Thursday, May 14, 2009

देश को जरूरत दलित थेरपी की

उत्तर भारत में एक परंपरा है। परंपरा के अनुसार शादियों के अवसर पर सवर्ण परिवार सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं। परिवार के सदस्य की मृत्यु के अवसर पर भी सामूहिक भोज का आयोजन होता है, जहां गांव के हर परिवार से कम से कम एक व्यक्ति भोजन के लिए आमंत्रित होता है। दलित भी इस निमंत्रण में शामिल किए जाते हैं।
अभी हाल में अमेरिका स्थित विश्व प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया से संबद्ध सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया ने यूपी के 20 हजार दलित परिवारों का सर्वे करवाया। सर्वे का फोकस था : 1990-2007 के दौरान दलितों की खानपान की आदतों, लाइफ स्टाइल और नौकरीपेशा में क्या परिवर्तन आया। इसमें दलित परिवारों से 80 सवाल पूछे गए। एक सवाल यह था कि 'क्या सवर्णों द्वारा आयोजित सामूहिक भोजों में आपको अलग पंक्ति में बिठा कर खाना खिलाया जाता था? कुल 75.2 प्रतिशत परिवारों ने कहा 'हां'। यानी, ग्रामीण यूपी में पैदा हुए 40 वर्ष के दलितों के तीन-चौथाई हिस्से ने अपने जीवनकाल में कभी न कभी अलग पंक्ति में बैठकर भोजन किया होगा।
यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक सवाल यह भी पूछा कि 1990 के आसपास सवर्णों के मृत जानवरों को कौन उठाता था? 39.9 प्रतिशत दलितों ने कहा कि 'केवल दलित'। दस वर्ष और पीछे जाकर यह सवाल पूछा गया होता, तो उत्तर शायद यह होता- 'केवल दलित'। यानी तब यह प्रतिशत सौ फीसदी होता। ग्रामीण भारत से संबंध रखने वाले पाठक यह जानते ही होंगे कि मृत जानवरों को उठाने के एवज में दलितों को कोई मजदूरी नहीं मिलती थी। दलितों का यह सामाजिक दायित्व था। अतीत में भी जाने की जरूरत नहीं है और न ही दिल्ली से बहुत दूर। भारत की राजधानी के 50 किलोमीटर के दायरे में ही हर साल दर्जनों ऐसी घटनाएं होती हैं जहां दलित दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया जाता है और दलितों की शादियों में बारातियों पर हिंसक हमले होते हैं। मात्र जूते पहनने, धूप का चश्मा लगाने या छाता तान कर चलने पर भी दलितों पर हमले हो चुके हैं।
मनुष्य के चेतना निर्माण में उसके जीवन-अनुभवों की बड़ी भूमिका होती है। दलित चेतना पर कोई एकतरफा राय बनाने से पूर्व कृपया दलित जीवन पर थोपे गए अपमानों पर भी एक बार ध्यान दें। जीवन के अनुभव से रचित दलित चेतना में मुख्य धारा के समाज के प्रति घोर अविश्वास है। जब तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को टीवी पर कैश लेते हुए दिखाया गया तो इस लेखक के संपर्क के सारे दलितों ने इसे एक 'साजिश' करार दिया था। दलितों की राय आज भी नहीं बदली है।
भारत का राजनीतिक ढांचा तब तक अच्छा नहीं बन पाएगा, जब तक देश का सामाजिक ढांचा अच्छा नहीं बन जाता। पर किसी सामाजिक ढांचे को कभी भी नियम, कानून, न्यायपालिका, पुलिस या सैन्य शक्ति की ताकत से नहीं बदला जा सकता है। सामाजिक ढांचे के पुनर्निमाण में 'सोशल थेरपी' की जरूरत पड़ती है। अब तो मेडिकल साइंस भी यह मान चुकी है कई बीमारियों का इलाज थेरपी से ही संभव है। भारत के जाति-समाज को अब जरूरत दलित थेरपी की है।
इस संदर्भ में वर्तमान लोकसभा चुनाव भारतीयों को एक बड़ा अवसर प्रदान कर रहा है। यदि इन चुनावों के जरिए दलित प्रधानमंत्री चुना जाता है, तो यह भारतवासियों का सौभाग्य होगा। दलित प्रधानमंत्री से हमें कुछ भी नया नहीं चाहिए। बस एक दलित प्रधानमंत्री चाहिए। दलित प्रधानमंत्री का अर्थ और महत्व कुछ और ही है। पांच वर्ष के अपने कार्यकाल में दलित प्रधानमंत्री दलितों को कुछ दिए बगैर ही, एक सामाजिक क्रांति का सूत्रपात कर सकता है। दलित प्रधानमंत्री अनजाने और अनचाहे सोशल पॉइंट ऑफ रेफरेंस बदल सकता है। दलित प्रधानमंत्री मात्र दिल्ली की गद्दी पर नहीं बैठेगा, भारतवासियों के दिमाग में बैठेगा। दिमाग में पैठे दलित प्रधानमंत्री के कारण दलित यह नहीं कह पाएंगे कि 'यह समाज हमें स्वीकार नहीं करता।' इससे दलितों का व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा। दूसरी ओर, दलित प्रधानमंत्री के कारण गैर-दलित समाज भी दलितों को परंपरागत ढंग से परिभाषित नहीं कर सकेगा।
दलित प्रधानमंत्री बड़ी तेजी से दलित संबंधी सोशल पॉइंट ऑफ रेफेरेंस बदलना शुरू कर सकता है। दलित जब देश का प्रधानमंत्री होगा तो गैर-दलित समाज में दलित दूल्हों की भी स्वीकार्यता बढ़ सकेगी। गैर दलितों से रिश्तेदारी बना कर दलित समाज भी गैर-दलित समाज को अपना ही समझना शुरू कर सकेगा।
अमेरिका के ब्लैक बुद्धिजीवी बराक ओबामा को इसी तरह देख और समझ रहे हैं। उनकी दृष्टि में ओबामा के प्रेजिडेंट चुने जाने के कारण आम ब्लैक समाज की सेल्फ इस्टीम बढ़ रही है तथा अमेरिकी समाज के प्रति अविश्वास के भाव में कमी आ रही है। यदि ब्लैक थेरपी अमेरिका में कार्य कर सकती है तो दलित थेरपी भारत में भी कार्य कर सकती है।
मायावती के रूप में दलित प्रधानमंत्री की प्रबल संभावना देश के समक्ष मौजूद है। गठबंधन सरकारों के इस दौर में यह जरूरी नहीं है कि कोई पार्टी अकेले ही 272 सीटों के साथ सरकार बना ले। चरण सिंह, चंद्रशेखर देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल कुछ ही सांसदों के साथ प्रधानमंत्री बन चुके हैं। इनमें से कोई भी नेता ऐसा नहीं था, जिसकी अखिल भारतीय स्तर की अपील हो। मायावती को दार्जिलिंग से लेकर अंडमान-निकोबार तक वोट मिलते हैं। यदि मायावती को देश प्रधानमंत्री के तौर पर अपनाता है, तो इससे मायावती के अंदर से भी बहुत सारी कटुताओं का खात्मा हो सकता है। अवसर मिलने से व्यक्ति सीखता है, जिम्मेदारी मिलने पर व्यक्ति जिम्मेदार हो जाता है।
मायावती को प्रधानमंत्री चुनकर देश की राजनीति को भी एक नई दिशा दी जा सकेगी। आजादी को 60 वर्ष हो गए, पर हम राजनीति के अर्थ को ठीक से नहीं समझ पाए हैं। इसी कारण आज चुनाव आयोग में रजिस्टर होने वाली हर पार्टी की एक जातीय पहचान है। तमाम ज्ञानी नेताओं एवं राजनीतिक शास्त्रियों के बावजूद हमने राजनीति को मात्र सत्ता संचालन का औजार समझा। राजनीति को समाज बदलने का औजार इस देश ने माना ही नहीं। परिणाम सबके सामने है। जहां हम आईटी के क्षेत्र में विश्व पटल पर सम्मान पा रहे हैं, वहीं राजनीति के क्षेत्र में नैतिक रूप से पतित होते जा रहे हैं।
== नवभारत टाइम्स के 14 मई के अंक के संपादकीय से साभार (लेखकः चंद्रभान प्रसाद)==

