलों दुवारा बता रहे हो ये सारे जुल्म और अत्यचार आप दुवारा ढाये गए हैं

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  13. आर्य अपनी विदेशी होना उजागर होने से, से डरे हुए हैं, Ichr ने आर्यों को भारत के मूल निवासी मानने से मना किया हैं, हम विश्वविद्यालय के पुस्तकों में पढ़ते हैं कि, आर्य अक्रामणकारी हैं, तो ऐ भारत के मूल निवासी कैसे हो सकते हैं, 21june 2001मे छप्पे DNA reportके अनुसार भी आर्य विदेशी है, DNA झूठ नहीं बोलता। जय मुलनिवासी

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  14. मैंने इन्टरनेट पर कई तरह के लेख पढ़े। डीएनए, विकिपीडिआ, अग्निवीर, डॉ. विजय सोनकर के लेख आदि को पढ़ा और इन सब में एक ही बात निहित है कि स्वर्णो ने दलितों पर अत्याचार किये है और खुद को बचाने के लिए झूठे वेदों ग्रंथो और धर्म जाति आदि का निर्माण किया। मेरा सभी ज्ञानवान लोगो से अनुरोध है कि मूर्ति पूजा छोड़ के उस असीम शक्ति का ध्यान करे जो इस पूरे ब्रम्हांड को चला रही है।

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    2. maine aaj tak jo bhi apne vivek se jana hai uske anusar arun ne jo bhi likha hai wah sahi hai. itihas sakshi hai ki har samaj me kuch log aise rahe hain jo prabhta ki echha rakhte the aaj bhi aise logo ko saralta se har gali aur muhallo me dekha ja sakta hai. prachin kaal me bhi aise log the aur unhone apani prabhuta ko banaye rakhe ke liye yath sambhaw pyatn kiya aur wo esme puri tarha safal bhi hue. wastav me eswar kisi vyakti ka nam nahi. yeh eswar nam bhi logo ne hi uska rakha hai. yeh urja ka athah sagar hai jisase yeh pura brahmand nirmit hua hai. ye suraj, chand, nadiya, pahad, ped-paudhe, jeev-jantu aur manusya usi urja se nirmit hain. manusya ne hi in sabhi prakrik tatvo ka nam karan kiya hai. udahran swaroop kisi kute se kabhi hamne poocha hai ki tum kaun ho? nahi hamne sirf us jeev ka apne hisab se nam karan kiya hai. esase spasht hota hai ki insan ne hi sabhi ko apne vivek ke adhar par jana aur pahchana hai. aur apni suvidha ke anusar sabhi chijo ko toda aur maroda hai. kintu prakri (eswar) ke liye sabhi jeev-jant, vanasptiyan aur manusya aadi saman hain. uski kripa sab par ek jaisi hai. varsha sab par ek saman hai. dhoop, chanw aadi sab par ek saman hai. par yeh baaten prabhuta pasand logo ko na kabhi pasand aayi na eswar ke ye sanket samajh aaye. unhone jaise bhi ban pada logo ko apne neeche lane ki koshis kiya. khair ye bhi prakrik saty hai aaj upar hai weh kal neeche aayega. kal jo upar tha aaj usko neeche aana hi hoga. yahi eswar ka nyay aur prkriti ki marji hai. eske liye cheekhne chillane se kuchh nahi hone wala hai. agar aap chahte ho ki prachin kal ki taraha aaj bhi aapko bhojan mile to bhram se bahar aa jao. wah din door nahi jab devi-devtaon aur mandiro ke nam pe muft ka bhojan udane walo ko bhikshavritti karni pade aur phir bhi kuchh nahi milega. mera un tathkathit logo ko sujhaw hai ki apne poorwajon ki tarha andhe na bane aur na hi prabhuta pasand bane.