3 comments:

  1. नवभारत टाइम्स में छपे इस संपादकीय को अपने ब्लॉग पर डालने के बाद पहला कमेंट मैं खुद ही लिख रहा हूं। वजह यह है कि चंद्रभान प्रसाद की देश को दलित थेरेपी की जरूरत की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं। मगर चंद्रभान जी ने जिस तरह मायावती को पेश किया है, उससे मेरी नाइत्तेफाकी है। मायावती उस लायक नहीं है कि देश की प्रधानमंत्री हो सकें। अब तक की उनकी कारिस्तानिया देख कर तो यही लगता है। हमें पूर्व दलित राष्ट्रपति केआर नारायणन सरीखे व्यक्तित्व वाले ही दलित प्रधानमंत्री की जरूरत है।

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  2. मगर जब गुजरात हुआ तो न वे कुछ बोले न मायावती !
    बहरहाल जहां तक बीजेपी की बात है तो वहां सिर्फ बेंगारु ही नहीं, उमा भारती, कल्याण सिंह, जार्ज फर्नाडींज़ (दलित, पिछड़े, क्रिश्चियन) सभी के साथ यही हुआ। इतने पूर्वनियोजित, षांडयंत्रिक अपमानों/निष्कासनों के बाद भी ये सब और खुद चंद्रभान जी और मायावतीजी भी बार-बार ब्राहमणवादियों और बीजेपी की तरफ क्यों भागते हैं, समझ नहीं आता !?

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    शुभकामनाओं सहित
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