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  15. kripya koi mujhe bataye ki yaha par hindi kaise likhte hai

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  16. हे वीर मूल निवासी... आर्य नियम बनाते गए और मूल निवासी मानते गये.... और किस ऋग्वेद को पढ़ा है मूल निवासी आपने.. अगर जैसा आपने बताया कि आक्रमण कारी आए और मूल निवासियों को चमार बना दिया....तो भैया आक्रमण करने कोई पूरा देश तो आया नही होगा और यहाँ तो पूरा देश रहा होगा वीरों से भरा.... दूसरी बात - वर्ण व्यवस्था वैदिक नहीं है और मनु स्मृति सामाजिक व्यवस्था को बताता है.... अगर आप का कहना है कि गंदे लोगों को सिर पर बिठाना चाहिए तो आप मुर्ख हैं..... वर्ण व्यवस्था कार्य और व्यवहार के अनुरूप बनायी गयी जिसने बाद में वंशानुगत रूप ले लिया....... क्यूंकि अगर बाप गन्दा रहेगा तो बेटा तो रहेगा ही....... और आप पेरियार को मानने वाले अपने देश की असली संस्कृति को भूल गए.... हे वीर आपके अनुसार पहले आपकी आर्यों ने मारी फिर मुगलों ने और उसके बाद अंग्रेजों ने....
    मनगढ़ंत किस्से बनाते रहो और दलितों का मन बहलाते रहो...
    कम से कम उन्हे अपने पूर्वजों के पराक्रम का पता तो चलेगा

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    1. मनगढ़ंत नही है सत्य है लेकिन कड़वा है।
      छुआछूत तुम्ही लोग करते हो।आज भी करते हो।
      गन्दे तुम लोग हो

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    2. वो कौन से खानाबदोश और लुटेरे आर्य थे मित्र जो वेदों को साथ में लेकर लूटपाट करते थे, साथ ही उनको सभ्य भी मानते हो,

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  18. मुझे ऐक बात समझ में नही आती वो ये है,उत्तर भारत यानी महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, हरीयाना, पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, ऊत्तरप्रदेश, बिहार में लिखी और बोले जाने वाली भाषा में कुछ समानता क्यो है. और कर्नाटक, केरल, तामिलनाडू, आंन्धप्रदेश, ओरीसा में लिखी और बोले जाने वाली भाषा में कुछ समानता क्यों है. ईसका मतलब क्या हो सकता है. क्या ईसका ये मतलब है के आर्य बाहारसे आये हुऐ लोग जिनकी भाषा संस्कृत है ऊस संस्कृत से जन्मी हुयी भाषा हिंदी, गुजराती, मराठी,बिहारी और उत्तर भारत मे कुछ और भाषा है. ईन भाषा में लिखे जाने वाले अक्षर अ आ से शुरू होते है . मराठी, गुजराती, हिंन्दी और उत्तर भारतकी बाकी भाषा मे कुछ बहोतसे शब्द जैसे के वैसैही बोले जाते है. दक्षिण भारत मे कर्नाटक, तामिलनाडू, केरल, आंन्धप्रदेश, ओरीसा मे लिखी और बोले जाने वाली भाषा का ऊगम द्रविड भाषा से हुआ है. तो ईस हिसाब से तो संस्कृत और द्रविड ये दोनो भाषा अलग है. संस्कृत से संबंधीत भाषा के लोग ऊत्त्तर भारत और द्रविड से संबंधीत लोग दक्षिण भारत मे क्यो रहते है. ईसका मतलब साफ साफ है के दक्षिण भारत मे रहने वाले ये लोग ऊत्त्तर भारत में रहने वाले लोगोंसे पहले यहा रहते है. और हम बाद में रहने आये है. आप आर्य को बाहरी कहते हो और बाकी लोगोको मुल निवासी (आदीवासी) कहते हो. हमसे पहले मुल निवासी तो द्रविड लोग है. हम सब संस्कृत भाषा से जुडे हुये लोग बाहरी ही है.

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  19. सत्य हमेसा सत्य रहेगा। आर्य ब्राम्हण विदेसी है

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  20. मित्र मूल लेख के लेखक जी,
    सादर जय भीम-लाल सलाम।
    बहुत ही अफ़सोश की बात है कि आप एक रिसर्च स्कॉलर है; तो आप को यह पता होना चाहिए कि जब भी कोई विचारधारा प्रतिस्थापित करें, तो उनके पीछे के तर्कों और साक्ष्यों को तो रखें ही, साथ ही साथ साक्ष्यों के सन्दर्भ देना न भूलें। बिना साक्ष्य के आप की प्रतिस्थापना झूठा ही साबित होगा अथवा एक कपोल कल्पित कहानी। आप ने आर्यों की स्थापना की लेकिन साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। आप ने मूलनिवासियों की प्रस्थापना की लेकिन साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। आप ने लिखा है कि आर्यों के पास हथियार थे और उन्होंने मारा-काटा, लूटा और मूलनिवासियों को गुलाम बना लिया। ये आक्रमण वाली बात सिद्ध करने के लिए आप के पास क्या साक्ष्य हैं? किन इतिहासकारों या पुरातत्ववेत्ताओं को उल्लिखित करेंगे? आर्य जब इतने सुसंस्कृत और संपन्न थे, तो निश्चित उनका देश संपन्न रहा होगा। आप के पास उस देश व प्रान्त में ऐसा कुछ होने का प्रमाण है क्या? वेद-पुराण, वर्ण-व्यवस्था और जातिवाद उनके मूल देश में भी होना चाहिए परन्तु हमारे दलित फिलॉफरों और स्कॉलरों ने अभी तक यूरेशिया व यूरोप से कोई साक्ष्य क्यों नहीं प्राप्त किया? सिंधु सभ्यता उस समय की उन्नत सभ्यता थी, तो उनके हथियार भी उन्नत रहे होंगे। यह तो साक्ष्य है। उत्खनन से जो साक्ष्य प्राप्त हुए हैं वह स्तर सिर्फ मेसोपोटामिया का था। मेसोपोटामिया से सिंधु सभ्यता मिलती है। कंकालों से यह प्रमणित है कि आदि द्रविड़ ऑस्ट्रेलायड, भूमध्य सागरीय, मंगोलीय और अल्पाइन लोग थे जो कालान्तर में सिंधु में बस गए थे। इन जातियों के बसने के बाद द्रविड़ जातियां आक्रमणकारी की स्थिति में सिंधु में आई थी किन्तु संख्याबल कम होने के कारण उन्हें सिंधु सभ्यता के अंतर्गत समाहित कर लिया। सिंधु में मूलतः कोई प्रजाति पाई ही नहीं गई थी। सिंधु में आने वाले सभी प्रवासी थे। सिंधु सभ्यता के ध्वस्त होने के बाद बची-खुची जातियों ने पुनः जीवन को संचालित करते-करते एक नई सभ्यता तक पहुंचे। उनकी एक भाषा विक्सित हुई। उस भाषा को बोलने वाले सभी आर्य कहलाए।

    दलित जातियां जओ अपने को मूलनिवासी कहती है वे आर्य जातियां हैं। और यदि मूल में जाय जाय, तो मूलनिवासी कही जाने वाली जातियां आक्रमणकारी जातियां हैं। और मूल में जाया जाय तो सब के सब प्रवासी हैं।

    मूलनिवासी जैसी विचारधारा की प्रस्थापना वाले दलितों को अपने मशीहा डा.आम्बेडकर की पुस्तक "शूद्र कौन थे" का अध्ययन कर लेना चाहिए, सभी बातें स्पष्ट हो जाएंगी, लेकिन दलित गुमराह सर्ग है, इसके पीछे कोई नस्लवादी ब्रेन लगा हुआ है जो इन क्रांतिकारी जातियों, सर्वहारा जातियों को वैज्ञानिक इतिहासबोध और क्रान्ति से महरूम कर रहा है। ये आरोप इसलिए सिद्ध है कि मूलनिवासी की संकल्पना को मानने वाला कोई भी दलित डा.आम्बेडकर किंपुस्तकों को नहीं पढ़ता है सभी बातें मनगढ़ंत लिखता रहता है।

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  21. Chamaro ki utpati kab huee musalmano ke akraman ke baad .uske pahle to bhart me gost ka karya nahi kiya jata tha. Kya kewal chamar hee dalit hai ,aur gond ,baiga anya jatiya kon hai ye hai bharat ke mool niwasi samjhe chamaro ,muglo ki aulado des me rahna hai to devi ,devtao ki Pooja karo kyoki gond raja bhi shiv bhawan ki Pooja karte the .nahi to nast ho jaoge mullo ki aulado ....king of gondwana bharat ke moolwasi

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